Hindi Kavita –
आज कुछ यूँ ही...!
तुम्हारे शब्द
कभी कभी
तो केवल चुभते हैं,
लेकिन,
तुम्हारी खामोशियां तो बस,
मार ही देती हैं...!
कितने फरेबी हैं,
आजकल के कुछ लोग,
रोशनी दिखा कर,
अंधेरों में गिरा देते हैं...!
कैसी विडंबना है,
हमारी ख्वाहिशें, हमारे सपने,
दोनों ही अक्सर,
ज़िंदगी की जरूरतों,
और
जिम्मेदारियों में ही,
दम तोड़ जाती हैं...!
हर रोज,
सपने देखना,
कभी बन्द नहीं करना,
क्योंकि,
ये देखे सपने ही,
हमें,
आसमान की ऊँचाईयों में,
ले जाते हैं...!
डा. एस.एस. दास
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