Hindi Kavita –
हमने ही तो प्रेम धरा में
क्रोध का बांध बनाया है।
छोड़ एकता की बंधन को
भेदभाव अपनाया है।
हमने ही पावन धरती में
नफरत का बीज बोया है।
स्वार्थ लोभ की ज्वाला में
आपनो को ही खोया है।
धर्म जात का पाठ सभी को
हमने ही सिखलाया है।
हमने ही तो राम रहीम को
आपस में लड़वाया है।
स्वेत चन्द्रमा की ललाट पे
क्या खन्डित धरती रोयेगी।
या प्रेम वृछ की छाया में
पुलकित होकर सोयेगी।
क्या इन्द्रधनुष सी धरती में
और रंग सजायेंगे।
या क्रोध ईर्ष्या की ज्वाला में
नफरत को सुलगाएँगे।
क्या आर्यव्रत की धरती को
टुकड़ों में बटवाएंगे।
या वीर तिरंगे की मिट्टी में
प्रेम का बीज लगाएंगे।
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