Hindi Kavita –
दिग्भ्रमित हो रातभर
एक मधुप उड़ता रहा
मधुरस से भरे हुए अपने
कंवल को ढूंढता रहा
हिय था व्याकुल
और उदास
वन सघन उड़ता फिरा
था लिए मन में
मधुर मिलन की आस
चांदनी ने भी चिढ़ाया
परिहास कर उसने
भ्रमर को भरमाया
कलियों ने राहों को
बिछकर सजाया
मानी नहीं उसने हार
चुनौतियों को करता गया
वो सहज-सहर्ष स्वीकार
पहुंचा वह मानस सरोवर
थे खिले कई कमल -दल
कोमल, सुंदर और सरस
सुवासित थे निर्झर कल-कल
निज कमलिनी को देख मधुप
हर्षित हुआ वह प्रतिपल
बंद वह पंखुड़ियों में हो गया
रात भर महके कमल-दल।
अलका सोनी
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