Hindi Kavita –
चरागों को जलाकर के,
अब अंधेरों को मिटाना है
नफरत के इन बीजों को,
अब जड़ से उखाड़ना है ॥
कोई आकर हमसे ये पूछे,
हमको क्या करना है
मिटाकर नफ़रतें दिल से,
उजाला वहां पे भरना है ॥
जो रूठे हुए हैं अभी तक,
उन्हें अब मनाना है
नफरत की चढ़ी है धूल,
दिल से उसे हटाना है ॥
एक छोटी सी किरन को अब,
अंगारा बनाना है
धधकती आग है जो दिल में,
उसे और बढ़ाना है ॥
अपनी इस हिम्मत को,
हमें और बढ़ाना है
दुश्मन की हर चालों को,
हमें उलटा लौटाना है ॥
हमें दे दे वह शक्ति,
अब शक्ति बढ़ाना है
जगाकर विश्वास दिल में,
अब विश्वास जगाना है ॥
कमलेश संजीदा
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