तुलसी का पौधा सही दिशा में नहीं लगाया तो हो जाएगा अनर्थ
भारत
चेतना मंच
15 Sep 2025 05:49 PM
तुलसी
का
पौधा
कोई
सामान्य
पौधा
नहीं
है।
दुनिया
भर
में
हिन्दू
समाज
तुलसी
के
पौधे
की
पूजा
करता
है।
तुलसी
का
पौधा
भगवान
विष्णु
की
धर्मपत्नी
माता
लक्ष्मी
का
स्वरूप
है।
भगवान
विष्णु
ने
लक्ष्मी
माँ
को
तुलसी
के
अवतार
में
पैदा
होने
का
वरदान
प्रदान
कर
रखा
है।
यही
कारण
है
कि
सनातन
धर्म
की
परम्परा
को
मानने
वाले
हर
हिन्दू
के
घर
के
आँगन
में
तुलसी
का
पौधा
लगाया
जाता
है।
तुलसी
का
पौधा
हमेशा
सही
दिशा
में
लगाना
चाहिए।
तुलसी
का
पौधा
गलत
दिशा
में
लगाने
के
कारण
बहुत
बड़ी
गड़बड़ी
हो
सकती
है।
Tulsi Plant
किस दिशा में लगाएं तुलसी का पौधा?
धार्मिक
जानकारी
रखने
वाले
विशेषज्ञों
के
अनुसार
घर
के
आँगन
में
तुलसी
का
पौधा
बहुत
ही
सोच
-
समझकर
लगाना
चाहिए।
घर
में
तुलसी
के
पौधे
को
लगाते
समय
वास्तु
का
विशेष
ध्यान
रखना
अनिवार्य
बताया
गया
है।
वास्तु
विज्ञान
के
अनुसार
,
तुलसी
का
पौधा
लगाने
के
लिए
उत्तर
,
उत्तर
-
पूर्व
,
पूर्व
या
मध्य
दिशा
का
चुनाव
करना
चाहिए।
कहते
हैं
कि
इन
दिशाओं
में
तुलसी
का
पौधा
लगाना
सकारात्मक
ऊर्जा
पैदा
करने
वाला
होता
है।
इसके
साथ
ही
जीवन
में
सुख
-
समृद्धि
आती
है।
वास्तु
विज्ञान
के
अनुसार
,
घर
की
दक्षिण
दिशा
में
तुलसी
का
पौधा
नहीं
लगाना
चाहिए।
दक्षिण
दिशा
में
तुलसी
का
पौधा
लगाने
से
लाभ
के
बजाए
नुकसान
पहुंचा
सकता
है।
वास्तु
में
घर
के
केंद्र
यानी
मध्य
में
तुलसी
के
पौधा
को
लगाना
सबसे
उत्तम
माना
गया
है।
वास्तु
शास्त्र
के
अनुसार
,
तुलसी
का
पौधा
घर
के
मुख्य
द्वार
के
पास
होना
चाहिए।
इसका
अर्थ
यह
नहीं
है
कि
आपको
मेनगेट
के
ठीक
पास
में
ही
तुलसी
का
पौधा
लगाना
है।
तुलसी
को
घर
के
सामने
वाले
हिस्से
या
घर
के
आंगने
में
रखना
चाहिए।
कहते
हैं
कि
ऐसा
करने
से
वास्तु
दोष
दूर
होता
है
और
घर
में
सुख
-
शांति
बनी
रहती
है।
तुलसी
का
पौधा
हमेशा
ऐसी
जगह
पर
लगाना
चाहिए
जहां
पर्याप्त
धूप
आती
हो
,
तुलसी
का
पौधा
लगाने
के
लिए
घर
के
आंगन
को
सबसे
उपयुक्त
स्थान
माना
गया
है।
जिन
घरों
में
आंगन
की
व्यवस्था
नहीं
है
उन
घरों
में
तुलसी
के
पौधे
को
बालकनी
में
लगाना
चाहिए।
तुलसी के पौधे की पूजा करते समय तुलसी चालीसा का पाठ उत्तम माना गया है
हिन्दू
धर्म
के
सभी
परिवारों
में
तुलसी
के
पौधे
के
रूप
में
माँ
लक्ष्मी
की
पूजा
की
जाती
है।
तुलसी
के
पौधे
की
पूजा
करते
समय
तुलसी
चालीसा
के
पाठ
को
सर्वोत्तम
माना
गया
है।
यदि
आपको
तुलसी
चालीसा
का
पाठ
याद
नहीं
है
तो
आप
तुलसी
चालीसा
को
पढक़र
भी
पाठ
कर
सकते
हैं।
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यह रहा तुलसी चालीसा
॥ दोहा॥
जय
जय
तुलसी
भगवती
सत्यवती
सुखदानी।
नमो
नमो
हरि
प्रेयसी
श्री
वृन्दा
गुन
खानी॥
श्री
हरि
शीश
बिरजिनी
,
देहु
अमर
वर
अम्ब।
जनहित
हे
वृन्दावनी
अब
न
करहु
विलम्ब॥
॥ चौपाई ॥
धन्य
धन्य
श्री
तुलसी
माता।
महिमा
अगम
सदा
श्रुति
गाता॥
हरि
के
प्राणहु
से
तुम
प्यारी।
हरीहीँ
हेतु
कीन्हो
तप
भारी॥
जब
प्रसन्न
है
दर्शन
