
सहारनपुर : उत्तर प्रदेश की नंबर वन विधानसभा सीट बेहट के क्षेत्र में स्थित मां शाकंभरी देवी सिद्धपीठ ( maa shakumbhri devi) किसी चमत्कार से कम नहीं है। यहां पर माथा टेकने मात्र से जहां परेशान हाल श्रद्धालुओं की मुश्किल दूर होती है, वहीं यह देवी राजनीति करने की इच्छा रखने वाले लोगों को सत्ता तक पहुंचने के रास्ते भी दिखाती है। ऐसी मान्यता है कि सच्ची अराधना और शाकमय होकर इस सिद्धपीठ पर किए गए अनुष्ठान के बाद राजनेताओं (politician) के हाथों में राजयोग (rajyog) बनता है।
जिस वक्त सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव यूपी के सीएम थे, उस समय सपा में शामिल होने और राज्यसभा सांसद बनने के लिए छटपटा रहे अमर सिंह ने भी यहां पर देवी के दर्शन किए थे। अमर सिंह गुपचुप तरीके से मां शाकंभरी देवी के दर्शन करने के लिए पहुंचे थे। मां शाकंभरी देवी के सामने अपना शीश झुकाकर अमर सिंह ने मन्नत मांगी थी। लोगों का मानना है कि देवी की कृपा से ही तमाम विरोध के बावजूद अमर सिंह को सपा में एंट्री मिली थी। यही नहीं देवी की कृपा से ही अमर सिंह सपा के कोटे से राज्यसभा सदस्य चुने गए। बीजेपी यहीं से करती है अपने चुनाव में प्रचार की शुरूआत मां शाकंभरी देवी हाथों में राजयोग कैसे बनाती है, इसका उदाहरण वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव से देखने को मिलता है। काफी समय से देश और प्रदेश की सत्ता से दूर रही बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के दौरान अपने चुनाव प्रचार और अन्य कार्यक्रमों की शुरुआत बीजेपी के पदाधिकारियों ने मां शाकंभरी देवी के दर्शन के बाद ही की थी। शाकमय होकर यानि कि शुद्ध शाकाहारी रूप में देवी की अराधना की और इसका फल भी बीजेपी नेताओं को मिला। लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले उत्तर प्रदेश में ही 80 सीटों पर कब्जा किया। जिसके बाद बीजेपी केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रही। इसके बाद विधानसभा चुनाव 2017 का प्रचार शुरू करने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी यहीं से परिवर्तन यात्रा की शुरूआत की थी। परिवर्तन रथ यात्रा की शुरुआत से पहले प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और अन्य बीजेपी लीडर मां शाकंभरी देवी के दर्शन और अनुष्ठान करने पहुंचे थे। शिवालिक पहाड़ियों में स्थित है सिद्ध पीठ जिला मुख्यालय से उत्तर दिशा में लगभग 45 किमी दूर शिवालिक पहाड़ियों में सिद्धपीठ श्री शाकंभरी देवी मंदिर लाखों श्रद्धालओं की आस्था का केन्द्र हैं। यहां शीश नवाने वाले भक्त सर्वसुख संपन्न हो जाते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। साथ ही भक्तों में कुविचारों की समाप्ति के साथ सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा भी मिलती है। सिद्धपीठ श्री शाकंभरी देवी का उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तसती, पदम पुराण, कनक धारा स्रोत आदि में मिलता है। मां भगवती का नाम शाकंभरी देवी प्रचलित होने के बारे में मान्यता है कि प्राचीन काल में दुर्ग नामक दैत्य ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर वरदान में चारों वेद मांग लिए। दैत्यों के हाथ चारों वेद लगने से सभी वैदिक क्रियाएं लुप्त हो गई। परिणाम स्वरूप 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। जिस कारण तीनों लोक में अकाल पड़ गया। त्राहि-त्राहि मचने पर देवताओं ने शिवालिक पर्वत की प्रथम शिखा पर मां जगदंबा की घोर तपस्या की। देवताओं की करूण पुकार सुनकर करूणामयी मां भगवती से रहा नहीं गया और वह देवताओं के समक्ष प्रकट हो गई। व्याकुल देवताओं ने उनसे तीनों लोको का अकाल मिटाने की प्रार्थना की। इस पर मां जगदंबा ने अपने शत नेत्रों से नौ दिन एवं नौ रात तक अश्रुवृष्टि की। इससे सूखी धरा तृप्त हो गई। सभी सागर एवं नदियां जल से भर गई। तभी से नवरात्रों की पूजा का प्रावधान बना और मां जगदंबा को शताक्षी कहा जाने लगा। करूणामयी मां भगवती ने देवताओं की भूख मिटाने के लिए अपनी शक्ति से पहाड़ियों पर शाक व फल उत्पन्न किये। जिसके बाद माता शाकंभरी कहलायी। श्री दुर्गा सप्तशती में मिलता है उल्लेख श्री दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में मां शाकंभरी देवी का वर्णन मिलता है। मां दुर्गा ने देवताओं से कहा कि मैं अपने शरीर से उत्पन्न हुए प्राणों की रक्षा करने वाले शाकों (शाक भाजी) द्वारा सभी प्राणियों का पालन करुंगी और तब इस पृथ्वी पर शाकंभरी के नाम से विख्यात होऊंगी और इस अवतार में मैं दुर्ग नामक महाअसुर का वध करुंगी और मैं दुर्गा देवी के नाम से प्रसिद्ध होऊंगी। मां के दर्शनों से पहले बाबा भूरादेव की महत्ता देवताओं एवं दैत्यों के बीच चल रहे युद्ध के दौरान धर्म की रक्षा के लिए मां भगवती का परम भक्त भूरादेव अपने साथियों के साथ युद्ध में उतरा था। युद्ध के दौरान अपने भक्त भूरादेव को घायल देखकर करूणामयी माता ने भूरादेव को वचन दिया था कि जो भक्त मेरे दर्शन से पूर्व भूरादेव के दर्शन नहीं करेगा उसकी यात्रा पूर्ण नहीं होगी। यही कारण है कि आज भी भारी संख्या में पहले श्रद्धालु भूरादेव मंदिर पर प्रसाद चढ़ाने के बाद ही मां शाकंभरी देवी के दर्शन करते हैं।
- यशराज कनिया कुमार