उत्तराखंड की पहाड़ियों में पाई जाने वाली बद्री गाय अब सिर्फ आस्था का नहीं बल्कि सेहत और समृद्धि का प्रतीक बन चुकी है। हिमालयी जड़ी-बूटियों से पोषित इस देसी नस्ल की गाय को स्थानीय लोग 'कामधेनु' कहने लगे हैं और इसके पीछे वजह भी ठोस है। Badri Cow Ghee
सामान्य गायों से छोटी होती है बद्री गाय
देहरादून निवासी नवेंदु रतूड़ी बताते हैं कि बद्री गाय आकार में भले ही सामान्य गायों से छोटी होती है लेकिन इसके दूध और घी की गुणवत्ता किसी औषधि से कम नहीं। नवेंदु की मां ने इस नस्ल की गायों को पालना शुरू किया और अब यह काम एक सफल ग्रामीण उद्यम में बदल चुका है। पहाड़ की महिलाओं से दूध खरीदकर नवेंदु देसी घी तैयार करते हैं जिसकी कीमत बाजार में ₹3,000 से ₹5,500 प्रति किलो तक पहुंच चुकी है।
क्यों खास है बद्री गाय?
बद्री गाय हिमालय के ऊंचे बुग्यालों (घास के मैदानों) में प्राकृतिक जड़ी-बूटियां और औषधीय पौधे चरती है। यही कारण है कि इसके दूध और उससे बने उत्पादों में औषधीय गुण पाये जाते हैं। न केवल सेहत के लिए लाभकारी बल्कि यह कृषकों के लिए कमाई का मजबूत जरिया भी बन गई है। बद्री गाय के दूध में A2 बीटा-केसीन प्रोटीन पाया जाता है जो आम गायों के A1 प्रोटीन की तुलना में ज्यादा सुपाच्य और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। यही कारण है कि इसका घी और दूध अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी पहचान बना रहे हैं।
नवेंदु बताते हैं कि बद्री गाय का पालन करने वाले किसानों को घरेलू और विदेशी बाजारों से ऑर्डर मिलने लगे हैं। इसका घी जो कभी घर की रसोई तक सीमित था अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और हेल्थ स्टोर्स में प्रीमियम रेट पर बिक रहा है। Badri Cow Ghee