दीन्ह्यो।
तब
कर
जोरी
विनय
उस
कीन्ह्यो॥
हे
भगवन्त
कन्त
मम
होहू।
दीन
जानी
जनि
छाडाहू
छोहु॥
सुनी
लक्ष्मी
तुलसी
की
बानी।
दीन्हो
श्राप
कध
पर
आनी॥
उस
अयोग्य
वर
मांगन
हारी।
होहू
विटप
तुम
जड़
तनु
धारी॥
सुनी
तुलसी
हीँ
श्रप्यो
तेहिं
ठामा।
करहु
वास
तुहू
नीचन
धामा॥
दियो
वचन
हरि
तब
तत्काला।
सुनहु
सुमुखी
जनि
होहू
बिहाला॥
समय
पाई
व्हौ
रौ
पाती
तोरा।
पुजिहौ
आस
वचन
सत
मोरा॥
तब
गोकुल
मह
गोप
सुदामा।
तासु
भई
तुलसी
तू
बामा॥
कृष्ण
रास
लीला
के
माही।
राधे
शक्यो
प्रेम
लखी
नाही॥
दियो
श्राप
तुलसिह
तत्काला।
नर
लोकही
तुम
जन्महु
बाला॥
यो
गोप
वह
दानव
राजा।
शङ्ख
चुड
नामक
शिर
ताजा॥
तुलसी
भई
तासु
की
नारी।
परम
सती
गुण
रूप
अगारी॥
अस
द्वै
कल्प
बीत
जब
गयऊ।
कल्प
तृतीय
जन्म
तब
भयऊ॥
वृन्दा
नाम
भयो
तुलसी
को।
असुर
जलन्धर
नाम
पति
को॥
करि
अति
द्वन्द
अतुल
बलधामा।
लीन्हा
शंकर
से
संग्राम॥
जब
निज
सैन्य
सहित
शिव
हारे।
मरही
न
तब
हर
हरिही
पुकारे॥
पतिव्रता
वृन्दा
थी
नारी।
कोऊ
न
सके
पतिहि
संहारी॥
तब
जलन्धर
ही
भेष
बनाई।
वृन्दा
ढिग
हरि
पहुच्यो
जाई॥
शिव
हित
लही
करि
कपट
प्रसंगा।
कियो
सतीत्व
धर्म
तोही
भंगा॥
भयो
जलन्धर
कर
संहारा।
सुनी
उर
शोक
उपारा॥
तिही
क्षण
दियो
कपट
हरि
टारी।
लखी
वृन्दा
दुःख
गिरा
उचारी॥
जलन्धर
जस
हत्यो
अभीता।
सोई
रावन
तस
हरिही
सीता॥
अस
प्रस्तर
सम
ह्रदय
तुम्हारा।
धर्म
खण्डी
मम
पतिहि
संहारा॥
यही
कारण
लही
श्राप
हमारा।
होवे
तनु
पाषाण
तुम्हारा॥
सुनी
हरि
तुरतहि
वचन
उचारे।
दियो
श्राप
बिना
विचारे॥
लख्यो
न
निज
करतूती
पति
को।
छलन
चह्यो
जब
पार्वती
को॥
जड़मति
तुहु
अस
हो
जड़रूपा।
जग
मह
तुलसी
विटप
अनूपा॥
धग्व
रूप
हम
शालिग्रामा।
नदी
गण्डकी
बीच
ललामा॥
जो
तुलसी
दल
हमही
चढ़
इहैं।
सब
सुख
भोगी
परम
पद
पईहै॥
बिनु
तुलसी
हरि
जलत
शरीरा।
अतिशय
उठत
शीश
उर
पीरा॥
जो
तुलसी
दल
हरि
शिर
धारत।
सो
सहस्त्र
घट
अमृत
डारत॥
तुलसी
हरि
मन
रञ्जनी
हारी।
रोग
दोष
दुःख
भंजनी
हारी॥
प्रेम
सहित
हरि
भजन
निरन्तर।
तुलसी
राधा
मंज
नाही
अन्तर॥
व्यन्जन
हो
छप्पनहु
प्रकारा।
बिनु
तुलसी
दल
न
हरीहि
प्यारा॥
सकल
तीर्थ
तुलसी
तरु
छाही।
लहत
मुक्ति
जन
संशय
नाही॥
कवि
सुन्दर
इक
हरि
गुण
गावत।
तुलसिहि
निकट
सहसगुण
पावत॥
बसत
निकट
दुर्बासा
धामा।
जो
प्रयास
ते
पूर्व
ललामा॥
पाठ
करहि
जो
नित
नर
नारी।
होही
सुख
भाषहि
त्रिपुरारी॥ॉ
नियमित
रूप
से
नियमों
का
ध्यानरखते
हुए
अगर
तुलसी
की
पूजा
की
जाए
,
तो
इससे
साधक
को
भगवान
विष्णु
की
भी
कृपा
की
प्राप्ति
होती
है।
॥ दोहा ॥
तुलसी
चालीसा
पढ़ही
तुलसी
तरु
ग्रह
धारी।
दीपदान
करि
पुत्र
फल
पावही
बन्ध्यहु
नारी॥
सकल
दुःख
दरिद्र
हरि
हार
ह्वै
परम
प्रसन्न।
आशिय
धन
जन
लड़हि
ग्रह
बसही
पूर्णा
अत्र॥
लाही
अभिमत
फल
जगत
मह
लाही
पूर्ण
सब
काम।
जेई
दल
अर्पही
तुलसी
तंह
सहस
बसही
हरीराम॥
तुलसी
महिमा
नाम
लख
तुलसी
सूत
सुखराम।
मानस
चालीस
रच्यो
जग
महं
तुलसीदास॥
इस
प्रकार
तुलसी
चालीसा
का
पाठ
करके
लक्ष्मी
माँ
की
कृपा
प्राप्त
की
जा
सकती
है।
Tulsi Plant
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