
Hindi Kahani - बहुत समय पहले वाराणसी में प्रतापमुकुट नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके बेटे का नाम वज्रमुकुट था। वह बड़ा हठी था। वह जिस बात के लिए हठ करता था, उसे पूरा करके ही दम लेता था। राजा प्रतापमुकुट के प्रधानमंत्री के पुत्र बुद्धिशरीर से उसकी घनिष्ठ मित्रता थी। बुद्धिशरीर बहुत बुद्धिमान था। राजकुमार वज्रमुकुट उसे अपने प्राणों से भी प्यारा था।
एक बार राजा वज्रमुकुट अपने मित्र बुद्धिशरीर को लेकर शिकार पर गया। शिकार खेलते-खेलते वे बहुत दूर निकल गए। तभी उनकी नजर एक सरोवर पर पड़ी। उस सरोवर में विभिन्न प्रकार के कमल खिले हुए थे। उन्होंने वहां पर एक दिव्य रूपवती कन्या को देखा, जो अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई थी। उस रूपसी को देखकर राजकुमार उस पर मोहित हो गया। वह सुन्दरी भी राजकुमार पर मोहित हो गई। उसने इशारे से अपने पुष्प- मुकुट में से एक कमल लेकर कान में लगाया। फिर दंतयंत्र से देर तक दाँतों को खुरचा। एक दूसरा कमल माथे पर लगाया तथा हाथ हृदय पर लगाया, परंतु राजकुमार उसके इशारों का मतलब नहीं समझ सका, लेकिन मंत्री के बुद्धिमान पुत्र ने उसके इशारे का मतलब समझ लिया था।
फिर वह रूपसी कन्या अपनी सहेलियों के साथ वहां से चली गई। घर आकर उस कन्या ने पलंग पर अपने अंगों को निढाल छोड़ दिया, किंतु उसका हृदय अपने इशारों का अर्थ करता हुआ, उस राजकुमार पास ही रहा। उधर राजकुमार भी अपने नगर पहुँचकर उस कन्या के बिना, ऐसी दुर्दशा पड़ा, जैसे अपनी विद्या भूल जाने पर विषधर पर पड़ता है। राजकुमार की ऐसी दशा देखकर मंत्रीपुत्र बुद्धिशरीर ने एकान्त में उससे इसका कारण पूछा। कारण जानकर उसने राजकुमार से कहा- 'मित्र ! तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हें उस कन्या से अवश्य मिलवाऊँगा।'
यह सुनकर राजकुमार वज्रमुकुट बोला- 'मित्र! जिसका न तो नाम- गाँव मालूम है और न ही कुल का कोई पता है, उससे भला तुम कैसे मिल पाओगे?'
बुद्धिशरीर बोला - " मित्र ! उसने इशारों से तुम्हें जो कुछ बतलाया, क्या तुमने उसे नहीं देखा ? उसने अपने कानों पर उत्पल (नीलकमल) रखकर बतलाया है कि मैं राजा कर्णोत्पल के राज्य में रहती हूँ और दाँतों को खरोंचकर उसने सूचित किया है कि मैं वहां के दन्त-वैद्य की कन्या हूँ। अपने कानों में कमल खोंसकर उसने अपना नाम पद्मावती बतलाया और हृदय पर हाथ रखकर सूचित किया कि तुम्हें मेरा हृदय अर्पित हो चुका है।'
उस रूपसी कन्या के इशारों का मतलब बता कर मंत्रीपुत्र बुद्धिशरीर ने राजकुमार से कहा- 'मित्र! कलिंग देश में कर्णोत्पल नाम का एक प्रसिद्ध राजा है। उसकी राजसभा में संग्रामवर्धन नाम का दाँतों का एक वैद्य है, जो उसका कृपापात्र है। वह रूपसी कन्या उसी की बेटी है।'
यह सुनकर राजकुमार वज्रमुकुट को संतोष हुआ। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। एक दिन वह शिकार के बहाने मंत्रीपुत्र को लेकर महल से निकल कर उसी दिशा की ओर चल पड़ा। आधी राह में अपने घोड़े को वायु वेग से दौड़ाकर उसने अपने सैनिकों को पीछे छोड़ दिया और केवल मंत्रीपुत्र के साथ कलिंग की ओर चल पड़ा।
कलिंग देश के राजा कर्णोत्पल के राज्य में पहुँचकर उन्होंने खोजबीन शुरू की। कुछ देर खोजबीन करने के बाद उन्हें दंतवैद्य संग्रामवर्धन का घर मिल गया। तब राजकुमार और मंत्रीपुत्र ने उसके घर के पास ही निवास करने के लिए एक वृद्धा स्त्री के घर में प्रवेश किया। मंत्रीपुत्र ने घोड़ों को दाना-पानी देकर उन्हें छिपाकर बाँध दिया। फिर उसने वृद्धा से पूछा- 'माता जी! क्या आप संग्रामवर्धन नाम के किसी दंत चिकित्सक को जानती हैं?"
