कैंची धाम में बढ़ती श्रद्धालुओं की भीड़ से यातायात व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। लंबे जाम से स्थानीय लोगों, यात्रियों और आपातकालीन सेवाओं पर बढ़ रहा दबाव जानें।

नैनीताल। उत्तराखंड के पहाड़ों की शांत वादियां, घुमावदार सड़कें, देवदार के पेड़ और बाबा नीम करोली की तपोभूमि कैंची धाम। कभी यह स्थान शांति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता था। आज यही कैंची धाम एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा है, जिसका जवाब केवल प्रशासन को ही नहीं बल्कि देशभर से यहां पहुंच रहे श्रद्धालुओं को भी देना होगा। सवाल सीधा है—क्या कैंची धाम आस्था का विराट केंद्र बन रहा है या फिर अंधी आस्था का ऐसा जनसैलाब बन चुका है, जो पहाड़ की जिंदगी के लिए मुसीबत बन गया है?
जिस रास्ते से सामान्य परिस्थितियों में दो-तीन घंटे में सफर पूरा हो सकता है, वहां अब कई मौकों पर 11-12 घंटे तक लग रहे हैं। वाहनों की लंबी कतारें यात्रियों को घंटों सड़क पर रोक देती हैं। यह स्थिति केवल यात्रा करने वालों की परेशानी नहीं है, बल्कि उस पूरे पहाड़ी जनजीवन को प्रभावित कर रही है, जिसकी रोजमर्रा की जिंदगी इन्हीं सीमित सड़कों पर निर्भर है।
बाबा नीम करोली महाराज के प्रति देश और दुनिया में आस्था लगातार बढ़ी है। कैंची धाम अब केवल उत्तराखंड का धार्मिक स्थल नहीं रह गया है। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। हाल के वर्षों में इस धार्मिक स्थल की लोकप्रियता जिस तेजी से बढ़ी है, उस अनुपात में सड़क, पार्किंग, यातायात नियंत्रण और सार्वजनिक सुविधाओं का विस्तार दिखाई नहीं देता। यही असंतुलन अब सबसे बड़ी समस्या बन गया है। धार्मिक पर्यटन अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी स्थान की वहन क्षमता और वहां पहुंचने वाले लोगों तथा वाहनों की संख्या के बीच भारी अंतर पैदा हो जाए। कैंची धाम में मौजूदा परिस्थितियां इसी ओर संकेत कर रही हैं।
कैंची धाम जाने वाला श्रद्धालु कुछ घंटे या एक दिन के लिए वहां पहुंचता है। लेकिन पहाड़ का स्थानीय नागरिक इसी रास्ते पर रोज चलता है। किसी को नौकरी पर जाना है, किसी बच्चे को स्कूल पहुंचाना है, किसी बुजुर्ग को अस्पताल ले जाना है, किसी परिवार को बाजार जाना है तो किसी व्यापारी को जरूरी सामान पहुंचाना है। जब सड़क पर वाहनों का दबाव अचानक कई गुना बढ़ जाता है, तो इन लोगों के लिए पूरा जीवन प्रभावित हो जाता है। यही वजह है कि कैंची धाम का संकट केवल पर्यटन या ट्रैफिक की समस्या नहीं, बल्कि स्थानीय नागरिकों के जीवन और अधिकार से जुड़ा सवाल बन गया है।
इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील पहलू आपातकालीन सेवाओं से जुड़ा है। कल्पना कीजिए कि किसी गंभीर मरीज को अस्पताल ले जा रही एंबुलेंस इसी जाम में फंस जाए। उसके पास न वैकल्पिक रास्ता हो और न आगे बढ़ने की जगह। ऐसी स्थिति में कुछ मिनट भी जिंदगी और मौत के बीच का अंतर बन सकते हैं। ताजा रिपोर्टों में कैंची धाम मार्ग पर बढ़ते यातायात के कारण एंबुलेंस और जरूरी सप्लाई प्रभावित होने की बात सामने आई है। इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि श्रद्धालु कितनी देर जाम में फंसे। असली सवाल यह है कि क्या धार्मिक पर्यटन के बढ़ते दबाव के बीच आपातकालीन सेवाओं के लिए सुरक्षित और निर्बाध रास्ता सुनिश्चित किया गया है?
कैंची धाम की भौगोलिक स्थिति को भी समझना होगा। मैदानी शहरों की तरह यहां सड़कें चौड़ी करने और हजारों वाहनों को एक साथ खड़ा करने की गुंजाइश नहीं है। पहाड़ी सड़कें प्राकृतिक परिस्थितियों और सीमित स्थान के बीच बनी हैं। ऐसे में निजी वाहनों के माध्यम से बड़े पैमाने पर श्रद्धालुओं का पहुंचना स्वाभाविक रूप से यातायात पर भारी दबाव डालता है। इसका स्थायी समाधान केवल सड़क पर पुलिसकर्मी बढ़ाना या किसी दिन रूट डायवर्ट कर देना नहीं हो सकता। जरूरत एक ऐसी समग्र यातायात नीति की है, जो कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता को ध्यान में रखकर तैयार की जाए।
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