Health News : एफएसएसएआई (FSSAI) की खाद्य नीति के मसौदे में भारी भूल
नई दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते कंज्यूमर वॉयस के सीईओ आशिम सान्याल, एनएपीआई के संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता, एनएपीआई की सदस्य व सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. वंदना प्रसाद।
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 09:26 PM
Health News : नई दिल्ली। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य उत्पादों से आम लोगों की रक्षा करने के लिए बनाए गए मसौदे में भारी भूल उजागर हुई है। मसौदे में अस्वास्थ्यकर खाद्य उत्पादों के लेबल पर ‘स्टार’ लगाने से जनस्वास्थ्य को खतरा हो सकता है। क्योंकि इससे अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों का उपभोग बढ़ने की संभावना रहेगी। एफएसएसएआई (FSSAI) ने पहले से पैक किए गए खाद्य उत्पादों के पैकेट के सामने वाले हिस्से पर लेबल लगाने के बाबत जनता की राय लेने के लिए एक मसौदा तैयार किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मसौदे को पर्याप्त रूप से नहीं बदला गया तो वांछित उद्देश्य को पाने की संभावना खत्म हो जाएगी। इस बाबत नई दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कंज्यूमर वॉयस के सीईओ आशिम सान्याल, एनएपीआई के संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता, एनएपीआई की सदस्य व सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. वंदना प्रसाद के अलावा कई अन्य लोगों ने इस नियम के प्रति अपनी चिंता जाहिर की।
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गौरतलब है कि एफएसएसएआई (FSSAI) को भारतीय उपभोक्ताओं की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार दिया गया है। ठोस वैज्ञानिक प्रमाण इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पहले से पैक किए गए खाद्य उत्पाद किसी के आहार में नमक/चीनी या वसा को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे खाद्य उत्पादों के इस्तेमाल से मोटापा, टाइप 2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, पुराने किडनी रोग, कैंसर और प्रतिकूल मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों का कारण हो सकते हैं। हाल के सामने आए साक्ष्य माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभावों की ओर इशारा करते हैं। नए अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि भारतीय किशोर-किशोरियों में उच्च रक्तचाप का प्रचलन काफी अधिक (तीन में से एक) है। इससे हृदय रोग होने की संभावना बनी रहती है। इसलिए चीनी, नमक, या संतृप्त वसा में उच्च मात्रा वाले खाद्य पदार्थों के उपयोग में कमी लाने के लिए पहल की जरूरत है।
पंजाब के जाने-माने नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. नवदीप सिंह खैरा ने कहा कि मैं इस समस्या पर एक साल से ज्यादा समय से निगाह रखे हूं। सूचना के अधिकार (RTI) की जानकारी के आधार पर मैं यह देखकर बहुत निराश हूं कि आईआईएम की रिपोर्ट पर एफएसएसएआई ने अपना भरोसा जारी रखा है और अस्वास्थ्यकर खाद्य उत्पादों पर ‘स्टार्स’ का हिमायती है। उन्होंने कहा कि एफएसएसएआई ने न सिर्फ आईआईएम (IIM) के शोधकर्ताओं को एचएसआर के प्रति न सिर्फ पक्षपात किया है, बल्कि उसने आईआईएम की रिपोर्ट के विश्लेषण करने का भी प्रयास नहीं किया है।
भाजपा के एक पूर्व विधायक रविंदर बंसल ने कहा कि मुझे मधुमेह है। मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूं कि जो खाद्य उत्पाद बेचे जा रहे हैं, क्या उनके पैकेट पर अंकित है कि उनमें चीनी की मात्रा अधिक है या नहीं। इन पर ‘स्टार’ मुझे इस तथ्य के बारे में नहीं बताते हैं। मैंने एफएसएसएआई को उसके मौजूदा मसौदे को बदलने का सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि लोगों को ऐसे उत्पादों को खरीदने या खाने के लिए एक विकल्प बनाने के लिए खाद्य उत्पाद की सामग्री के लिए लेबल सरल और सही होना चाहिए। अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों पर ‘स्टार’ वास्तव में भ्रामक है।
भारत में प्रमुख पोषण सलाहकार रुजुता दिवेकर ने कहा कि चिप्स, कोला और चॉकलेट स्वास्थ्य के लिए बुरी चीजें हैं। उनके उपभोक्ताओं, अधिकतर बच्चों को इनके बारे में सीधे एवं सरल शब्दों में जानने की जरूरत है। पैक पर एक स्वास्थ्य चेतावनी से हम न सिर्फ हमारे बच्चों को इससे दूर रखने में सफल हो सकते हैं, बल्कि खाद्य उद्योग द्वारा मुनाफे के लिए भुनाए जाने से बच सकते हैं।