यह सुनकर वृद्धा ने कहा- 'हाँ, जानती हूँ। मैं उनकी धायी हूँ, लेकिन अधिक उम्र होने के कारण, अब उन्होंने मुझे अपनी कन्या पद्मावती के पास रख दिया है, किंतु वस्त्रों से हीन होने के कारण मैं सदा वहां नहीं जाती। मेरा बेटा नालायक और जुआरी है। मेरे वस्त्र देखते ही वह उठा ले जाता है।'
यह सुनकर दोनों बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे धन, वस्त्र आदि देकर संतुष्ट कर दिया। तब मंत्रीपुत्र ने कहा - 'तुम हमारी माता के समान हों, अतः हम जो कहते हैं, उसे गुप्त रूप से कर दो। उस दंतवैद्य की कन्या पद्मावती से जाकर कहो कि जिस राजकुमार को तुमने सरोवर के किनारे देखा था, वह यहाँ आया है और तुम्हारी प्रीति के कारण उसने यह संदेश कहने के लिए मुझे यहाँ भेजा है। '
धन के लालच में आकर बुढ़िया ने कहा- 'ठीक है! मैं ऐसा ही करूँगी।' यह कहकर वह पद्मावती के पास गई और कुछ देर बाद लौट आई तथा बोली- ‘मैंने जब तुम लोगों के आने की बात गुप्त रूप से उससे कहीं, तो यह सुनकर उसने मुझे बहुत बुरा-भला कहा और कपूर लगे अपने हाथों से मेरे दोनों गालों पर थप्पड़ मारे। इस अपमान से दुःखी होकर मैं रोती हुई यहाँ लौट आई। मेरे चेहरे पर उसकी उँगलियों की यह छाप देख लो।' यह सुनकर राजकुमार निराश हो गया। उसे निराश देखकर महाबुद्धिमान मंत्रीपुत्र ने उससे कहा- 'मित्र! तुम दुःखी मत होओ। पद्मावती ने बुढ़िया को फटकार कर, कपूर से उजली अपनी दसों उँगलियों से उसके गालों पर मार कर, अपने रहस्य को गुप्त रखते हुए कहा है कि इस शुक्ल पक्ष की दस चाँदनी रातों तक प्रतीक्षा करो। ये रातें मिलन के लिए उपयुक्त नहीं हैं। '
दस दिन बीत जाने पर मंत्रीपुत्र ने बुढ़िया को फिर पद्मावती के पास भेजा। बुढ़िया पद्मावती के घर गई। वहां से लौटकर उसने कहा- 'जब मैं उसके पास गई, तो चुपचाप उसके सामने खड़ी हो गई। तब उसने स्वयं ही तुम्हारी बात कहने के मेरे अपराधों का उल्लेख करते हुए, मेरे हृदय पर महावर लगी अपनी तीन उँगलियों से आघात किया।'
यह सुनकर मंत्रीपुत्र ने एकान्त में राजकुमार से कहा- 'मित्र! तुम कोईदूसरी शंका मत करो। उसने बुढ़िया के हृदय पर महावर लगी तीन उँगलियाँ रखकर युक्तिपूर्वक यह सूचित किया है कि तीन रातों में मैं रजस्वला रहूँगी।' तीन रातें बीत जाने के बाद मंत्रीपुत्र ने बुढ़िया को फिर पद्मावती के पास भेजा। जब बुढ़िया पद्मावती के घर गई, तो उसने उसे आदरपूर्वक भोजन कराया और प्रेम से उसके साथ सारा दिन बिता दिया। शाम जब वह घर लौटने को उद्यत हुई, तभी बाहर से डरावना शोरगुल सुनाई दिया। लोग चीख-पुकार कर कह रहे थे- 'हाय! हाय! यह पागल हाथी जंजीर तोड़कर लोगों को कुचलता हुआ भागा जा रहा है।' यह सुनकर पद्मावती ने बुढ़िया से कहा- 'राजमार्ग को हाथी ने रोक रखा है। ऐसे में तुम्हारा जाना उचित नहीं है, अतः मैं तुम्हें रस्सियों से बँधी एक सीढ़ी पर बिठाकर, उस बड़ी खिड़की के रास्ते नीचे बगीचे में उतरवा देती हूँ। फिर तुम पेड़ के सहारे बाग की चारदीवारी पर चढ़ जाना, फिर वहां से दूसरी ओर के पेड़ पर जाकर नीचे उतर जाना और वहां से घर चली जाना।'
