
Hindi Kahani - बहुत समय पहले किसी अनारदानंद नाम के एक मुनि रहते प्राप्ति के लिए उन्होंने अनेक वर्षों तक भगवान की तपस्या की, किंतु उन्हें भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ। तब वे ये सोचकर चिंतित रहने स्वर्ग कि कहीं उनकी तपस्या करने की विधि में ही तो कोई दोष नहीं है इस तरह विचार कर हो रहे थे कि चतुरानन नाम के एक ऋषि उनके आश्रम में पधारें, नारदानंद ने उनका स्वागत-सत्कार किया और उनके सामने अपनी समस्या रखी।
नारदानंद को समस्या सुनने के बाद ऋषि चतुरानन ने कहा- "मित्र मानत शरीर के लिए कुछ प्रयोजन निश्चित किए गए हैं। मरने से पहले हर मनुष्य को कोई न कोई प्रयोजन पूरा करना चाहिए ऐसा न हो तो वह पुनर्जन्म लेकर बार-बार इस भूलोक में आएगा और यहाँ का होकर रह जाएगा जन्म जो सार्थक होने पर ही मुक्ति प्राप्त होती है। तुमायोजन कार्य किए छोटी उम्र में ही प्रारंभ करके मोक्ष की आशा रखते हो इसीलिए भगवान् का साक्षात् नहीं होता। तुम के बदले लोक-कल्याण हेतु किसी उपयोगी कार्य को लक्ष्य बनाकर तपस्या करो तभी तुम्हे भगवान् का साक्षात्कार होगा या फिर मेरी तरह संसार में भ्रमण करते हुए कुछ समय तक सत्कार्य करके तप करो, तब तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी। तुम्हारे तप के विधान में तो कोई त्रुटि नहीं है, परंतु तुम्हारे लक्ष्य में दोष है।'
यह सुनकर नारदानंद ने उनसे निवेदन किया- 'मुनिवर! जीवन के प्रति मेरा कोई अनुराग नहीं है। जहाँ तक हो सके आप शीघ्र ही भगवान् से मिलने का मुझे कोई उपाय बताइए। ' चतुरानन बोले- 'उपाय तो है, लेकिन है बड़ा कठिन । तुम तुरंत प्रजा के बीच जाकर निःस्वार्थ भाव से सत्कार्य करो। उसके बाद यहाँ लौटकर तप करो, तो तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी।' नारदानंद ने पूछा- 'ऋषिवर! कृपया यह बताइए कि यह कार्य कठिन कैसे हुआ?"
चतुरानन बोले- 'जो सत्कार्य तुम करोगे, उसमें रत्तीभर भी जीवन के प्रति अनुराग पैदा हो गया, तो तुम्हारा तप भंग हो जाएगा।' नारदानंद ने संदेह व्यक्त करते हुए कहा- 'सत्कार्य करने में मेरा लक्ष्य मोक्ष है तो इसमें भी मेरा स्वार्थ ही काम करने लगता है न।' चतुरानन ने दृढ़तापूर्वक कहा- 'ऐसा नहीं हो सकता। जब तुम्हारा लक्ष्य ही मोक्ष है, तब तुम्हारा सत्कार्य लोक-कल्याणकारक है, तब ऐसे भले कार्य में स्वार्थ की गंध नहीं होती।'
चतुरानन की बात सुनकर नारदानंद को शांति प्राप्त हुई। चतुरानन के वहां से जाने के बाद नारदानंद वह आश्रम छोड़ कर निकटवर्ती मधुरास्य नगर में जा पहुँचे। वे नगर भ्रमण करते हुए एक घर के सामने ठहर गए। उस घर से रोने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। यह सुनकर मुनि बिना किसी झिझक उसके अंदर चले गए। वह घर एक सम्पन्न व्यापारी का था। उसकी पुत्री रूपवती को एक साँप ने डस लिया था। नब्बे वर्षीया उसकी दादी ने उस विष को चूसकर अपनी पौत्री की रक्षा करनी चाही, लेकिन विष चूसने से वह बेहोश हो गई। इन दोनों के जीने की कोई आशा न रही। वैद्यों के प्रयास असफल हो गए, तो घर में कोहराम मचना शुरू हो गया। तब मुनि नारदानंद ने सारी बातें जानकर कहा- 'इस नगर में श्रीकांत नामक एक व्यापारी है। उसके पास एक अँगूठी व जड़ी-बूटी है। उस जड़ी-बूटी की सहायता से सर्पदंश के शिकार व्यक्ति को बचाया जा सकता है।'
