Hindi Kavita –
काश जिंदगी मेरी कोई किताब होती,
जिक्र तुम्हारे पन्नों को मैं फाड़ देती।
स्याही जिस कलम की इस्तेमाल होती,
उस काँच की शीशी को मैं उजाड़ देती।
सहारा क्यों दिया तुमने,
जबकि खुद को में संभाल लेती।
हाँ गिरती कई बार चूने मेरे रास्तों पर,
लेकिन विश्वास है मुझे, खुद को मैं संभाल जाती ।
दिखाये कि तुम्हारे उन बातों को,
काश, पहले ही मैं पहचान पाती।
जाहिर कर देते वो राज़, जो दिल में थे तुम्हारे
सच कहती हूँ, अपने जिक्र को भी
तुम्हारे (जिन्दगी की) किताब में टाल देती ।
नेहा वनकर
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