Hindi Kavita –
अपनों ने कहा ठहर जा तू,
दो दिन के बाद शहर जा तू,
विगत दिवस तो आया है,
हृदय नहीं भर पाया है।
इतनी जल्दी जाता, आकर,
दूर कहीं घर से जाकर।
कहा वीर, न रोक मुझे,
बढ़े कदम, न टोक मुझे,
घर-बार मुझे भी प्यारा है,
पर, राष्ट्र प्राण से न्यारा है।
चले शूर आज्ञा पाकर,
दूर कहीं घर से जाकर।
कहता डटकर परवाना है,
मरने से क्यों घबराना है,
मर जाऊँ मैं पर देश रहे,
जग में मेरा संदेश रहे।
दूँगा कुर्बानी मुस्काकर
दूर कहीं घर से जाकर।
वृथा जन्म, न जो देश बचा,
मरकर जो न इतिहास रचा,
वीरों का सीस न झुक सकता,
तूफा का वेग न रुक सकता।
हम बढ़ते राष्ट्रगान गाकर,
दूर कहीं घर से जाकर।
- अनिल मिश्र प्रहरी
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