Ghaziabad News : दुहाई के आश्रम में जीवन गुजार रहे हैं 85 वृद्ध
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 06:52 PM
सुशील कुमार शर्मा
Ghaziabad: गाजियाबाद। मेरठ रोड पर दुहाई में लगभग 16 हजार गज में फैला जिले के एकमात्र शासकीय वृद्धाश्रम का संचालन समाज कल्याण विभाग की ओर से किया जाता है। इसकी स्थापना अशर्फी ग्रामोद्योग संस्थान, अलीगढ़ ने 2015 में अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, बुलंदशहर व गाजियाबाद में की थी। वृद्धाश्रम की क्षमता 150 लोगों की है, लेकिन वर्तमान में यहां 85 वृद्धजन निवास कर रहे हैं। इनमें कुछ की आयु 98 से 100 वर्ष है। यहां रहने वाले वद्धों के लिए लाइब्रेरी, मनोरंजन और खेल के सामान उपलब्ध कराए गए हैं। मैं दो वर्ष पूर्व एक बार अपनी पत्नी अर्चना शर्मा के साथ भी वहां गया था। अर्चना शर्मा का मन था कि वह माह में एक-दो बार यहां आकर सभी को सूक्ष्म व्यायाम कराए, लेकिन तभी कोरोनाकाल प्रारंभ होने से यह नहीं हो सका।
मेरे मित्र कुलदीप जो गाजियाबाद के वरिष्ठ छायाकार हैं, उनका मन था इस वृद्धाश्रम की व्यवस्था को देखने का। मैंने वृद्धाश्रम की अधीक्षिका इन्दु कुलश्रेष्ठ से बात की और हम वहां पहुंच गए। इन्दु कुलश्रेष्ठ वृद्धाश्रम की स्थापना से यहां हैं। उनका एक बेटा है समर्थ जो 10 वर्ष का है। वह अपनी मां के साथ ही रहता है। मायके और ससुराल वाले उनसे इसलिए नाराज रहते हैं कि वह किसी त्यौहार पर नहीं आती हैं। वह सभी त्यौहार अपने परिसर में इन वृद्धाजनों के साथ ही मनाती हैं। इस वृद्धाश्रम में पुरुष और महिलाएं लगभग बराबर संख्या में हैं। राखी और भइया दूज भी वह पुरुष वृद्धजनो के साथ मनाती हैं। उन्होंने बताया कि गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस, एक अक्टूबर अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस, गांधी जयंती, होली, दीपावली, रक्षा बंधन, जन्माष्टमी आदि सभी त्योहार वृद्धाश्रम में परिवार की तरह मनाते हैं। दो वर्ष से जागरण और भागवत कथा के आयोजन की भी शुरुआत की है। सत्संग और कीर्तन भी हर माह होते हैं।
हमारे सामने ही सूचना मिली कि कोई 60 वर्षीय महिला है, जो यहां भर्ती होना चाहती है। पता लगा कि उसके साथ कोई नहीं है। पूछने पर उसने बताया कि वह गाजीपुर से यहां रहने के लिए आई है। इन्दु कुलश्रेष्ठ ने बताया कि उसे उसके घर का ही कोई छोड़ गया है। उसकी ऐसी स्थिति नहीं है कि वह अकेले गाजीपुर से यहां तक आ सके। उन्होंने बताया कि उसके पास अपनी पहचान के लिए आधार कार्ड भी नहीं है। उन्होंने उसे तो आश्वस्त कर दिया कि भर्ती तो करेंगे, लेकिन पुलिस और एनजीओ को सूचना देकर उनकी संस्तुति करनी होगी।
गत वर्ष 17 अक्टूबर को प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन इस वृद्धाश्रम में आईं थीं। उस समय जनपद के तमाम आला अधिकारी भी मौजूद थे। उन्होंने यहां की व्यवस्था का अवलोकन किया और प्रशंसा की थी। उन्होंने इस वृद्धाश्रम को दो एसी व एक एलईडी टीवी प्रदान किया था। वृद्धाश्रम में महिलाओं और पुरुषों के वार्ड अलग-अलग हैं। वृद्धाश्रम में प्रवेश करते ही गैलरी के कमरों में आवास उनके है जो पति-पत्नी हैं। हम सभी वार्डों में गये और सभी से मिले। जो वृद्धाश्रम में रह रहे हैं वह यहां कैसे आये, पूछने पर बताया कि कुछ लोग अपने आप भर्ती होने आते हैं। कुछ को उनके बच्चे ही छोड़ जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनका कोई नहीं है। कुछ ऐसे होते हैं जो रास्ता भटक गए होते हैं। ऐसे लोग अमुमन पुलिस द्वारा लाए जाते हैं। कुछ डिप्रेशन के शिकार होकर भी यहां आते हैं।