यह कहकर उसने रस्सी से बँधी एक सीढ़ी पर बुढ़िया को बिठाया और अपनी दासियों द्वारा खिड़की के रास्ते नीचे बगीचे में उतरवा दिया। फिर वह पद्मावती के बताए हुए उपाय से घर लौट गई और सारी बातें राजकुमार और मंत्रीपुत्र को ज्यों कि त्यों बता दीं।
सारी बातें सुनने के बाद मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा- 'मित्र! तुम्हारा मनोरथ पूरा हुआ। उसने युक्तिपूर्वक तुम्हें रास्ता भी बतला दिया। इसलिए आज शाम को तुम वहां जाओ और इसी मार्ग से अपनी उस प्रिया के भवन में प्रवेश करो।'
राजकुमार जब अंदर चला गया, तब मंत्रीपुत्र अपने निवास स्थान को लौट गया। राजकुमार को देखकर पद्मावती ने अनेक प्रकार से उसका सम्मान किया। फिर बहुत दिनों की उत्कंठा के कारण उसे गले लगा लिया। फिर राजकुमार ने उससे गांधर्व विधि से विवाह कर लिया और पूर्णकाम होकर, गुप्तरूप से वहीं रहने लगा। कई दिनों तक वहां रहने के बाद एक रात उसने अपनी प्रिया से कहा- 'मेरे साथ में मेरा मित्र मंत्रीपुत्र बुद्धिशरीर भी यहाँ आया है। वह यहाँ अकेला ही, तुम्हारी धाय के घर में रहता है। मैंने उसे कई दिनों से नहीं देखा। मुझे उसकी बहुत याद आ रही है। मैं उससे मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगा।'
यह सुनकर पद्मावती बोली- 'आर्यपुत्र! यह तो बताओ कि मैंने जो इशारे किए थे, उन्हें तुमने समझा या तुम्हारे मित्र बुद्धिशरीर ने?" राजकुमार बोला- 'मैंने उन इशारों को बिल्कुल नहीं समझा था। यह
तो मुझे दिव्य ज्ञान वाले मेरे मित्र बुद्धिशरीर ने समझाया था।' यह सुनकर पद्मावती बोली- 'यह बात इतनी देरी से कहकर आपने बड़ा अनुचित किया है। आपका मित्र होने के कारण वह मेरा भाई है। पान पत्तों से मुझे पहले ही उसका सत्कार करना चाहिए था । '
यह कहकर उसने राजकुमार को जाने की अनुमति दे दी। तब रात के समय वह जिस रास्ते से आया था, उसी रास्ते से अपने मित्र के पास चला गया। वहां उसने पद्मावती से उसके इशारों को समझने के बारे में उससे जो बातें हुई थीं वह सारी मंत्रीपुत्र को बता दीं। मंत्रीपुत्र अपने सम्बन्ध में कही गई इस बात को उचित न समझकर इसका समर्थन नहीं किया। इसी बीच रात बीत गई।
सवेरे संध्या वंदन आदि से निवृत्त होकर वे दोनों बातें कर ही रहे थे कि तभी पद्मावती की एक सखी, हाथ में पान और पकवान लेकर वहां आई। उसने मंत्रीपुत्र का कुशल-मंगल पूछा और लाई हुई चीजें उसे भेंट कर दी, लेकिन युक्तिपूर्वक उसने राजकुमार को भोजन करने से रोक दिया। बोली- 'मेरी स्वामिनी भोजन आदि के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रही है। ' यह कहकर वह वहां से चली गई।
उसके जाने के बाद मंत्रीपुत्र ने राजकुमार से कहा- 'मित्र! अब देखिए मैं आपको एक तमाशा दिखाता हूँ।' यह कहकर उसने उन पकवानों में से एक पकवान एक कुत्ते को दे दिया । कुत्ता उसे खाते ही मर गया।
