BRICS Summit 2026 के बीच भारत, रूस और चीन की बढ़ती ताकत ने दुनिया का ध्यान खींचा है। अगर इन तीनों देशों के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक सहयोग और मजबूत होता है तो वैश्विक व्यापार, डॉलर, ऊर्जा, निवेश और कूटनीति पर क्या असर पड़ेगा ?

BRICS Summit 2026 : ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के बीच दुनिया की नजर एक बार फिर उस सवाल पर टिक गई है, जिसकी चर्चा पिछले कई वर्षों से वैश्विक कूटनीति और अर्थव्यवस्था के गलियारों में होती रही है अगर भारत, चीन और रूस आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर पहले से कहीं ज्यादा करीब आ जाएं तो दुनिया का संतुलन कितना बदल सकता है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, चीन वैश्विक विनिर्माण और व्यापार की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है, जबकि रूस ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ऐसे में इन तीनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ता है तो इसका असर केवल BRICS तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा, निवेश, भुगतान व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक दिखाई दे सकता है। BRICS Summit 2026
BRICS की ताकत केवल इसके सदस्य देशों की संख्या में नहीं, बल्कि इनके संयुक्त आर्थिक, जनसांख्यिकीय और संसाधन संबंधी वजन में छिपी है। भारत की बड़ी युवा आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, चीन की विशाल औद्योगिक क्षमता और रूस की ऊर्जा शक्ति इन तीनों का मेल वैश्विक बाजार के लिए बेहद प्रभावशाली हो सकता है। BRICS का महत्व अब केवल पांच पुराने सदस्य देशों तक सीमित नहीं है। समूह के विस्तार ने इसे और व्यापक बनाया है। इंडोनेशिया का पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होना भी इसी विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहा है। ऐसे में BRICS के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह पश्चिम के खिलाफ कितना खड़ा हो सकता है, बल्कि यह है कि क्या वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को कितना मजबूत कर सकता है? BRICS Summit 2026
अगर भारत, चीन और रूस के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक और भुगतान व्यवस्था में सहयोग लगातार बढ़ता है तो इसका असर कई क्षेत्रों में पड़ सकता है।
व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ सकता है - BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। अगर सदस्य देश डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए द्विपक्षीय या बहुपक्षीय भुगतान व्यवस्था को मजबूत करते हैं तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की भूमिका को कुछ क्षेत्रों में चुनौती मिल सकती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि BRICS तुरंत अपनी कोई साझा मुद्रा जारी कर देगा या डॉलर की जगह कोई नई मुद्रा ले लेगी। ऐसी व्यवस्था के लिए सदस्य देशों के बीच व्यापक आर्थिक और वित्तीय सहमति की जरूरत होगी। BRICS Summit 2026
ऊर्जा और संसाधनों में रूस की भूमिका अहम - रूस दुनिया के प्रमुख ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन संपन्न देशों में शामिल है। भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा बाजारों के साथ रूस के संबंध मजबूत होने पर ऊर्जा व्यापार के नए रास्ते खुल सकते हैं। इसका असर तेल, गैस, परिवहन और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े वैश्विक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। BRICS Summit 2026
चीन की औद्योगिक क्षमता और भारत का बाजार - चीन की विनिर्माण क्षमता और भारत का विशाल उपभोक्ता एवं विकासशील बाजार दोनों देशों को एक-दूसरे के लिए महत्वपूर्ण बनाते हैं। हालांकि भारत चीन से आयात, व्यापार घाटे और रणनीतिक निर्भरता को लेकर सतर्क रहा है। इसलिए दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावना के साथ प्रतिस्पर्धा भी बनी रहेगी। BRICS Summit 2026
यह सवाल BRICS की चर्चा में सबसे ज्यादा पूछा जाता है। BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान तंत्र विकसित करने की कोशिशें डॉलर पर कुछ क्षेत्रों में निर्भरता घटा सकती हैं। लेकिन BRICS के कारण डॉलर का अचानक अंत हो जाएगा, ऐसा कहना फिलहाल अतिशयोक्ति होगी।
अमेरिकी डॉलर की ताकत केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था से नहीं आती। वैश्विक वित्तीय बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, केंद्रीय बैंकों के भंडार और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था भी इसकी भूमिका को मजबूत बनाते हैं। इसलिए BRICS के सामने चुनौती डॉलर को एक झटके में हटाने की नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में विकल्पों की संख्या बढ़ाने की है। BRICS Summit 2026
यहीं से BRICS की सबसे बड़ी जटिलता शुरू होती है। भारत, चीन और रूस के बीच सहयोग के कई क्षेत्र हैं, लेकिन इनके राष्ट्रीय हित हर मामले में एक जैसे नहीं हैं। खासकर भारत और चीन के संबंधों में सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। भारत किसी ऐसे ढांचे का हिस्सा बनने से बचना चाहता है, जिसमें किसी एक देश का प्रभुत्व हो। नई दिल्ली की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि वह अलग-अलग शक्तियों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखे।
