करीब 15 महीने तक वे सुप्रीम कोर्ट की नेतृत्वकारी भूमिका में रहेंगे और 9 फरवरी 2027 को 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत्त होंगे। यह पूरा कार्यकाल न्यायपालिका के एजेंडा, संस्थागत सुधारों और आने वाले ऐतिहासिक फैसलों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

देश की न्यायपालिका की बागडोर अब जस्टिस सूर्यकांत के हाथों में आ गई है। वे भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में सुप्रीम कोर्ट की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हो गए हैं। जस्टिस बी.आर. गवई के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने न सिर्फ यह जिम्मेदारी संभाली, बल्कि अगले करीब 15 महीनों तक देश की न्यायिक दिशा तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में शुमार हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में अपने अब तक के कार्यकाल के दौरान वे अनुच्छेद 370, पेगासस जासूसी विवाद और बिहार वोटर लिस्ट जैसे कई संवैधानिक रूप से नाज़ुक मामलों की अहम पीठों का हिस्सा रह चुके हैं। रविवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस मौके पर देश–दुनिया की न्यायिक बिरादरी की मौजूदगी ने इस ऐतिहासिक क्षण को और भी महत्वपूर्ण बना दिया, जहां सात देशों के मुख्य न्यायाधीशों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग पहचान दी।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत का सफर कई बड़े संवैधानिक मुकदमों से होकर गुजरा है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं हों, बिहार की वोटर लिस्ट में व्यापक बदलाव को लेकर उठे सवाल हों या फिर पेगासस स्पाइवेयर प्रकरण जैसा संवेदनशील मामला – वे उन अहम पीठों का हिस्सा रहे, जिनके निर्णयों ने भारतीय संविधान की व्याख्या, नागरिक अधिकारों की सीमाओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही को नई परिभाषा दी। 30 अक्तूबर को उन्हें औपचारिक रूप से CJI-डिज़िग्नेट नामित किया गया और तय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत अब वे मुख्य न्यायाधीश का कार्यभार संभाल चुके हैं। करीब 15 महीने तक वे सुप्रीम कोर्ट की नेतृत्वकारी भूमिका में रहेंगे और 9 फरवरी 2027 को 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत्त होंगे। यह पूरा कार्यकाल न्यायपालिका के एजेंडा, संस्थागत सुधारों और आने वाले ऐतिहासिक फैसलों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार जिले के एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे जस्टिस सूर्यकांत की कहानी बार से बेंच तक अपने बूते ऊपर उठने वाले एक स्वनिर्मित विधिवेत्ता की कहानी है। छोटे शहर की कचहरी से शुरू हुआ उनका सफर धीरे–धीरे हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां उन्होंने कई राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर अपनी मजबूत न्यायिक छाप छोड़ी। 2011 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से लॉ में मास्टर डिग्री हासिल करते समय वे ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ रहे, जिसने उनके शुरुआती करियर को ही एक अलग पहचान दे दी। 5 अक्तूबर 2018 को वे हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने, उससे पहले पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जज रहते हुए उन्होंने कई चर्चित मामलों में ऐसे फैसले सुनाए, जिन्होंने उन्हें एक कड़े लेकिन मानवीय संवेदनाओं से जुड़े जज के रूप में स्थापित किया।
सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस सूर्यकांत बार–बार उन मुकदमों के केंद्र में रहे, जहाँ संविधान की आत्मा, नागरिक अधिकार और सत्ता संतुलन जैसे बड़े सवाल दांव पर थे। अभिव्यक्ति की आज़ादी, नागरिकता, संघ–राज्य संबंधों और लोकहित याचिकाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में उनकी राय को बेहद प्रभावी और दिशानिर्धारक माना गया। अनुच्छेद 370, पेगासस प्रकरण और चुनावी सुधार से जुड़े मामलों में दिए गए उनके विचारों ने साफ दिखाया कि उनकी न्यायिक सोच का मूल आधार संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही को मजबूती देना है। हाल में राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई कर रही उस संविधान पीठ में भी वे शामिल हैं, जिसमें राज्यों की विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिकाओं व शक्तियों की सीमा तय की जा रही है। यह मामला अभी लंबित है, लेकिन न्यायिक गलियारों में यह आम धारणा है कि आने वाला फैसला न सिर्फ संवैधानिक व्याख्या को नई दिशा देगा, बल्कि कई राज्यों के राजनीतिक–प्रशासनिक तंत्र के लिए भी आगे का रास्ता तय करेगा।