यह देखकर राजकुमार ने उससे पूछा- 'मित्र! यह कैसा कौतुक है?" मंत्रीपुत्र बोला- 'मित्र! मैंने उसके इशारों को पहचान लिया था। इसलिए मुझे धूर्त समझकर उसने मेरी हत्या कर देनी चाही थी। तुमसे बहुत अनुराग होने के कारण, उसने मेरे लिए विष-मिश्रित अन्न भेजा था। उसे भय था कि इसके रहते राजकुमार एकमात्र मुझमें ही अनुराग नहीं रख सकेगा और इसके वश में रहकर, मुझे छोड़कर अपनी नगरी में चला जाएगा। इसलिए उस पर क्रोध न करो, बल्कि उसे अपने माता-पिता के त्याग के लिए प्रेरित
करो और सोच-विचार कर उसके हरण के लिए मैं तुम्हें जो युक्ति बतलात हूँ, उसके अनुसार आचरण करो । 'बोला-मंत्रीपुत्र की बात सुनकर राजकुमार उसकी प्रशंसा करते हुए'मित्र! तुम सचमुच ही 'बुद्धिशरीर' हो।' इसी बीच अचानक बाहर से लोगों का शोरगुल सुनाई पड़ा, जो कह रहे थे- 'हाय! हाय! राजा का छोटा बच्चा मर गया।'
यह सुनकर मंत्रीपुत्र बहुत प्रसन्न हुआ। उसने राजकुमार से कहा- 'मित्र! आज रात तुम पद्मावती के घर जाओ। वहां तुम उसे इतनी शराब पिलाना, जिससे वह नशे में बेहोश हो जाए, तब तुम त्रिशुल गरम करके उसकी कमर के पास दाग देना और उसके गहनों की गठरी बाँधकर, रस्सी के सहारे, खिड़की के रास्ते निकल कर यहाँ चले आना। फिर मैं सोच-विचार कर वैसा उपाय करूँगा, जिससे हमारा भला हो।' यह कहकर मंत्रीपुत्र ने तीखी नोकवाला एक त्रिशूल बनाकर राजकुमार को दे दिया। राजकुमार त्रिशुल लेकर पद्मावती के भवन में चला गया। वहां उसने उसे शराब पिला कर बेहोश कर दिया और त्रिशूल से उसके जघन-भाग पर चिह्न बना दिया। फिर उसके आभूषण उतार लिए और उन्हें पोटली में बाँध कर अपने मित्र के पास लौट आया। उसने मंत्रीपुत्र को आभूषण दिखाए और जो कुछ किया था, वह सारी बातें बता दीं। तब मंत्रीपुत्र ने अपने मनोरथ को सफल माना।
सवेरे श्मशान में जाकर मंत्रीपुत्र ने तपस्वी का रूप धारण किया और राजकुमार को अपना शिष्य बनाया। फिर उसने राजकुमार से कहा- 'मित्र! इन आभूषणों में से मोतियों की एक माला लेकर तुम बाजार में बेचने जाओ, लेकिन इसका दाम इतना अधिक बताना कि इसे कोई खरीद न सके और इसे लेकर घूमते हुए तुमको सब लोग देखें। अगर नगर रक्षक तुम्हें पकड़ें, तो बिना घबराए हुए तुम कहना कि 'मेरे गुरु ने इसे बेचने के लिए मुझे दिया है।'
राजकुमार हार लेकर बाजार चला गया और उसे लेकर बाजार में घूमने लगा। दंतवैद्य की बेटी के गहनों की चोरी की खबर पाकर, नगर रक्षक भी बाजार में घूम रहे थे। राजकुमार को हार के साथ देखकर उन लोगों ने उसे पकड़ लिया और उसे नगरपाल के पास ले गए। नगरपाल ने तपस्वी के वेश में राजकुमार को देखकर आदर सहित पूछा- 'महात्मन्! मोतियों की यह माला आपको कहाँ से मिली? पिछली रात दंतवैद्य की कन्या के आभूषण चोरी हो गए।'
यह सुनकर तपस्वी बने राजकुमार ने कहा- 'यह हार मुझे मेरे गुरु दिया है। आप चलकर उन्हीं से पूछ लें।' ने तब नगरपाल वहां गया और नमस्कार करके मंत्रीपुत्र से पूछा- 'महात्मन्! मोतियों की यह माला आपके शिष्य को कहाँ से मिली?'
