जयंती : 'विद्यार्थी जी' जिन्होंने कलम से आजादी की लड़ाई लड़ी!
भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 03:39 PM
विनय संकोची
अपनी कलम और विचारों से सुधार की क्रांति उत्पन्न करने वाले क्रांतिकारी, ओजस्वी पत्रकार, विचारशील साहित्यकार गणेश शंकर विद्यार्थी की आज जन्म जयंती है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय जिन पत्रकारों ने अपनी कलम को हथियार बनाकर आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया उनमें गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अग्रणी है उल्लेखनीय है।
26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल प्रयाग में जन्मे गणेश शंकर संभवत पहले पत्रकार थे जो सांप्रदायिक दंगों की भेंट चढ़े। पढ़ाई के बाद गणेश शंकर विद्यार्थी ने दो जगह नौकरी की लेकिन अंग्रेज अफसरों से बनी नहीं तो नौकरी छोड़ दी। महावीर प्रसाद द्विवेदी गणेश शंकर की प्रतिभा योग्यता से प्रभावित थे, उन्होंने उन्हें अपने पास 'सरस्वती' में बुला लिया। एक वर्ष बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गए। कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी संपादन किया। अक्टूबर 1913 में साप्ताहिक 'प्रताप' के संपादक हुए। 'प्रताप' के माध्यम से गणेश शंकर विद्यार्थी की निर्भीक लेखनी का जादू पाठकों को प्रभावित करता चला गया। आगे चल कर 'प्रताप' भारत की आजादी की लड़ाई का मुखपत्र साबित हुआ।
गणेश शंकर विद्यार्थी ही थे, जिन्होंने सरदार भगत सिंह को प्रताप से जोड़ा था। विद्यार्थी जी ने क्रांतिकारियों के विचार ही 'प्रताप' नहीं छापे बल्कि राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा भी प्रकाशित की। स्वभाव से क्रांतिकारी विचारों के होने के कारण गणेश शंकर विद्यार्थी महात्मा गांधी के अंग्रेजों के विरुद्ध अहिंसात्मक आंदोलन से सहमत नहीं थे। प्रताप में लिखे अग्रलेखों से चिढ़कर अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी को जेल भेजा। इतना ही नहीं जब 22 अगस्त 1918 को नानक सिंह की 'सौदा ए वतन' कविता प्रताप में प्रकाशित हुई थी तो अंग्रेजों ने गणेश शंकर विद्यार्थी पर राजद्रोह का आरोप लगाकर 'प्रताप' का प्रकाशन ही बंद करवा दिया। बाद में बामुश्किल धन की व्यवस्था कर विद्यार्थी जी ने 'प्रताप' का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस बार जनता से 'प्रताप' को आर्थिक सहयोग मिला। आगे चलकर 'प्रताप' साप्ताहिक से दैनिक हो गया।
गणेश शंकर विद्यार्थी अपनी पूरी जिंदगी में 5 बार जेल गए। उनकी आखिरी जेल यात्रा 1921 में हुई। रायबरेली के एक ताल्लुकदार सरदार वीरपाल वीरपाल सिंह ने किसानों पर गोली चलवाई थी और विद्यार्थी जी ने ठोस सबूत के साथ पूरी घटना 'प्रताप' में प्रकाशित की थी। इस खबर को लेकर विद्यार्थी जी पर मानहानि का मुकदमा हुआ, जेल भी हुई, जुर्माना भी हुआ। मुकदमा लड़ने में बहुत पैसा भी लगा लेकिन 'प्रताप' खूब प्रसिद्ध हो गया और गणेश शंकर विद्यार्थी को लोग 'प्रताप बाबा' कहने लगे। जानना रोचक होगा कि विद्यार्थी जी के जेल जाने पर 'प्रताप' का संपादन माखन माखन लाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे बड़े साहित्यकार किया करते थे। श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' ने 'झंडा ऊंचा रहे हमारा' गीत लिखा था, उसे 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला बाग की बरसी पर विद्यार्थी जी ने ही गाया जाना शुरू करवाया था।
गणेश शंकर विद्यार्थी धर्म और राजनीति के घालमेल के विरुद्ध थे और इसीलिए वे धर्म आधारित राष्ट्र की अवधारणा को एक बड़ी भारी भूल मानते थे। उन्होंने लिखा भी था - 'कुछ लोग हिंदू राष्ट्र चिल्लाते हैं, वह बड़ी भारी भूल कर रहे हैं और वह अभी तक राष्ट्र के अर्थ को नहीं समझते हैं।'
विद्यार्थी जी ने यह भी लिखा था - 'हम किसी मजहब के विरोधी नहीं। हम इस बात पर विश्वास करते हैं कि प्रत्येक उन्नत राष्ट्र में प्रत्येक पुरूष तथा स्त्री को मजहबी विचार रखने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए।'
भगत सिंह की फांसी के तीसरे दिन ही कानपुर में दंगों को रोकने के प्रयास में गणेश शंकर विद्यार्थी 25 मार्च 1931 को शहीद हो गए। दंगों की खबर अखबार में लिखकर विद्यार्थी संतुष्ट नहीं हुए और दंगों को रोकने खुद ही निकल पड़े। कई जगह दंगे रोकने में कामयाब भी रहे। लेकिन एक जगह ऐसे उग्र दंगाइयों की भीड़ से घिर गए जो उन्हें पहचानते नहीं थे।