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AI and Robotics : मजदूर फैक्ट्री में एक खास तरह का डिवाइस पहन रहे हैं जो उनकी जगह लेने वाले रोबोट के लिए डाटा इक्ट्ठा करने के लिए है।

AI and Robotics : कल्पना कीजिए आप अपनी नौकरी में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, और उसी मेहनत को कैमरे में कैद करके खुद ही अपना दुश्मन तैयार कर रहे हैं। ये कोई साइंस फिक्शन नहीं, बल्कि आज की हकीकत है। भारत के कारखानों में मजदूर अब खुद रोबोट्स को ट्रेनिंग दे रहे हैं... जो कल को उनकी जगह ले लेंगे।
नागपुर की एक टेक्सटाइल फ़ैक्टरी में अपनी शिफ़्ट शुरू होने से पहले हर सुबह, 30 साल के आशीष नारायण, जो एक मशीन टेक्नीशियन हैं, अपने माथे पर एक छोटा सा रिकॉर्डिंग डिवाइस बांध लेते हैं। अगले कई घंटों तक, यह कैमरा उनके हर काम को ट्रैक और रिकॉर्ड करता है: जैसे उन्होंने करघे (loom) पर तनाव (tension) कैसे एडजस्ट किया, उनकी उंगलियों ने चलते-फिरते पुर्ज़ों को कैसे कैलिब्रेट किया, और कैसे उन्होंने जाम हुई मशीन को ठीक करते समय, उसमें से गुज़र रहे धागे को नुकसान पहुँचाए बिना, अपनी पकड़ को सहजता से ढीला किया। उन्हें अपनी पूरी शिफ़्ट के दौरान यह डिवाइस पहनने के लिए कहा जाता है। इसे उतारने की इजाज़त उन्हें सिर्फ़ बाथरूम ब्रेक और लंच के समय ही होती है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक नारायण उन सैकड़ों कर्मचारियों में से एक हैं जिन्हें फैक्ट्री में ये डिवाइस पहनने के लिए कहा गया है; इनमें मशीन ऑपरेटर, टेक्नीशियन और प्रोडक्शन लाइन पर कपड़ा संभालने वाले सिलाई कर्मचारी शामिल हैं।
यह पहल AI और रोबोटिक्स कंपनियों की उस बढ़ती वैश्विक कोशिश को दिखाती है, जिसका मकसद "ईगोसेंट्रिक डाटा" इकट्ठा करना है—यानी इंसानी गतिविधियों की ऐसी फर्स्ट-पर्सन रिकॉर्डिंग, जो मशीनों को यह सिखा सकें कि लोग शारीरिक काम कैसे करते हैं।
नारायण ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया, "मेरे लिए, यह ऐसा है जैसे आप अपनी ही कब्र में काम कर रहे हों, और अपना ही ताबूत भी बना रहे हों," उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का एहसास है कि ये वीडियो, जिन्हें वह रिकॉर्ड कर रहे हैं, आगे चलकर उन्हें ही बेमानी बना देंगे।
इस तरह की फ़ुटेज की अहमियत और जरुरत लगातार बढ़ रही है। रोबोट अभी भी उन बारीक कामों को करने में मुश्किल महसूस करते हैं जिन्हें इंसान स्वाभाविक रूप से करते हैं: जैसे मशीन के लीवर पर दबाव को एडजस्ट करना, नाज़ुक चीज़ों को पकड़ना, दोनों हाथों के बीच तालमेल बिठाना, या हलचल और बनावट में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर प्रतिक्रिया देना।
रिपोर्ट के मुताबिक इन्वेस्टमेंट फ़र्म Stellaris Venture Partners की अप्रैल में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, रोबोटिक्स लैब को अगले दो से तीन सालों में 100 मिलियन से 1 बिलियन घंटे के 'ईगोसेंट्रिक प्री-ट्रेनिंग डेटा' की ज़रूरत होगी।
इस तरह का डाटा इकट्ठा करने का अंतिम लक्ष्य ऐसे रोबोट बनाना है जो असल दुनिया में इंसानों जैसी क्षमता और सटीकता के साथ काम कर सकें। इसके लिए, रोबोटिक्स कंपनियों को इंसानी व्यवहार से जुड़ा भारी मात्रा में डाटा चाहिए होता है। इसका मकसद सिर्फ़ किसी एक काम को ऑटोमेट करना नहीं है, बल्कि ऐसी मशीनें बनाना है जो खुद ही 'फिज़िकल इंटेलिजेंस' (शारीरिक बुद्धिमत्ता) सीख सकें।
मजदूरों को सबकुछ नहीं बताया जाता