देश के एक वरिष्ठ महामारी विज्ञानी प्रोफेसर हर्ष पाल सिंह सचदेव ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि खाद्य पदार्थों में ‘चीनी’ को ठोस खाद्य उत्पादों में 21 ग्राम प्रति 100 ग्राम पर रखा गया है, जो डब्ल्यूएचओ के निर्देशों से कहीं अधिक है। एफएसएसएआई को खाद्य उत्पादों में स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाले तत्वों के बाबत डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। इसके बाद वह लोगों को खाद्य उत्पादों संबंधी जोखिम कारकों के बारे में सीधे, सही मायने में और सरलता से सूचित करने की अपनी रणनीति पर फिर से विचार कर सकता है।
कंज्यूमर वॉयस के सीईओ (CEO) आशिम सान्याल का कहना है कि उच्च मात्रा में सोडियम, पूर्ण शुगर और पूर्ण वसा के केंद्र-बिंदु पर टिके रहने से, फ्रंट ऑफ पैक लेबल उद्योग को अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के नियमों के साथ खिलवाड़ नहीं करने देंगे। चेतावनी लेबल ग्राहकों को स्वस्थ विकल्प बनाने और भारत में आहार से संबंधित बीमारी की रोकथाम में योगदान करने के लिए भी सशक्त बनाएंगे।
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पोषण नीति पर एक राष्ट्रीय थिंक टैंक- द न्यूट्रिशन एडवोकेसी इन पब्लिक इंटरेस्ट (एनएपीआई) ने सुझाव दिया कि नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए। एनएपीआई के संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता ने कहा कि इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि एक अस्वास्थ्यकर खाद्य उत्पाद में सकारात्मक कारक या पोषक तत्व, जैसे, सब्जी, फल, मेवा आदि डालने से बीमारी का खतरा कम होगा। शरीर का मेटाबॉलिज्म उस तरह से काम नहीं करता है। मेवे, फल, फलियां अस्वास्थ्यकर उत्पाद में चीनी, नमक या वसा के अवशोषण को कम कर सकते हैं और न ही इसके नकारात्मक प्रभाव में कमी ला सकते हैं।
एनएपीआई (NAPi) की सदस्य और एक सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. वंदना प्रसाद ने बताया कि खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2020 में और संशोधन करने के लिए कुछ नियमों का मसौदा लाया जा रहा है। इसमें ‘न्यूनतम स्वस्थ से सर्वाधिक स्वास्थ्यकर’ तक खाद्य पदार्थों की रेटिंग करने का मूलभूत अवधारणात्मक दोष है। खाद्य पदार्थों के खिलाफ चेतावनी घोषित करने के बजाए उन सकारात्मक पोषक तत्वों की धारणा शामिल की जा रही है, जो कि स्पष्ट रूप से अस्वास्थ्यकर के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। उदाहरण के लिए चिप्स का एक पैकेट या शक्करयुक्त सोड़ा की एक बोतल को भी कुछ हद तक स्वास्थ्यकर माना जाएगा। इसके अलावा, फल, मेवा या फाइबर जैसे कुछ सकारात्मक पोषक तत्वों का सांकेतिक जोड़ स्वास्थ्य पर उनके प्रतिकूल प्रभाव को कम किए बिना उनकी रेटिंग को काफी हद तक बढ़ा सकता है। मसौदा यह सवाल उठाता है कि क्या एफएसएसएआई खाद्य पदार्थों के उत्पादों के हितों या उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए है? यहां तक कि एचएफएसएस की परिभाषा मसौदे के मुख्य भाग के बीच विरोधाभासी है, जो डब्ल्यूएचओ के मानक और अनुसूची-तीन को स्वीकार करती है, जो कि डब्ल्यूएचओ के मानक की तुलना में चीनी की सीमा दोगुनी बढ़ाती है। यह दुःखद है कि एफएसएसएआई ने इस मसौदे के जारी होने से पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में लोगों से व्यापक विचारों को प्राप्त नहीं किया।
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जी-20 समूह की अध्यक्षता के साथ भारत मानवता के सामने इस सबसे अधिक दबाव वाले मुद्दे को हल करने के लिए एक नेता के रूप में उभर सकता है। लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जी-20 देशों को दर्शाने के लिए मजबूत नीतियां विकसित कर सकता है। वैश्विक स्वास्थ्य की चुनौतियों से निपटने के लिए ‘चेतावनी लेबल’ और अस्वास्थ्यकर खाद्य उत्पादों की मार्केटिंग पर रोक लगाना सार्थक हो सकता है। इस बारे में ब्राजील, इजरायल, मैक्सिको, चिली और अनेक लैटिन अमेरिकी देशों ने प्रतिबद्धता दर्शाई है। ऐसे खाद्य उत्पादों के उपभोग में कमी लाने के लिए नीतियां होने से आबादी की आहार संबंधी आदतों पर असर पड़ेगा और पारंपरिक आहार का संरक्षण होगा।