Hindi Kavita – कहाँ तलक यूँ तमन्ना को दर-ब-दर देखूं
Hindi Kavita
भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 06:17 AM
Hindi Kavita –
कहाँ तलक यूँ तमन्ना को दर-ब-दर देखूं,
सफ़र तमाम करूँ मैं भी अपना घर देखूं।
सुना है मीर से दुनिया है आइनाख़ाना,
तो क्यों न फिर इस दुनिया को बन-संवर देखूं।
छिड़ी है जंग मुझे ले के ख़ुद मेरे भीतर,
फलक की बात रखूं या शकिस्ताँ पर देखूं।
हरेक शय है नज़र में अभी बहुत धुँधली,
पहाड़ियों से ज़मीं पर ज़रा उतर देखूं,
तलाश में है उसी दिन से मंज़िल मेरी,
मैं ख़ुद में ठहरा हुआ जबसे इक सफ़र देखूं।
मेरे सुकून का कब पास अक्ल ने रखा,
सहर के साथ ही मैं तपती दोपहर देखूं।
अखिलेश तिवारी
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