विनय संकोची
हरड़ (Harad) जिसे आमतौर से हरीतकी के नाम से जाना जाता है, भारतीय पौधा है जिसमें कई चिकित्सकीय गुण पाए जाते हैं। यह सुविख्यात त्रिफला का प्रमुख तत्व है, जिसका इस्तेमाल जिगर बढ़ने, ल्यूकोरिया और पेट की अनेक तकलीफों को दूर करने में किया जाता है। हरीतकी को वैद्यों ने चिकित्सा साहित्य में अत्यधिक सम्मान देते हुए उसे अमृतोपम औषधि कहा है।
राजबल्लभ निघण्टु के अनुसार -
यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी। कदाचिद कुप्यते माता, नोदरस्था हरीतकी।।
अर्थात् - हरीतकी मनुष्य की माता के समान हित करने वाली है। माता तो कभी-कभी कुपित भी हो जाती है, परंतु उदर स्थित (खाई हुई) हरड़ कभी भी अपकारी नहीं होती।
मदनपाल निघण्टु में ग्रंथकार लिखता है -
हरस्य भवने जाता हरिता च स्वभावत:।
हरते सर्वरोगांश्च तस्मात् प्रोक्ता हरीतकी।।
अर्थात् - तू हर (महादेव) के भवन में उत्पन्न हुई है, इसलिए अमृत से भी श्रेष्ठ है। स्वभाव से हरित वर्ण की होने से तथा सब रोगों का नाश करने में समर्थ होने से हरीतकी है।
हरड़ का वृक्ष ऊंचा होता है एवं भारत में विशेषत: निचले हिमालय क्षेत्र में रावी तट से लेकर पूर्व बंगाल असम तक 5 हजार फीट की ऊंचाई पर पाया जाता है। हिंदी में इसे हरड़ और हर्रे भी कहते हैं। आयुर्वेद में इसे अमृता, प्राणदा, कायस्था, विजया, मेथ्या आदि नामों से जाना जाता है। हरीतकी की सात जातियां - विजया, रोहिणी, पूतना, अमृता, अभया, जीवंती तथा चेतकी हैं। हरड़ में कई प्रकार के पदार्थ पाए जाते हैं। ग्लाइकोसाइड्स जैसा पदार्थ हमारे शरीर को कब्ज़ से छुटकारा दिलाने में मदद करता है। आयुर्वेदिक मतानुसार हरड़ में पांचों रस - मधुर, तीखा, कड़वा, कसैला और अम्ल पाए जाते हैं। नित्य प्रातः नियमित रूप से हरड़ लेते रहने से बुढ़ापा नहीं आता है, शरीर थकता नहीं है तथा स्फूर्ति बनी रहती है, ऐसा शास्त्रों का मत है।
दो प्रकार की हरड़ बाजार में मिलती है - बड़ी और छोटी। जो फल गुठली पैदा होने से पहले ही पेड़ से गिर जाते हैं या तोड़कर सुखा लिए जाते हैं, उन्हें छोटी हरड़ कहते हैं। भावप्रकाश निघण्टु के अनुसार जो हरड़ जल में डूब जाए वह उत्तम है। चरक संहिता के अनुसार हरड़ त्रिदोष हर व अनुलोमक है। यह संग्रहणी, शूल, अतिसार, बवासीर तथा गुल्म का नाश करती है एवं पाचन अग्निदीपन में सहायक है।
हरीतकी एक प्रभावी औषधि है, इसके गुणों का लाभ लेने के लिए विभिन्न ऋतुओं में ही नियमानुसार ही इसका सेवन करना चाहिए - वर्षा ऋतु में सेंधा नमक के साथ, शरद ऋतु में शक्कर के साथ, हेमंत ऋतु में सौंठ के साथ, शिशिर ऋतु में पीपल के साथ और बसंत ऋतु में शहद के साथ।
हरड़ से बनी गोलियों का सेवन करने से भूख बढ़ती है। हरड़ का चूर्ण खाने से कब्ज से छुटकारा मिलता है। हरड़ को पीसकर आंखों के आसपास लगाने से आंखों के रोगों से छुटकारा मिलता है। भोजन के बाद अगर पेट में भारीपन महसूस हो, तो हरड़ का सेवन करने से राहत मिलती है। हरड़ का सेवन लगातार करने से शरीर में थकावट महसूस नहीं होती और स्फूर्ति बनी रहती है।
काली हरड़ को महीन पीसकर मुंह तथा जीभ के छालों पर लगाते रहने से छालों से मुक्ति मिलती है। प्रतिदिन दो-चार बार लगाते रहने से हर एक प्रकार के छालों से निजात मिलती है। पुराने कब्ज के रोगी को नित्य प्रति भोजन के आधे घंटे बाद डेढ़-दो ग्राम की मात्रा में हरड़ का चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लेते रहने से फायदा होता है। हरड़ का चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में दो किशमिश के साथ लेने से एसिडिटी ठीक हो जाती है।
जिन नवजात शिशुओं के भौहें नहीं हों, हरड़ को लोहे पर घिस कर, सरसों तेल के साथ मिलाकर शिशु के भौंह वाले स्थान पर धीरे-धीरे मालिश करते रहने से भौंह के बाल उगने लगते हैं। अगर सप्ताह में एक बार बच्चे को मामूली हरड़ पीसकर खिलाया जाता रहे, तो उसे जीवन में कब्ज का सामना कभी नहीं करना पड़ता है।
शरीर के जिन अंगों पर दाद हो, वहां बड़ी हरड़ को सिरके के साथ पीसकर लगाने से लाभ होता है। मुंह में सूजन होने पर हरड़ के गरारे करने से फायदा मिलता है। हरड़ एक टॉनिक की तरह काम करती है। इसके इस्तेमाल से बाल काले चमकीले हो जाते हैं। हरड़ के फल को नारियल तेल में उबाल कर लेप बनाएं और उसे बालों में लगाएं। हरड़ का काढ़ा त्वचा संबंधी एलर्जी में लाभकारी है। हरीतकी चूर्ण सुबह-शाम काले नमक के साथ खाने से कफ खत्म हो जाता है। तीन-चार ग्राम हरड़ के छिलकों का काढ़ा शहद के साथ पीने से गले का दर्द, टॉन्सिल्स तथा कंठ के रोगों में लाभ होता है।
• यहां हरड़ के गुणों बारे में सामान्य जानकारी दी गई है। हरड़ का औषधि के रूप में उपयोग योग्य आयुर्वेदाचार्य से परामर्श के उपरांत ही करें।