Hindi Kavita –
मेरी ही ज़मी, मेरा आकाश
हर दिन सूर्य, मुझ में उगता है,
सुनहरी किरण बिखेर,
मुझ में डूबता है
पंछियों के करतब- कलरव,
मुझ में ही बसते हैं,
कोलाहल करते हैं।
यह हिमशिखर अटल,
कभी मुझ में जमे,
कभी पिघले रहते हैं,
अक़्सर कहते हैं,
वह पल भी नहीं ठहरा,
नहीं ठहरेगा यह भी पल।
प्रकृतिस्थ होती हूं,
जब प्रकृति के बीच,
यह मुझ में गुनगुनाती,
गीत गाती है
मुझ में ही सकल,
खिल जाती है,
नव सृजन की,
गाथाएं रच जाती है।
मानवता के दुख,
मुझ में रिसते हैं
ख़ुशियाँ भी यहीं,
रक़्स करती हैं,
अनुभूतियों की,
कलम थामे
मेरी नित् नव्य रचना,
सुख- दुख को यहीं,
परिभाषित करती है।
पूर्णत्व से प्रगट,
पूर्णत्व में समाहित,
सृष्टि के पुरातन,
नव रूपों से झांकता,
मेरा अभिन्न अस्तित्व,
कहीं भी अधूरा- अपूर्ण नहीं।
- अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'
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