इन्दु कुलश्रेष्ठ ने हमें इस वृद्धाश्रम की स्थापना से ही रह रहे राजकुमार (70 वर्ष) और उनकी पत्नी कुसुम (65 वर्ष) से भी मिलवाया। इतने ही समय से रह रहे मुंशी राम (70 वर्ष), कस्तूरी सक्सेना (लगभग 100 वर्ष) से भी मिलवाया। वह अपना सारा काम खुद करती हैं। मैंने उनसे बात भी की। उन्हें आज कुछ बुखार लग रहा था। इन्दु जी ने उनका बुखार चेक किया और डॉक्टर को भी आने के लिए फोन किया। उन्होंने हमें इन्द्रा चौधरी (87वर्ष) से भी मिलवाया, जो इन्दौर की निवासी हैं। उनका एक बेटा इन्दौर में प्राइवेट जॉब में है। दूसरा बेटा मेरठ में बिल्डर है। उनकी बहन का बेटा हर्ष कुमार अमेरिका में रहता है। दो वर्ष पहले जब वह भारत आया था तो उसे अपनी मौसी के वृद्धाश्रम में होने का पता चला तो वह उनसे मिलने आया था। उसने बताया कि मैंने अपनी मौसी को 53 वर्ष बाद देखा है।
हम गाजियाबाद के नन्द ग्राम निवासी रहे धर्म राज सिंह (70 वर्ष) से भी मिले। वह अपनी पत्नी के साथ वृद्धाश्रम में रहते थे। उनकी पत्नी का निधन गत वर्ष हो गया था। उनका बेटा पहले आता था। कभी बच्चों की फीस, कभी मकान का किराया देना है, कहकर माता पिता के एटीएम से पैसे निकलवा कर लेता रहा। जब सब पैसे निकलवा लिए तो फिर नहीं आया। उसकी मां मरने से पहले काफी बीमार रही। उसे सूचना भी भिजवाई गई, लेकिन वह नहीं आया। उनके मरने में भी नहीं आया।
दुहाई के ही रोहताश (60 वर्ष) से भी मिले। वह अपनी पत्नी ओमवती के साथ रहते हैं। उनके बेटे ने मां बाप से अपने नाम प्रापर्टी दान करा ली और मां बाप को वृद्धाश्रम में भेज दिया। कुछ वृद्ध ऐसे भी मिले, जो बच्चों की मारपीट से दुखी हो कर वहां रह रहे थे। एक गाजियाबाद की नेहरू नगर निवासी रेनु श्रीवास्तव (70 वर्ष) मिलीं। उनके ससुर जज थे। देवर व जेठ आईएएस व आईपीएस हैं। एक नोएडा व दूसरा मुम्बई में उच्च पद पर है।
करतारपुर (पंजाब) निवासी मधनीश साधू बाबा (77 वर्षीय) से भी मुलाकात हुई। उनका असली नाम मदन लाल है। उन्होंने बताया कि मुझे मेरा नया नाम मेरे गुरु ने दिया है। वह चार वर्ष से वृद्धाश्रम में हैं। वह इन्दु जी को मधुबन बापूधाम में एक चाय की दुकान पर मिले थे। उनके लड़के ने जो रोहणी दिल्ली में लगभग डेढ़ लाख महीने कमाता है, वह वहां छोड़ गया था। तीन बेटियां हैं। सभी दिल्ली में हैं। पहले पिता से सम्पत्ति अपने नाम करा ली। उन्हें वहां एक कमरे वाले फ्लैट के पास छोड़ गया। इन्दु जी उन्हें वृद्धाश्रम में ले आयीं।
नन्द ग्राम से आयी शमीम बेगम (65 वर्ष) से भी मिले। उनकी छोटी बहू यह कहकर वहां छोड़ गयी थी कि यह मेरी नौकरानी की सास है। इनका कोई नहीं है। इन्दु जी ने बताया कि यह माताजी यहां भर्ती होने के बाद 15-20 दिन तक रोती रही थीं। एक ऐसा जोड़ा भी मिला रोशन (72 वर्ष) व शांति 70 वर्ष (बदला नाम), जिन्होंने विजातीय होते हुए लगभग 50 वर्ष पूर्व लव मैरिज की थी। बच्चे हुए पर जीवित नहीं रहे। दोनों के परिवार वाले उन्हें समाज के डर से रखने को तैयार नहीं थे। वह खुद वृद्धाश्रम आ गये। वृद्धाश्रम में तीन लोग ऐसे भी मिले, जो न बोल सकते थे और न सुन सकते थे। उनमें बरेली से अदीप कुमार सक्सेना व दिल्ली से रतन लाल जैन हैं। बताया गया कि दोनों टेलर हैं। रतन लाल के पास कई अवार्ड भी है, जो अच्छी सिलाई के लिए दिए गए हैं। इन्दु जी ने बताया कि इस सात वर्ष की अवधि में यहां 35-40 लोगों का निधन हुआ है, जिनका अंतिम संस्कार हमने वृद्धाश्रम की ओर से विधिवत कराया है। एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इन्दु जी जब किसी से मिलती थीं तो उनके चेहरे से उनके लिए स्नेह और सम्मान दिखाई दे रहा था। कुलदीप जी ने भी वहां से आते समय इसका उल्लेख किया।