रोज़ाना हो के आते हैं
ख़यालात अजल के
चमकते टूटते सितारों
के बीच
पर नज़दीकियों ने दिखा दी
असलियत उनकी - महज़
पत्थरों के वहाँ कुछ न मिला
रौशन चाँद भी बेआबरू था
न पाया पत्थरों के सिवा कुछ
और उसमें
या ख़ुदा! तेरा कितना शुक्रिया
है
जादू फ़रेब का रच तूने अपना
जहां काबिल-ए-दीद कर
क्या ख़ूब, कितना ख़ुशनुमा बना
डाला
भले हर नेमत को निगाहों ने जो
देखा -
तो पाया महज़ साया भरम का
ऐ ज़मीं तू तो ज़िंदगी है- आस्मां
पे उड़ते चहचहाते परिंदे,
हरियाली, लहलहाते रंग ज़मीं के
राग रंग से भरपूर दुनिया,
क्या नदी और क्या ही समंदर
भरपूर हर शय है जहां की
बला की ख़ूबसूरती से
बस इंसान तेरी दख़लंदाज़ी-
सब कुछ ही पाने की तमन्ना
बेमौत मौत मारे बशर कितने
दोज़ख़ इस जन्नत को बनाकर
सुरेश हजेला
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