शुरू हुई भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, भक्तों का उमड़ा जनसैलाब
भारत
RP Raghuvanshi
24 Nov 2025 08:08 PM
Jagannath Rath Yatra 2025 : पुरी, ओडिशा लाखों श्रद्धालुओं का इंतजार आखिरकार खत्म हो गया है। भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की वार्षिक रथ यात्रा का दिव्य महापर्व आज यानी 27 जून 2025 से पुरी में पूरे भक्ति, श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हो गया है। पुरी की सड़कों पर एक बार फिर गूंज उठा है "जय जगन्नाथ!" का पावन उद्घोष। आकाश में घंटे और शंखों की ध्वनि, भक्तों के कीर्तन और रथों के पहियों की गूंज के साथ आज से पुरी बन गया है आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का महासागर।
शुरू हुई दिव्यता की 9 दिवसीय यात्रा
रथ यात्रा हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन शुरू होती है और पूरे 9 दिनों तक चलती है। पहले दिन भगवान श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा पुरी के श्रीमंदिर से निकलकर अपने ननिहाल गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यहां वे 7 दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बहुड़ा यात्रा के माध्यम से वापस अपने मंदिर लौटते हैं।
तीनों रथों की भव्यता देख भक्त हुए भावविभोर
हर साल की तरह इस वर्ष भी भगवानों के लिए तीन विशाल रथ विशेष लकड़ियों से तैयार किए गए हैं, जिनका निर्माण पारंपरिक कारीगरों ने महीनों की मेहनत से किया है:
नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ का रथ): 18 पहिए, 45 फीट ऊंचा
तालध्वज (भगवान बलभद्र का रथ): 16 पहिए, 44 फीट ऊंचा
दर्पदलन (देवी सुभद्रा का रथ): 14 पहिए, 43 फीट ऊंचा
रथों की सजावट पारंपरिक ओडिया कलाकृति और जीवंत रंगों से सुसज्जित है, जो हर वर्ष श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।
‘छेरापहड़ा’ रस्म: विनम्रता का प्रतीक
रथ यात्रा से पूर्व एक विशेष रस्म ‘छेरापहड़ा’ का आयोजन होता है, जिसमें पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों के मार्ग को साफ करते हैं। यह रस्म बताती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं चाहे वह राजा हो या रंक। यह परंपरा भक्तिरस और विनम्रता की अद्भुत मिसाल है। इस वर्ष रथ यात्रा में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचे हैं। विदेशी भक्त भी इस आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रभावित होकर रथों को खींचने, कीर्तन करने और मोक्षदायक पुण्य प्राप्त करने में जुटे हैं।
रथ यात्रा का आध्यात्मिक महत्व
रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और समरसता का जीता-जागता प्रतीक है। मान्यता है कि जो भी भक्त भगवान के रथ की रस्सी खींचता है या उसे छूता है, उसे असीम पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह यात्रा यह भी दर्शाती है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं उनके सुख-दुख में सहभागी बनने। गुंडिचा मंदिर में नौ दिन निवास के बाद भगवान अपनी वापसी यात्रा यानी 'बहुड़ा यात्रा' के माध्यम से पुरी के श्रीमंदिर लौटते हैं। इन दिनों के दौरान पूरे पुरी में उत्सव, भक्ति और सेवा का अद्भुत वातावरण बना रहता है।