Hindi Kavita –
वैसी ही हमदर्दी रखते, हम मज़दूर, किसानों से
जैसी हमदर्दी रहती है, शम्मा को परवानों से।
हम अतीत के किस्से लाते खंडहर के तहखानों से,
जिनसे दूरी बढ़ जाती, इंसानों की इंसानों से।
भोला मतदाता कृतज्ञ है, रोटी के एहसानों से
उसका मन बहला देते हम, परियों के अफ़सानों से।
अपने मन की बातें करते, खेतों से खलहानों से
लेकिन उनकी बात न सुनते, हरगिज़ अपने कानों से।
खेल खेलना काम है,अपना निर्धन के अरमानों से,
अंदर खाने रिश्ते अच्छे रखते, कोष ख़ज़ानों से।
किसने क्या पाया हमको, काला झंडा दिखलाने से
अपना तंत्र लगा देता है, सबके होश ठिकाने से।
लोकतंत्र की परम्पराएं रखते हम पैताने से
न्यायालय हमको क्या समझा पाएगा,समझाने से ?
उदय प्रताप सिंह
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