Hindi Kavita –
बुझ गए जब से दिये मेरी आँखों के
तब से अँधेरे रास मुझे आने लगे।
दौड़ता था जब कभी जिन राहों पर
पग पग ठोकरे खाते फिरे उन राहों पर
जिंदगी ने सिखा दिये कुछ तो सबक
हर कदम गिरकर अब सम्भलने लगे।
दूर पास की जैसे कोई बात नहीं
ना कोई उम्मीद और कोई चाह नहीं
चारों दिशाओं में गूंजती कौन है तू कौन है
तू वो सदायें छूकर कानो को गुजरने लगे।
थी जब आँखे फर्क लोगों में दिखता रहा
अब ये एहसास मुझे याद दिलाता रहा
आज जो है कल वो शायद हो न हो
सोचकर गम बनकर ख़ुशी बहने लगे।
चल पड़े जिस राह वो कुछ कहना चाहे
ये जमीं वो आसमान कुछ कहना चाहे
खाक है सब खाक में मिल जायेंगे
अपना पराया कोई नहीं समझने लगे।
आदत सी हो गयी है तन्हाइयों में जीने की
चल रहे है कहा जा रहे कोई डगर नहीं
थक चुके है पाँव आसान ये सफ़र नहीं
ढूंढती है निगाहें कहाँ है मंजिल खबर नहीं।
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