नारायण ने बताया कि उनकी फैक्ट्री के मैनेजमेंट ने मज़दूरों से कहा कि यह कवायद "कामकाज को बेहतर बनाने" के लिए है, इसके अलावा ज़्यादा कुछ नहीं बताया गया। उनके सीनियर्स ने उस कंपनी के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी जिसके लिए उनका ऑपरेशन उनके वीडियो इकट्ठा कर रहा था।
वर्कर्स को अक्सर यह ठीक से पता नहीं होता कि क्या रिकॉर्ड किया जा रहा है, फुटेज कहां जा रहा है, या अंततः इसका इस्तेमाल कैसे किया जाएगा। कर्मचारी शायद ही कभी सार्थक रूप से भाग लेने से इनकार कर पाते हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां नौकरियां असुरक्षित हैं और श्रमिक सुरक्षा कमजोर है। वास्तव में, मजदूर न केवल वस्त्रों का उत्पादन कर रहे हैं या मशीनों का रखरखाव कर रहे हैं, बल्कि व्यवहार संबंधी डाटा भी उत्पन्न कर रहे हैं। यह डाटा बाद में उनके अपने काम के कुछ हिस्सों को ऑटोमैटिक करने में कैसे मदद कर सकता है, या उन्हें पूरी तरह से प्रतिस्थापित कर सकता है।
तमिलनाडु की एक अन्य कपड़ा फैक्ट्री में, कई महिला श्रमिक मेटा के स्मार्ट चश्मे पहनकर प्लास्टिक कवर में सामान पैक करते समय अपने हाथों की गतिविधियों को रिकॉर्ड कर रही हैं। जिस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में ये महिलाएं काम करती हैं, उसका अमेरिका स्थित एआई डाया सॉल्यूशन कंपनी ऑब्जेक्टवेज़ (Objectways) के साथ कॉन्ट्रैक्ट है। यह कंपनी ऐसा डाटा इक्ट्ठा करती है, उसका विश्लेषण करती है और फिर उसे रोबोटिक्स कंपनियों को बेचती है। कंपनी ने भारत में सैकड़ों श्रमिकों को विभिन्न कारखानों में काम पर रखा है और घर पर काम करने वाले श्रमिकों को भी भुगतान किया है। ये मजदूर फल-सब्जियां काटने, बर्तन साफ करने और कपड़े तह करने जैसे कामों को रिकॉर्ड करते हैं, ताकि रोबोटिक्स लैब के लिए मानव-केंद्रित डाटा इक्ट्ठा किया जा सके।
'ये चिंता जायज है'
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक ऑब्जेक्टवेज के प्रेसिडेंट रवि शंकर ने कहा कि आम AI सिस्टम के उलट, जहां डाटा इंटरनेट पर उपलब्ध होता है और बॉट्स उसे इकट्ठा कर लेते हैं, ह्यूमनॉइड रोबोट्स को ट्रेनिंग देने के लिए बहुत कम डाटा उपलब्ध है। ह्यूमनॉइड रोबोट्स 'फिजिकल AI' की बड़ी कैटेगरी में आते हैं। उन्होंने कहा, "हमारे पास भारत, अमेरिका, वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस जैसे देशों में लोग हैं, जो हमारे लिए ऐसा डाटा इकट्ठा कर रहे हैं। अभी भारत इसका सबसे बड़ा ज़रिया बना हुआ है।"
शंकर इस बात से सहमत हैं कि मज़दूरों का यह डर कि वे शायद ऐसे रोबोट को ट्रेनिंग देने में मदद कर रहे हैं जो एक दिन उनकी जगह ले सकते हैं, एक असली चिंता है। लेकिन उन्होंने कहा कि इन मशीनों का इस्तेमाल ऐसे काम करने के लिए किया जा सकता है जिन्हें इंसान नहीं करना चाहते, या ऐसी जगहों पर काम करने के लिए जहाँ इंसान आसानी से नहीं पहुँच सकते। शंकर ने कहा, "मैं इस बात को मीठी-मीठी बातों में नहीं छिपाऊँगा, यह सच में एक चिंता का विषय है। लेकिन, इसे इस नज़रिए से भी देखिए – मान लीजिए कोई बहुत गंदा पब्लिक बाथरूम है। यह ज़्यादा बेहतर होगा अगर उसे साफ़ करने के लिए कोई मशीन भेजी जाए, जबकि जो लोग आम तौर पर यह काम करते, वे कुछ और करके बेहतर ज़िंदगी जी सकें।"
नागपुर के टेक्नीशियन नारायण को, हालांकि, अब भी ठीक-ठीक नहीं पता कि उनकी शिफ्ट के दौरान की रिकॉर्डिंग कहां जाती है, या उनसे आखिर में क्या बनाने में मदद मिलेगी। नारायण ने कहा: "मैं सिर्फ अपने काम ही रिकॉर्ड नहीं कर रहा हूं, बल्कि कहीं-कहीं मुझे ऐसा भी लगता है कि मैं अपना एक हिस्सा भी दे रहा हूँ। यह मशीन आखिर में जान जाएगी कि मैं कौन हूं।"
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