किसानों के बीच पपीते की बागवानी का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। उचित प्रबंधन के साथ यह फसल अच्छी आमदनी देकर किसानों का भविष्य बदल सकती है। लेकिन लाभकारी खेती के लिए इसकी कुछ जरूरी बातों को जानना बेहद आवश्यक है।

भारत में बागवानी फसलों की ओर बढ़ते रुझान के बीच पपीता किसानों के लिए लाभ का नया साधन बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पपीता ऐसी फसल है, जिसे वर्षभर उगाया जा सकता है और कम समय में अधिक मुनाफा भी देती है। इसकी खेती के लिए 10 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान और जल-निकास युक्त दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, व्यवसायिक खेती के लिए रेड लेडी-786, ताइवान हाइब्रिड, पूसा डिलीशियस, पूसा जायंट, पूसा ड्वार्फ, कोयंबटूर-1, पंजाब स्वीट जैसी किस्में किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। वहीं पपेन उत्पादन के लिए पूसा मैजेस्टी, CO-2 और CO-5 श्रेष्ठ मानी जाती हैं। छोटे स्थानों और गमलों में खेती के लिए पूसा नन्हा और पूसा ड्वार्फ जैसी किस्में खासतौर पर सुझाई गई हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि पपीते की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय जुलाई से सितंबर तथा फरवरी-म मार्च माना जाता है। बेहतर अंकुरण के लिए बीजों को कॉपपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करने और क्यारियों में गोबर की खाद या वर्मीकंपोस्ट मिलाने की सलाह दी जाती है। बीज 8–10 सेंटीमीटर के पौधे बनने पर पॉलिथीन बैग में और करीब 15 सेंटीमीटर होने पर खेत में प्रतिरोपित कर दिए जाते हैं। पौध रोपण के लिए 45×45×45 सेमी के गड्ढों में गोबर खाद, जिप्सम और कीटनाशक पाउडर मिलाकर भरना आवश्यक होता है।
कृषि विभाग के अनुसार, पौध लगाने के तुरंत बाद सिंचाई जरूरी है, लेकिन ध्यान रहे कि पौधे की जड़ के पास पानी इकट्ठा न हो। गर्मियों में — हर 5–7 दिन, सर्दियों में — हर 10 दिन की दूरी पर सिंचाई पर्याप्त होती है।
खेती शुरू करने के लगभग 10 से 13 महीने बाद पपीते की तुड़ाई शुरू हो जाती है। फल जब गहरे हरे रंग से हल्के पीले होने लगें और दूध की जगह पानी जैसा तरल निकले, तो समझना चाहिए कि फल तोड़ने लायक हो गया है। औसतन एक पौधा 40 से 70 किलो फल देता है, जबकि पपेन उत्पादन के लिए प्रति पौधा 150–200 ग्राम पपेन भी प्राप्त किया जा सकता है।