Greater Noida /Noida News: दुष्कर्म की शिकार तड़पती बच्ची को देखकर नम हो रहीं हैं आंखें
भारत
चेतना मंच
12 Jul 2022 04:10 PM
Greater Noida / Noida: ग्रेटर नोएडा /नोएडा। उस बच्ची की उम्र सिर्फ सात माह है। छोटी सी जिंदगी में उसे सात जन्मों का दर्द एकमुश्त मिल गया। एक दरिंदे की हवस की शिकार बच्ची मौजूदा समय में सेक्टर-30 स्थित चाइल्ड पीजीआई अस्पताल के बेड पर दर्द से तड़प रही है। उसे देखकर बरबस ही हर किसी की आंखें नम हो रहीं हैं। लोग आते हैं, उसे निहारते हैं और फिर अपने रास्ते चले जाते हैं। मजबूर पिता के सामने जख्मी बच्ची के इलाज की समस्या पहाड़ की तरह खड़ी है। सरकारी डाक्टर भी मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखते हुए दुराचार की शिकार सात माह की बच्ची का इलाज करने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि बाद में सीएमएस के दखल के बाद उसे दाखिला मिल गया।
सरकारी चिकित्सकों की संवेदनहीनता का मामला उत्तर प्रदेश के किसी पिछड़े जिले का नहीं, बल्कि प्रदेश का शो विंडो कहे जाने वाले गौतमबुद्धनगर जिले के ग्रेटर नोएडा स्थित जिम्स अस्पताल का है। दनकौर कोतवाली क्षेत्र के एक गांव में बीती 6 जुलाई को एक अधेड़ व्यक्ति की हैवानियत का शिकार बनी 7 माह की बच्ची को उसका पिता इलाज के लिए कासना स्थित जिम्स अस्पताल लेकर पहुंचा। बच्ची के पिता का आरोप है कि वहां चिकित्सकों ने पैसे के अभाव में उसका उपचार करने से इंकार कर दिया। आर्थिक रूप से कमजोर पिता बिना इलाज कराए बच्ची को घर ले आया। हैवानियत का शिकार हुई बच्ची की हालत देखकर उसने उपचार के लिए कई लोगों से मदद की गुहार लगाई। गांव के ही किसी व्यक्ति ने उसे नोएडा के सेक्टर 30 स्थित चाइल्ड पीजीआई अस्पताल ले जाने की सलाह दी। वह 11 जुलाई को किसी तरह बच्ची को लेकर अस्पताल पहुंचा। बच्ची के पिता का आरोप है कि यहां भी चिकित्सकों ने उसे एडमिट करने से इंकार कर दिया। उसने सीएमएस से बच्ची के उपचार की गुहार लगाई। सीएमएस के हस्तक्षेप के बाद बच्ची को भर्ती किया गया।
मुश्किल से होता है परिवार का गुजारा
बातचीत के दौरान बच्ची के पिता ने बताया कि उसके घर में तीन बेटियां और एक बेटा है। हैवानियत का शिकार हुई बच्ची सबसे छोटी है। गांव में उसके पास खेती की महज डेढ़ बीघा जमीन है, जिससे परिवार का गुजारा नहीं हो पाता है। परिवार के सात लोगों का भरण पोषण करने के लिए वह एक कंपनी में 10 हजार रुपये की पगार पर गार्ड की नौकरी करता है। चिकित्सक बच्ची की दवाइयों पर हजारों रुपये का खर्च बता रहे हैं, जिसे वहन करना उसके बूते में नहीं हैं। पीड़ित पिता ने बताया कि गार्ड की नौकरी में उसके परिवार का खर्च बमुश्किल चल रहा है। ऐसे में दवाइयों के खर्च को कहां से पूरा करेगा। बस यही चिंता उसे सताए जा रही है।
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सियासी नेता और समाजसेवियों की चुप्पी पर भी सवाल
छोटे-छोटे मुद्दों पर जमकर बयानबाजी कर अपनी राजनीति चमकाने वाले नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी मानवता को शर्मसार करने वाली इस घटना पर चुप्पी साधे हुए हैं। किसी भी राजनीतिक दल के नेता व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने घटना के 6 दिन बीतने के बाद भी पीड़ित बच्ची व परिवार की सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश का शो विंडो कहे जाने वाले गौतमबुद्धनगर में छोटी से छोटी घटना को मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों में प्रमुखता मिलती है। जनपद में 7 माह की दुधमुंही बच्ची के साथ हुई हैवानियत की घटना पर किसी भी राजनीतिक दल और सामजिक संगठनों का आगे न आना यह साबित करता है कि उनकी भी संवेदना खत्म हो चुकी है।
आरोपियों को मिले कड़ी सजा: पिता
पीड़ित बच्ची के पिता का कहना है कि उसकी बच्ची को इलाज के साथ-साथ जल्द न्याय मिले और दोषी को इस जघन्य अपराध के लिए कड़ी से कड़ी सजा मिले। पीड़िता के पिता ने कहा कि वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड को लेकर जमकर प्रतिरोध हुआ था। नतीजतन सरकार को गंभीर रूप से घायल निर्भया को इलाज के लिए विदेश तक भेजना पड़ा था। समाज व सरकारी मशीनरी पर सवाल उठाते हुए पीड़ित ने कहा कि उसकी बेटी के साथ हुई हैवानियत पर समाज का हर तबका चुप्पी साधे हुए है।