
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) समेत पांच प्रमुख राज्यों में चुनाव होने हैं सो राजनैतिक तमाशे तो होंगे ही। नेता लोग अपने हाथ से कोई भी मौका पहले भी कहां जाने देते थे। समाज कितना भी विषैला हो , सौहार्द कितना भी बिगड़े और लोग चाहे कितने भी मरें , उन्हें इसकी कब परवाह रही है ? मगर इस बार कुछ ज्यादा ही नहीं हो रहा ? मुस्लिमो की जुम्मे की नमाज के खिलाफ तो पहले भी खुराफातें होती थीं मगर स्कूलों में बच्चों की मौजूदगी में क्रिसमस पर बवाल तो शायद पहली बार ही हुआ है। कई जगह से तो सेंटा क्लॉज के पुतले फूंके जाने की भी खबरें हैं। अब से पहले कम से कम मैंने तो ऐसा कभी नहीं देखा था। जहां तक मेरी जानकारी है, देश के अधिकांश स्कूलों में सभी धर्मों के त्योहार धूमधाम से मनाए जाते हैं । ऐसे स्कूल भी अनगिनत हैं जहां प्रतिदिन सर्वधर्म प्रार्थना होती है। सरकारी स्तर पर भी सभी धर्मों के समान आदर का भाव कुछ साल पहले तक रहा है। सभी धर्मों के प्रमुख दिनों पर सार्वजनिक अवकाश भी रहता ही है मगर अब तो हवाएं कुछ ज्यादा ही जहरीली होती जा रही हैं। असुद्दीन ओवैसी कहता है कि जब योगी मोदी नहीं रहेंगे तब तुम्हे कौन बचाएगा। कपिल मिश्रा जैसे कहते हैं कि तुम्हे योगी के डंडे से कौन बचाएगा। हरिद्वार में कथित धर्म संसद में संतों के वेश में गुंडे सरेआम मुस्लिमों के कत्लेआम की बात कर रहे हैं। छोटे मोटे नेताओ का क्या रोना रोएं, बड़े बड़े नेता जहर उगल रहे हैं।
खैर, हमारी तो बीत गई यह सब देखते देखते। इसके प्रभाव से जिन्हे जहरीला होना था वे हो भी गए और जिन्होंने खुद को बचा लिया, वे आजतक बचे हुए हैं। मुझे तो फिक्र उन बच्चों की हो रही है जिनके स्कूलों में जाकर अब सांप्रदायिक जहर (Communal Poison) उगला जा रहा है और दूसरे धर्मों का भी सम्मान करने के भाव को दूषित किया जा रहा है। मैं तो डर रहा हूं कि यह सब देख कर हमारे देश में भी अब न जाने कितने जोजो रैबिट तैयार होंगे?