
Ghaziabad: महफ़िल ए बारादरी में देश के जाने-माने शायर शकील शिफ़ाई ने कहा कि शायरी की जुबान आसान रखोगे तो बात दूर तक जाएगी। मोहब्बत के फूल खिलाने वाली जुबान कभी नफरत के खार नहीं बो सकती। कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री शिफ़ाई ने अपने कलाम "खामोशी में हिकमत है कुछ अगर नहीं कहते, एहतियात वालों को बेखबर नहीं कहते। भीड़ ही कही जाए बेमदार लोगों की, साथ चलने वालों को हमसफर नहीं कहते" पर भरपूर दाद बटोरी।
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सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित महफ़िल ए बारादरी को संबोधित करते हुए श्री शिफ़ाई ने कहा "दूर फन के मुदअआ से खींच कर ले जाएगा, शौहरते पाने का पागलपन हुनर ले जाएगा। मैं समझता था छिपने से अयां मिल जाएगी, क्या खबर थी किसी मक़तल में डर ले जाएगा।" उन्हें इन शेरों "कैसे समझूं कि अब बड़े हो तुम, पांव मेरे हैं और खड़े हो तुम" और "पशेमानी अगर आनी बहुत है, मेरे चुल्लू में पानी बोहत है। तुम अपने घर में उगा लेना सूरज, मेरे घर में ताबानी बोहत है" पर भी खूब दाद मिली। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रमिला भारती के दोहे और शेर "द्वेष दंभ का भर लिया क्यूं इतना सामान, कैसे खाली हो भला ढ़हता हुआ मकान। फूलों का देश है खुशबू की बात करना मीठा जहर न देना बीमार को दवा में, केसर की क्यारियों का जो हाल हमने पूछा, कुछ मौन सिसकियां सी लहरा गई फिजा में। पूजा हो, अर्चना हो, अरदास हों नमाज़े, पर एक रंग ही हो हर हाथ की ध्वजा में" पर भी भरपूर वाह-वाही मिली। कार्यक्रम का शुभारंभ सोनम यादव की सरस्वती वंदना "हे वीणा वादिनि अक्षरा, हे ज्ञान रुप प्रकाशिनी मां शारदे वरदायिनी" से हुआ। महफ़िल ए बारादरी के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने फ़रमाया "इसलिए रहता नहीं कोई नया डर मुझमें
आईना झांकता रहता है बराबर मुझमें। मेरे साए पे करो वार मगर ध्यान रहे, कोई होता ही नहीं जिस्म से बाहर मुझमें"। कार्यक्रम से तकनीकी माध्यम से जुड़ी संस्था की संस्थापिका डॉ. माला कपूर 'गौहर' ने कहा "आज रौशन चिराग दिल का है, और कुछ देर आज रात रहे। मुझमें बस शेरियत रहे ज़िंदा, बाकी सबसे मुझे निजात रहे। कुछ रहे या ना रहे मगर 'गौहर', हाथ में मेरे उसका हाथ रहे।"
शायर सुरेंद्र सिंघल ने फ़रमाया "ये मेरी मां का है संदूक जंग खाया हुआ, मगर इसमें है मेरा बचपना तहाया हुआ।" मासूम गाजियाबादी के शेर "जो कलियों से ही नादानी करेंगे, चमन की क्या निगहबानी करेंगे। मैं मज़लूमों के दामन सी रहा हूं, वो मुझ पर ख़ाक सुल्तानी करेंगे" काबिल ए दाद रहे। संदीप शज़र ने अपनी बात यूं रखी "ज़रा सी देर में सब अस्ल रंग में आ गए, कहीं पे लाल कहीं नीले और हरे हुए लोग। ये इंक़लाब का परचम कहां सम्हालेंगे, घरों में शोर मचाते हुए डरे हुए लोग।'' डॉ. ईश्वर सिंह तेवतिया की कविता "वृद्धाश्रम से खत" आज मैं खुद ही खुदी को, एक मुज़रिम दिख रहा हूं, मैं तुम्हें वृद्धाश्रम से आखिरी खत लिख रहा हूं... भरपूर सराही गई। कार्यक्रम का संचालन कीर्ति रतन ने किया।
उन्होंने फरमाया "आत्मशंसा की हद से परे जाइए, गुफ़्तुगू आईने से करे जाइए।" इसके अलावा नेहा वैद, सुभाष चंदर, वी. के. वर्मा शैदी, अनिमेष शर्मा, डॉ. सुधीर त्यागी, सीमा सिकंदर, राजीव सिंघल, प्रतिभा प्रीत, मनीषा जोशी, अमर पंकज, सोनम यादव, संजीव शर्मा, इंद्रजीत सुकुमार, दिनेश श्रीवास्तव, सुरेंद्र शर्मा, जे. पी. रावत, अंजू साधक, देवेन्द्र देव, मृत्युंजय साधक, गीता रस्तौगी, विनोद कुमार विनय आदि की रचनाएं भी सराही गईं। इस अवसर पर तिलक राज अरोड़ा, आलोक यात्री, राष्ट्रवर्धन अरोड़ा, विष्णु कुमार गुप्ता, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, अनिल शर्मा, वागीश शर्मा, रिंकल शर्मा, शशिकांत भारद्वाज, तेजवीर सिंह, प्रभात चौधरी, देवव्रत चौधरी, हंसराज सिंह, संजय भदौरिया, वीरेंद्र राठौड़, अशहर इब्राहिम सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।