तपस्वी बना मंत्रीपुत्र बोला- 'मैं तो तपस्वी हूँ। सदा जंगलों में यहाँ-वहां घूमा करता हूँ। संयोग से मैं पिछली रात श्मशान में गया। वहां मैंने कुछ योगिनियों को देखा। उनमें से एक योगिनी राजपुत्र को लेकर आई और उसने उसका हृदय कमल निकाल कर भैरव को अर्पित कर दिया। फिर मदिरा पीकर वह योगिनी मतवाली हो गई और मुझे मुँह चिढ़ाती हुई मेरी रुद्राक्ष माला को लेने दौड़ी, जिस पर मैं जप कर रहा था। यह देखकर मुझे क्रोध आ गया। तब मैंने अग्निबल से अग्नि जलाई और उसमें त्रिशूल तपा कर उसके जघन-भाग पर दाग दिया। उसी समय मैंने उसके गले से मोतियों की यह माला निकाल ली। किंतु मैं तपस्वी हूँ। यह माला मेरे किसी काम की नहीं है। इसीलिए मैं इसे बेचना चाहता हूँ।'
यह सुनकर नगरपाल राजा के पास गया और उसने सारा वृत्तांत राजा को सुना दिया। राजा ने सारी बातें सुनकर मोतियों की माला को पहचान लिया। फिर उन्होंने एक विश्वसनीय वृद्धा को यह देखने के लिए भेजा कि पद्मावती की जाँघ पर त्रिशूल का चिह्न है या नहीं? उसने लौटकर बताया कि सचमुच उसकी जाँघ पर वह चिह्न है। तब राजा को विश्वास हो गया कि मेरे बेटे को डंकनी खा गई है। वह स्वयं तपस्वी वेशधारी मंत्रीपुत्र के पास गए और बोले- 'महात्मन् ! पद्मावती को क्या दण्ड दिया जाए?"
मंत्रीपुत्र ने कहा- ‘राजन्! आप उसे नगर से निर्वासित कर दें।' नगर से निष्कासित होकर पद्मावती वनों में भटकती रही, लेकिन उसने आत्महत्या नहीं की। उसने सोचा कि यह सब उपाय मंत्रीपुत्र ने ही किया है। शाम होने पर, तपस्वी का वेश छोड़कर राजकुमार और मंत्रीपुत्र घोड़ों पर सवार होकर वहां पहुँचे, जहाँ पद्मावती शोक कर रही थी। उन्होंने उसे घोड़े पर बिठाया और अपने देश की ओर चल पड़े। अपने राज्य में पहुँचकर राजकुमार पद्मावती के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा।
इधर दंतवैद्य ने समझा कि मेरी बेटी को जंगली जानवरों ने खा डाला होगा। यह सोचकर वह शोक के कारण मर गया। उसकी पत्नी ने भी उसका अनुगमन किया. अर्थात उसकी भी मृत्यु हो गई।