
एक वृक्ष पर एक राक्षस निवास करता था। एक बार उस वृक्ष के नीचे से एक ब्राह्मण गुजर रहा था तो राक्षस उसके कन्धों पर जाकर बैठ गया।
राक्षस ब्राह्मण के कन्धों पर बैठते ही ब्राह्मण से कहने लगा- हे ब्राह्मण तुम मुझे पास के सरोवर तक ले चलो।
ब्राह्मण के मन में विचार आया की यह स्वयं ही सरोवर तक जा सकता था तो मेरे कन्धों पर बैठ कर क्यूँ जा रहा है? ब्राह्मण ने डरते-डरते पूछ लिया- तुम कौन हो और मेरे कन्धों पर क्यूँ बैठे हो?
राक्षस बोला - मैं एक राक्षस हूँ और मेरा नाम गंटक है और तुम मुझे सरोवर तक ले चलो नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊंगा।
ब्राह्मण ने राक्षस से पूछा- तुम खुद ही सरोवर तक क्यूँ नहीं चले जाते ?
राक्षस बोला - मैंने प्रण लिया है कि मैं गीले पैर जमीन पर नहीं रखूँगा इसीलिये मैं तुम्हारे कन्धों पर बैठ कर जा रहा हूँ।
ब्राह्मण उस राक्षस को सरोवर तक ले गया। जैसे ही दोनों सरोवर के पास पहुंचे राक्षस ब्राह्मण से बोला- अरे ब्राह्मण जब तक मैं इस सरोवर से नहाकर ना आ जाउं तुम कहीं मत जाना, नहीं तो मैं तुम्हे जीवित नहीं छोडूंगा।
जैसे ही राक्षस सरोवर में नहाने के लिया गया, ब्राह्मण ने सोचा कि अगर यह राक्षस सरोवर से नहाकर आ जाता है तो पक्का ही यह मुझे खा लेगा और अगर मैं भागता हूँ तब भी यह मुझे दौड़ कर पकड़ लेगा और खा जायेगा। तभी ब्राह्मण को एक बात की याद आई जो उसने बातों ही बातों में राक्षस से पूछ ली थी कि राक्षस ने तो गीले पैर जमीन पर नहीं रखने की कसम खाई है।
बस क्या था ब्राह्मण ने उस स्थान से दौड़ लगा दी और राक्षस उसे देखता ही रह गया, क्योंकि उसके पैर सरोवर मैं गीले हो गए थे और वह गीले पैर जमीं पर नहीं रख सकता था।