Himachal Pradesh Election: सुलह विधानसभा सीट और सरकार के बीच अनूठा नाता
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भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 11:29 AM
Himachal Pradesh Election: पालमपुर। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए सभी राजनैतिक दल अपनी अपनी तैयारियों में जुट गए हैं। इस प्रदेश में चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग कभी भी चुनाव का ऐलान करके आदर्श आचार संहिता लागू कर सकता है। चुनावों के दृष्टिगत प्रदेश के राजनैतिक पटल पर अपनी विशेष भूमिका रखने वाले सुलह विधानसभा क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालें तो यहां पर आज तक हुए सभी चुनावों में जिस दल का विधायक यहां से चुनकर जाता है, उसी दल की सरकार प्रदेश में सत्तासीन होती है।
Himachal Pradesh Election:
प्रदेश में पहली गैरकांग्रेसी सरकार का नेतृत्व यहां से चुने हुए विधायक शांता कुमार द्वारा किया जाना इस विधानसभा क्षेत्र की जनता के लिए एक गौरव का विषय बेशक है, परंतु प्रदेश में सत्तासीन होने वाली सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सुलह विधानसभा क्षेत्र की जनता ने मुख्यमंत्री के पद पर आसीन होने वाले शांता कुमार को विधानसभा की दहलीज पार करने ही नहीं दी।
चेतना मंच, सुलह विधानसभा क्षेत्र में वर्ष-1977 से लेकर अब तक के चुनावों का विश्लेषण कर रहा है। सुलह विधानसभा क्षेत्र में वर्ष-1977 में शांता कुमार ने जनता पार्टी से चुनाव जीतकर प्रदेश में पहली गैरकांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री का पद संभाला, परंतु ढ़ाई वर्ष तक राज करने के बाद जनता पार्टी की सरकार गिर गई। वर्ष-1982 के चुनावों में सुलह से एक बार फिर शांता कुमार विजयी हुए। उसके बाद प्रदेश में सत्तासीन होने वाली पार्टी का नुमाइंदा ही सुलह से विजयी होता रहा है। यहां बताना आवश्यक है कि प्रदेश में हर बार के चुनावों में सत्ता परिवर्तन होता रहा है और उसी तर्ज पर सुलह विधानसभा क्षेत्र में भी सत्तासीन दल के उम्मीदवार को ही जनता ने विधानसभा पहुंचाया है।
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वर्ष-1985 में सुलह से कांग्रेस प्रत्याशी मान चंद राणा ने शांता कुमार को हराकर प्रदेश में सत्तासीन हुई कांग्रेस पार्टी की सरकार में संसदीय सचिव के पद पर आसीन होकर जनता की सेवा की। परंतु, वर्ष-1990 में हुए चुनावों में शांता कुमार ने कांग्रेस प्रत्याशी मान चंद राणा को पुनः हराकर प्रदेश में सत्तारुढ़ हुई भाजपा सरकार की कमान संभाली और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वर्ष-1992 में बाबरी विध्वंस मामले में तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा भंग की गई कुछ प्रदेशों की सरकार का दंश हिमाचल प्रदेश की पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार को भी झेलना पड़ा। प्रदेश मध्यावधि चुनावों की और धकेल दिया गया।
साल, 1993 में हुए चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी मान चंद राणा ने एक बार फिर प्रदेश के मुख्यमन्त्री शांता कुमार को हराया और प्रदेश की कांग्रेस सरकार में पशु पालन जैसे महत्वपूर्ण विभाग का दायित्व कैबिनेट मंत्री के रूप में निभाया। परंतु, वर्ष 1994 में राणा मान चंद की आसामयिक मृत्यु के पश्चात वर्ष-1995 में सुलह विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव हुआ। उसमें भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार द्वारा उद्घोषित सुलह विधानसभा क्षेत्र को अपनी राजनैतिक गंगोत्री से अपने उत्तराधिकारी के रूप में विपिन सिंह परमार को चुनाव मैदान में उतारा। परंतु, प्रदेश में उस समय सत्तासीन कांग्रेस प्रत्याशी कंवर दुर्गा चंद से चुनाव हार गए। वर्ष-1998 के चुनावों में विपिन सिंह परमार ने कांग्रेस प्रत्याशी जगजीवन पाल को हराकर विधानसभा की दहलीज पार की, जबकि 2003 के चुनावों में कांग्रेस के जगजीवन पाल ने विपिन सिंह परमार से चुनाव जीत लिया।
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वर्ष-2007 में विपिन सिंह परमार ने चुनाव में विजयी होकर भाजपा का झंडा सुलह में एक बार फिर बुलंद किया, परंतु वर्ष-2012 के विधानसभा चुनावों में विपिन सिंह परमार एक बार फिर कांग्रेस के जगजीवन पाल से हार गए। जबकि 2017 के चुनावों में विपिन सिंह परमार ने अपनी हार का बदला लेकर जगजीवन पाल को मतों के भारी अंतर से हराकर तीसरी बार विधानसभा की दहलीज पार की और सरकार में स्वास्थ्य मंत्री जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय बतौर कैबिनेट मंत्री संभाला, परंतु भाजपा ने उनको पदोन्नत करके विधानसभा अध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेवारी सौंपी।
चूंकि, अब प्रदेश की भाजपा सरकार का कार्यकाल पूर्ण होने जा रहा है और शीघ्र ही प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, तो इन चुनावों में क्या जनता सुलह विधानसभा क्षेत्र में दशकों से चली आ रही परिपाटी को निभायेगी या इस बार पुरानी परिपाटी को तोड़कर रिवाज बदलेगी, यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन, इस बार होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के साथ साथ आम आदमी पार्टी की भूमिका को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।
प्रस्तुति : गगन सूद।