भारत रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंध बनाए रखता है, चीन के साथ व्यापार करता है और साथ ही अमेरिका, यूरोप तथा जापान के साथ भी आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक सहयोग बढ़ाता है। इसलिए भारत के लिए BRICS का अर्थ किसी एक धड़े के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय दुनिया में अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए प्रभाव बढ़ाना है। BRICS Summit 2026
BRICS के भीतर भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। भारत का रुख लंबे समय से यह रहा है कि BRICS को किसी देश या समूह के खिलाफ खड़े मंच के बजाय विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सहयोग का मंच बनाया जाए। यही संतुलन BRICS को भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।
भारत एक तरफ रूस और चीन के साथ BRICS में सहयोग करता है, तो दूसरी तरफ पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत करता है। इससे भारत को किसी एक वैश्विक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार रणनीति बनाने का अवसर मिलता है। BRICS Summit 2026
BRICS की आर्थिक महत्वाकांक्षा का सबसे ठोस उदाहरण New Development Bank (NDB) है। BRICS देशों ने विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए इस बहुपक्षीय बैंक की स्थापना की। NDB की आधिकारिक जानकारी के अनुसार बैंक 2015 में अस्तित्व में आया और भारत के के.वी. कामथ इसके पहले अध्यक्ष बने थे। NDB का उद्देश्य BRICS और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे तथा सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। यानी BRICS केवल बैठकों और घोषणाओं का मंच नहीं है। इसके पीछे ऐसी संस्थागत व्यवस्थाएं भी विकसित हुई हैं, जो वैश्विक वित्तीय ढांचे में विकासशील देशों की भूमिका को मजबूत करने की कोशिश करती हैं। BRICS Summit 2026
भारत की एक और बड़ी ताकत उसका डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा है। UPI, Aadhaar और DigiLocker जैसे डिजिटल मॉडल ने भारत की तकनीकी क्षमता को वैश्विक चर्चा में जगह दी है। BRICS जैसे मंच के माध्यम से भारत विकासशील देशों के साथ अपने डिजिटल अनुभव और तकनीकी समाधानों को साझा करने की संभावनाएं तलाश सकता है। BRICS Summit 2026
BRICS का विस्तार समूह की बदलती रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इंडोनेशिया जैसे बड़े दक्षिण-पूर्व एशियाई देश का पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होना BRICS के भौगोलिक और आर्थिक प्रभाव को बढ़ाता है। इससे दक्षिण-पूर्व एशिया और BRICS के बीच सहयोग की संभावनाएं भी बढ़ती हैं। लेकिन विस्तार के साथ चुनौती भी बढ़ती है। जितने अधिक देश समूह में शामिल होंगे, उतने ही अधिक राष्ट्रीय हित और अलग-अलग विदेश नीति प्राथमिकताएं सामने आएंगी। ऐसे में सर्वसम्मति बनाना BRICS के लिए और कठिन हो सकता है। BRICS Summit 2026
BRICS का विस्तार और समूह की आर्थिक महत्वाकांक्षा अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के लिए भी महत्वपूर्ण विषय है। अगर BRICS के सदस्य आपसी व्यापार, निवेश और वित्तीय सहयोग को तेजी से बढ़ाते हैं तथा स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को आगे बढ़ाते हैं तो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में कुछ बदलाव जरूर आ सकते हैं। लेकिन भारत की भूमिका यहां सबसे अलग है। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार, तकनीक, रक्षा और रणनीतिक सहयोग लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में भारत BRICS के भीतर रहते हुए भी अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को खत्म करने की दिशा में नहीं जाएगा। BRICS Summit 2026
BRICS के भविष्य को समझने के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि इसे केवल अमेरिका-विरोधी मंच के रूप में देखना सही नहीं होगा। इस समूह के भीतर कई देशों के अपने-अपने हित हैं। भारत की प्राथमिकता रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था है। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच नए आर्थिक साझेदार तलाश रहा है। चीन वैश्विक व्यापार और वित्तीय प्रभाव बढ़ाना चाहता है। वहीं दूसरे सदस्य देश भी अपने आर्थिक और विकास संबंधी हितों के लिए BRICS का इस्तेमाल करना चाहते हैं। इसलिए BRICS की असली कहानी किसी एक देश के खिलाफ मोर्चा बनाने से ज्यादा बड़ी है। यह कहानी दुनिया की उस बदलती व्यवस्था की है, जिसमें विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक निर्णय प्रक्रिया, व्यापार, वित्त, तकनीक और विकास के मुद्दों पर अपनी सामूहिक भूमिका बढ़ाना चाहती हैं। BRICS Summit 2026
भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर BRICS को किसी गुट की राजनीति में बदलने के बजाय उसे संतुलित, व्यावहारिक और विकास-केंद्रित मंच बनाए रखने में है। अगर भारत BRICS में चीन और रूस के साथ सहयोग करते हुए अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ भी अपने संबंधों को संतुलित रखता है, तो नई दिल्ली की वैश्विक भूमिका और मजबूत हो सकती है। BRICS Summit 2026
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