
Hindi Kahani - राक्षस का अंत
'उज्जयिनी में हरिस्वामी नाम का एक सद्गुणी ब्राह्मण रहता था। वह राजा पुण्यसेन का सेवक और मंत्री था। उसके पुत्र का नाम देवस्वामी था और पुत्री का नाम सोमप्रभा था। सोमप्रभा अपने अनूठे रूप लावण्य के लिए प्रसिद्ध थी।
जब सोमप्रभा विवाह योग्य हो गई. तो उसने अपने रूप के अभिमान में एक दिन अपने माता-पिता व भाई से कहा- 'अगर आप लोगों को मेरा जीवन प्यारा है, तो आप मेरा विवाह किसी वीर, ज्ञानी अथवा अलौकिक विद्याएं जानने वाले से ही करें। इनके अतिरिक्त मैं किसी और से विवाह नहीं करूंगी।'
यह सुनकर हरिस्वामी उसके लिए उसकी रुचि का वर ढूंढने के लिए चिंतित रहने लगा। इसी बीच राजा पुण्यसेन ने हरिस्वामी को अपना दूत बनाकर, दक्षिण देश के राजा के साथ संधि करने के लिए भेजा, क्योंकि वह युद्ध के लिए तैयार हो रहा था। जब वहां जाकर उसने अपना काम पूरा कर लिया, तब उसके पास एक श्रेष्ठ ब्राह्मण युवक आया। उसने हरिस्वामी की कन्या की रूप-सम्पदा की बात सुन रखी थी। उसने हरिस्वामी से उसकी कन्या का हाथ मांगा, तो हरिस्वामी बोला- 'मेरी कन्या पति के रूप में या तो अलौकिक विद्याएं जानने वाले को या ज्ञानी को अथवा वीर को ही स्वीकार करना चाहती है, किसी और को नहीं, अतः बताइए कि आप इनमें से कौन हैं?"
यह सुनकर ब्राह्मण युवक बोला- 'श्रीमान ! मैं अलौकिक विद्याएं जानता हूँ।' तब हरिस्वामी ने उसे अपनी विद्या का चमत्कार दिखाने को कहा। इस पर अलौकिक विद्याएं जानने वाले उस युवक ने अपनी विद्या के प्रभाव से एक आकाशगामी रथ तैयार कर दिया और बातों ही बातों में माया के यंत्रों वाले उस रथ पर बिठाकर हरिस्वामी को स्वर्ग आदि लोक दिखा लाया। इससे हरिस्वामी संतुष्ट हो गया। फिर वह हरिस्वामी को दक्षिण के राजा की उस सेना के पास लौटा लाया, जहां वह अपने काम से आया था। तत्पश्चात हरिस्वामी ने अलौकिक विद्या जानने वाले युवक को अपनी कन्या व्याहने का वचन दिया और सातवें दिन विवाह की तिथि निश्चित कर दी।
इसी समय उज्जयिनी में एक दूसरे ब्राह्मण युवक ने हरिस्वामी के पुत्र देवस्वामी के पास आकर उसकी बहन से विवाह की याचना की। देवस्वामी ने जब उसे यह बताया कि मेरी बहन ज्ञानी, अलौकिक विद्याएं जानने वाले या वीर के अतिरिक्त किसी और को पति रूप में नहीं चाहती, तब उस ब्राह्मण युवक ने अपने को वीर बताया और अपने अस्त्र-शस्त्रों का कौशल दिखाया, तब देवस्वामी ने उससे अपनी बहन का विवाह करने का निश्चय कर लिया और अपनी माता को बताए बिना ज्योतिषियों के कहने के अनुसार उसने भी सातवें दिन विवाह का मुहूर्त निश्चित कर दिया।
इसी प्रकार हरिस्वामी की पत्नी से भी किसी तीसरे ने आकर, अलग से उसकी कन्या से विवाह की याचना की। तब उसने कहा- 'मेरी कन्या ज्ञानी, वीर अथवा अलौकिक विद्याएं जानने वाले को ही अपना पति बनाना चाहती है।' वह युवक बोला- 'मां मैं ज्ञानी है।'
