Hindi Kavita –
जीवन में मधुसम प्रेम घोल, ऊँचे स्वर में न इतना बोल,
अपने को न अधिक तोल, जीवन में मधुसम प्रेम घोल।
सूरज ने नित आकर, धरणी पर किरणें डाली,
पृथ्वी ने खुश हो, निजगोद में हरियाली पाली।
शीतल समीर संग, झूम उठी, फूलों की डाली,
रे मन तू प्रकृति संग रहके, प्रेम भरी वाणी बोल।
जीवन में मधुसम प्रेम घोल, ऊँचे स्वर में न इतना बोल,
अपने को न अधिक तोल, जीवन में मधुसम प्रेम घोल।
सागर से भर मेघों ने, हर्षित हो पानी वर्षाया,
पर्वतों ने पीला रंग त्याग, हरितवस्त्र सजाया।
नदियों का सिंधु से, क्रीड़ा हेतु मन ललचाया,
रे मन तू प्रकृति संग रहके, सुरमयी वाणी बोल।
जीवन में मधुसम प्रेम घोल, ऊँचे स्वर में न इतना बोल,
अपने को न अधिक तोल, जीवन में मधुसम प्रेम घोल।
मनुज प्राण देनी विटप, सुन्दर और सजीले,
जो पर हित देते फल, खट्टेमीठे और रसीले।
तू उन्हें क्यों काट रहा ? ओ मूढ़मनुज हठीले,
रे मन तू प्रकृति रक्षक बन, पेड़ों के संग डोल।
जीवन में मधुसम प्रेम घोल, ऊँचे स्वर में न इतना बोल,
अपने को न अधिक तोल, जीवन में मधुसम प्रेम घोल।
- अजय शोभने
————————————————
यदि आपको भी कहानी, कविता, गीत व गजल लिखने का शौक है तो उठाइए कलम और अपने नाम व पासपोर्ट साइज फोटो के साथ भेज दीजिए। चेतना मंच की इस ईमेल आईडी पर- chetnamanch.pr@gmail.com
हम आपकी रचना को सहर्ष प्रकाशित करेंगे।
देशविदेश की खबरों से अपडेट रहने लिए चेतना मंच के साथ जुड़े रहें।देश-दुनिया की लेटेस्ट खबरों से अपडेट रहने के लिए हमें फेसबुकपर लाइक करें या ट्विटरपर फॉलो करें।