
Bihar Voter Verification Case : बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर बवाल मचा हुआ है। निर्वाचन आयोग की यह पहल महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। आरोप-प्रत्यारोपों के बीच एक बुनियादी सवाल लगातार गूंज रहा है—क्या चुनाव आयोग के पास यह पता लगाने की क्षमता और अधिकार है कि मतदाता सूची में विदेशी नागरिक शामिल हैं? पूर्वोत्तर राज्यों, बंगाल और बिहार जैसे सीमावर्ती इलाकों में अवैध घुसपैठ कोई नई बात नहीं है। लेकिन मतदाता सूची में विदेशी नागरिकों की प्रविष्टि पर सवाल उठना स्वाभाविक है। खबरें हैं कि चुनाव आयोग के निर्देश पर BLO (बूथ लेवल अफसर) घर-घर जाकर जिन मतदाताओं की जांच कर रहे हैं, उनमें से कुछ की नागरिकता संदिग्ध पाई गई है—विशेष रूप से नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के नागरिकों की।
लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत ECI को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन नागरिकता की अंतिम पुष्टि का अधिकार केवल गृह मंत्रालय के पास है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है—क्या BLO द्वारा जुटाई गई जानकारी, दस्तावेजों की प्रामाणिकता और खुफिया सूचनाएं पर्याप्त आधार हैं किसी व्यक्ति को 'घुसपैठिया' कहने के लिए?
13 जुलाई को कई अखबारों और टीवी चैनलों में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई कि आयोग को बड़ी संख्या में विदेशी घुसपैठिए बिहार की मतदाता सूची में शामिल मिले हैं। इन रिपोर्ट्स का स्रोत आयोग के "सूत्र" बताए गए। चौंकाने वाली बात यह रही कि आयोग ने इस खबर का न तो खंडन किया और न ही कोई स्पष्टीकरण जारी किया। अगर यह खबर असत्य होती, तो चुनाव आयोग जैसी संस्था का खामोश रहना संदेह को जन्म देता है। यही वह बिंदु है जहां राजद नेता तेजस्वी यादव का आक्रोश समझ में आता है। उन्होंने मीडिया रिपोर्ट्स और आयोग की ‘सूत्रों पर आधारित’ चुप्पी पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने पत्रकारों के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया, जो निंदनीय है, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मामला महज राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक संजीदगी से जुड़ा है।
इस सवाल का उत्तर साफ है—नहीं। भारत का नागरिकता अधिनियम, 1955 यह जिम्मेदारी गृह मंत्रालय और संबद्ध एजेंसियों को देता है। लेकिन यदि वोट डालने का अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिक को है, तो मतदाता सूची में विदेशी का नाम शामिल होना चुनाव आयोग की विफलता नहीं तो और क्या ? इस उलझन को सुलझाने के लिए ECI ने प्रक्रिया के तहत BLOs को 11 दस्तावेजों की मांग के साथ घर-घर सर्वेक्षण का जिम्मा सौंपा है। जिन मतदाताओं की जानकारी संदेहास्पद मिली है, उन्हें 1 अगस्त से 30 अगस्त 2025 तक अपनी नागरिकता साबित करने का मौका मिलेगा।
अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर को प्रकाशित होगी। यह सब Registration of Electors Rules, 1960 की धारा 21 और 22 के अंतर्गत किया जा रहा है। RJD, कांग्रेस और AIMIM जैसे दलों का आरोप है कि यह कवायद “बैकडोर एनआरसी” है, जो विशेष रूप से गरीब, दलित और मुस्लिम समुदायों को निशाना बनाने के लिए की जा रही है। AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने BLO की निष्पक्षता और ECINet सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं। Bihar Voter Verification Case