यह सुनकर हरिस्वामी की पत्नी ने उस युवक से भूत-भविष्य की बातें पूछी, जो उसने सही-सही बता दीं। फिर उसने भी सातवें दिन उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर देने का वचन दे दिया।
अगले दिन हरिस्वामी घर लौट आया। उसने अपनी पत्नी और पुत्र को बताया कि वह सोमप्रभा के लिए अलौकिक विद्याएं जानने वाले एक युवक से विवाह निश्चित कर आया है। उन दोनों ने भी उसे अलग-अलग बताया कि उन्होंने क्या किया है। तब वह एक साथ तीन बारातें बुलाने के कारण चिंता में पड़ गया।
फिर सातवें दिन विवाह की निश्चित तिथि को ज्ञानी, वीर और अलौकिक विद्याएं जानने वाले ये तीनों ही वर हरिस्वामी के घर पहुंचे। इसी बीच एक विचित्र घटना घट गई, हरिस्वामी की कन्या सोमप्रभा, जो वधु बनने वाली थी. अचानक कहीं गायब हो गई। ढूंढने पर भी उसका कुछ पता नहीं चला तब घबरा कर हरिस्वामी ने ज्ञानी युवक से कहा- 'हे ज्ञानी! अब जरा झटपट यह बताओ कि मेरी कन्या कहां है?"
यह सुनकर ज्ञानी युवक बोला 'धूमशिख नामक राक्षस उसे उठाकर विन्ध्याचल के वन में स्थित अपने घर ले गया है।' यह सुनकर हरिस्वामी डर गया। वह बोला 'हाय! अब वह कैसे मिलेगी और उसका विवाह कैसे होगा?'
यह सुनते ही अलौकिक विद्याएं जानने वाले युवक ने कहा आप चिंता न करें। ज्ञानी के कहने के अनुसार वह जहां ले जाई गई है, मैं आपको अभी वहां ले चलता हूं।' यह कहकर उसने कुछ ही देर में अस्त्र-शस्त्र से सजा एक आकाशगामी रथ बनाया और उस पर हरिस्वामी, ज्ञानी और वीर को बिठाकर विन्ध्याचल के उस वन में ले गया, जहां ज्ञानी ने राक्षस का भवन बताया था।
जब राक्षस को यह पता चला तो क्रुद्ध होकर अपने भवन से बाहर निकल आया हरिस्वामी के भेजने पर वह वीर पुरुष आगे बढ़ा और राक्षस से लड़ने । लगा। दोनों में भयानक युद्ध होने लगा। क्षण भर में उस वीर युवक ने अपनी तलवार से राक्षस का मस्तक काट दिया। राक्षस के मरते ही उसने सोमप्रभा को उसकी कैद से छुड़ा लिया। फिर वे सभी, अलौकिक विद्याएं जानने वाले युवक के रथ पर बैठकर वापस उज्जियनी लौट आए।
हरिस्वामी के घर पहुंचकर, सोमप्रभा से विवाह करने के लिए ज्ञानी, वीर और अलौकिक विद्याएं जानने वाले तीनों युवकों में झगड़ा होने लगा। ज्ञानी ने कहा- 'अगर मैं नहीं बताता कि सोमप्रभा राक्षस की कैद में है, तो वह कहाँ मिलती? इसलिए उसका विवाह मुझसे होना चाहिए।'
अलौकिक विद्याएं जानने वाला बोला- 'यदि मैं आकाशगामी रथ नहीं बनाता, तो देवताओं की तरह पल-भर में आना-जाना कैसे हो पाता ? इसलिए यह कन्या मुझे मिलनी चाहिए।' वीर ने कहा - 'यदि मैंने युद्ध में राक्षस को न मारा होता, तो आप लोगों के प्रयत्न करने पर भी इस कन्या को कैसे ले आया जा सकता? इसलिए यह कन्या मुझे मिलनी चाहिए।'
बेताल पच्चीसी से साभार