
hindi kahani - एक व्यक्ति था। उसके गुरु एक सन्यासी थे। वह व्यक्ति दुनियादारी से ऊब सा गया था। वह अपने गुरु की तरह ही दुनियादारी छोड़कर सन्यासी बनना चाहता था।
उसने अपने परिवार को यह बात बताई तो सभी ने मना कर दिय। यह कहते हुए कि हम सब आपसे बहुत प्यार करते हैं।
फिर उसने अपने गुरु को यह बात बताई परंतु साथ ही कहा कि उसका घर-परिवार बच्चे और पत्नी उसे सन्यास लेने नहीं दे रहे हैं क्योंकि वह मुझसे बेहद प्यार करते हैं।
गुरु ने कहा “यह किसी सूरत में प्यार नहीं है”। गुरु ने उसे बहुत समझाया पर वह व्यक्ति नहीं मान रहा था। फिर गुरु ने कहा, “अच्छा ठीक है”। गुरु जी उस व्यक्ति को मठ में ले गए।
इसके बाद गुरु ने उसे योग विद्या सिखाई जिससे वह अपनी सांसे रोक कर मुर्दे जैसी अवस्था में घंटों तक रह सकता था। यह सब सिखाने के बाद गुरु ने उसे एक योजना बताई और उसे घर भेज दिया।
दूसरे दिन वह व्यक्ति अपने घर पर मुर्दा पाया गया। परिवार के सारे लोग इकट्ठे हो गए। सभी रो रहे थे। विलाप कर रहे थे। वहीं उसकी पत्नी सबसे ज्यादा दुखी हो रही थी।
पूरे घर में कोहराम मच गया था। सभी की आंखें नम थी। वह व्यक्ति मुर्दा अवस्था में था, मगर योग अभ्यास से आसपास के माहौल को महसूस कर सकता था और सुन सकता था।
उसे बड़ा सुकून मिला कि उसका परिवार उसे कितना प्यार करते हैं, अंतत: उसने संन्यास का इरादा त्यागने का फैसला कर लिया।
कुछ ही देर बाद उस व्यक्ति के गुरु वहाँ पहुंचे। गुरु ने सभी को शांत किया और अपने शिष्य के पड़े शव को देखा।
कुछ देर शव को देखने के बाद उसके परिवार वालों को कहा इस शव में जान फुंका जा सकता है। इस व्यक्ति को मैं अपनी विद्या से जिंदा कर सकता हूँ।
यह बात सुनकर घर के सभी लोग बहुत खुश हो गए। सभी को एक उम्मीद की किरण नजर आ रही थी।
फिर सभी ने उस सन्यासी से कहा “तो आप यह काम जल्द से जल्द करिये”। इस पर उस सन्यासी ने कहा “एक समस्या है, इस कार्य लिए परिवार के किसी अन्य सदस्य को अपने प्राण त्यागने होंगे।
यह सुन कर सभी लोगों की सांसे रुकी की रुकी रह गई। सभी ने एक दूसरे को देखा। सन्यासी ने परिवार के सभी सदस्यों से एक एक करके पूछा पर किसी ने भी हां नहीं कही।
सभी ने अपनी जान की जरूरत बताई और अपनी जिम्मेदारी भी।
सन्यासी ने फिर उस व्यक्ति के पत्नी से कहा, अगर यह नहीं रहे तो तुम कैसे जीवन यापन करोगी। उसकी पत्नी ने तुरंत जवाब दिया मैं इनके बगैर भी जी लुंगी।
गुरु ने उस व्यक्ति के बच्चों से भी यही सवाल किया। उनका भी जवाब ना ही था। फिर यही सवाल उस व्यक्ति के माता-पिता से किया। उनका भी जवाब एक ही था।
इसके बाद गुरु उस व्यक्ति के शव के पास आए और बोले हे व्यक्ति तुम उठ खड़े हो जाओ। वह व्यक्ति उठ कर बैठ गया।
फिर उसके गुरु वहाँ से जाने लगे। उसने अपने गुरु को रोका और गुरु से कहा, “मैं भी आपके साथ चलता हूं”।
अब उस व्यक्ति को समझ में आ गया था कि उसकी जरूरत उसके घर में कितनी है। अब वह एक पल भी अपने घर में रहना नहीं चाहता था।
सीख : इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि आप के होने न होने से किसी पर ज्यादा कुछ असर नही पड़ता है।
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