मुनि की बात सुनकर व्यापारी ने अपने सेवक को बुलाया तथा उस जड़ी-बूटी को लाने के लिए श्रीकांत के घर जाने को कहा। मुनि ने एक अनूठी अँगूठी की रचना करके सेवक को दी, जिसे पहनते ही वह सेवक अदृश्य हो गया। उसके बाद हँसी के साथ उसकी बोली हुई ये सारी बात वहां सभी उपस्थित लोगों ने सुनीं 'यह धनी व्यापारी बहुत ही दुष्ट है। ईमानदार और स्वामिभक्त होने पर भी यह मेरा अपमान करके मुझे तंग करता रहता है। इसके अपराधों के कारण ही साँप ने इसकी बेटी को यहाँ आकर इसा है। अब मैं इस अँगूठी की सहायता से इसका माल चोरी करके सुखपूर्वक जीवन बिताऊँगा।'
यह सुनकर व्यापारी चिंतित होकर बोला- 'मुनिवर! अँगूठी के साथ वह भी गायब हो गया है। अब मेरी पुत्री की रक्षा के लिए स्वयं ही उससे उस अँगूठी को वापस ले लीजिए।' मुनि बोले- 'इस अँगूठी का निर्माण करके मैंने अब तक अपना बहुत-सा तपोवल नष्ट कर दिया है। तुम्हारे सेवक को पकड़ने के लिए अब मैं अपना और तपोबल नष्ट नहीं कर सकता। मैं स्वयं जाकर श्रीकांत से मिलूँगा और उसे समझा-बुझाकर जड़ी-बूटी ले आऊँगा। भगवान् की यही इच्छा है।'
यह कहकर मुनि स्वयं श्रीकांत के पास गए और उसे सारी बातें बताकर उन्होंने उससे वह जड़ी-बूटी माँगी। श्रीकांत ने पहले तो मुनि को वह जड़ी-बूटी देने से स्पष्ट इनकार कर दिया, लेकिन बाद में उसने कुछ सोच-विचार कर कहा- 'मुनिवर! मैं आपको एक शर्त पर यह बूटी दे सकता हूँ।' मुनि ने पूछा- 'कैसी शर्त?' श्रीकांत ने कहा- 'मुनिवर ! शर्त यह है कि रूपवती और उसकी दादी दोनों में से आप किसी एक के लिए ही इसका उपयोग करेंगे। आप उस बूटी से सिर्फ रूपवती को ही जिंदा करेंगे और जब वह जीवित हो जाएगी, तो उसे मेरे साथ विवाह करना होगा।'
मुनि ने पलभर विचार किया. फिर बोले 'रूपवती की दादी की आयु नब्बे वर्ष की हो चुकी है, अतः रूपवती को जिन्दा करना ही न्यायसंगत होगा, पर शादी तो उसके साथ तुम्हारी तभी होगी, यदि वह भी तुमसे विवाह करने के लिए रजामंद हुई तो।' यह सुनकर श्रीकांत क्रोधित होकर बोला- 'रूपवती और मैं एक-दूसरे से प्यार करते हैं। घर में बड़ों के कारण ही हमारे प्रेम में बाधा पड़ गई। मेरे पिता के निधन के बाद मैंने ही निर्लज्ज होकर रूपवती के साथ विवाह करने का प्रस्ताव उसके पिता के सामने रखा था, किन्तु उसने न सिर्फ मेरा अपमान किया, अपितु मुझे नौकरों से पिटवाया भी बहुत बेइज्जत करके उसने मुझे अपने घर से निकाला था।' मुनि ने कहा- 'अब जो हो चुका है उसे भूल जाओ। तुम बूटी लेकर मेरे साथ चलो। अगर रूपवती तुम्हारे इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगी, तो उससे विवाह कराने का उत्तरदायित्व मैं अपने ऊपर लेता हूँ।'
श्रीकांत बूटी लेकर मुनि के साथ चल दिया। दोनों व्यापारी के घर पहुँचे। बूटी के प्रभाव से रूपवती जीवित हो गई। कुछ ही क्षण बाद उसकी दादी भी जीवित हो उठी। तब श्रीकांत बोला- 'रूपवती को मैंने ही जीवनदान दिया है।' श्रीकांत की बात सुनकर मुनि बोले- 'रूपवती के जिंदा होने का मूल कारण तो मैं हूँ। मैं भी उससे प्यार करने लगा हूँ। हम दोनों में से जिसे वह चाहती है, वही उसके लिए योग्य वर हो सकता है।' रूपवती से जब इस विषय में पूछा गया तो उसने बजाय श्रीकांत का वरण करने के मुनि को ही वरन करना स्वीकार किया। मुनि ने भी अपने तपस्वी जीवन को तिलांजलि दे दी और रूपवती के साथ विवाह करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया। फिर उन्होंने सुखपूर्वक अपना जीवन बिताया।