Hindi Kavita –
मिलने को वो मुझसे पल भर भी नहीं मिलता,
दिल उससे मिला जिससे मुकद्दर नहीं मिलता।
आखिर का वैहसातो का सलीखा सा हो गया,
चलते रहे तो रास्ता अपना सा हो गया।
थे आईनो में हम तो कोई देखता न था,
आईना क्या हुए की तमाशा सा हो गया।
आईने में चेहरा नुमायी का देखना यहाँ,
आँख जब उठायी तो पर्दा सा हो गया।
गुजरा था कब इधर से उमीदों का ये हुजूम
इतने दिए जले की अँधेरा सा हो गया।
यूँ ही दिल दहि को दिन भी हुआ रात भी हुई,
गुजरी कहां थी उम्र गुजरा सा हो गया।
हर शाम एक मलालत सी आदत हो गयी,
मिलने की इंतजार भी मिलना सा हो गया।
आखिर का वैहसातों का सलीखा सा हो गया,
चलते रहे तो रास्ता अपना सा हो गया।
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