कम पानी और कम लागत में बंपर मुनाफा! मसूर की खेती कैसे करें, जानें एक्सपर्ट से
मसूर की बुवाई के लिए बलुई दोमट या मध्यम दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए। पलेवा करके 2 से 3 जुताई करने से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है।

Lentil cultivation : भारतीय रसोई में मसूर की दाल का अपना एक अलग स्थान है। पौष्टिक होने के साथ-साथ यह दाल आम जनमानस की पहुंच में भी आसानी से आ जाती है। जहां एक तरफ यह अन्य दालों के मुकाबले सस्ती पड़ती है, वहीं इसके सेवन से सेहत को भी कई फायदे मिलते हैं। मसूर में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम और लोहा जैसे जरूरी पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
खाने के लिए ही नहीं, बल्कि किसानों के लिए भी मसूर की फसल किसी वरदान से कम नहीं है। यह उन इलाकों के लिए वरदान साबित हो सकती है जहां पानी की कमी हो। मसूर में सूखा सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है। इसके अलावा, यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और मृदा क्षरण रोकने में भी मददगार साबित होती है। आइए, जानते हैं सीनियर साइंटिस्ट डॉ. ज्योति कुमारी की राय से कि किस तरह कम लागत में मसूर की खेती करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।
कैसे करें खेत की तैयारी?
मसूर की बुवाई के लिए बलुई दोमट या मध्यम दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए। पलेवा करके 2 से 3 जुताई करने से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे बीजों का जमाव बेहतर होता है। खेत में मौजूद खरपतवार और पिछली फसल के अवशेषों को साफ कर देना चाहिए।
बुवाई का सही समय और तरीका
अच्छी पैदावार के लिए समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। अक्तूबर का आखिरी हफ्ता मसूर की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, हालांकि नवंबर के दूसरे हफ्ते तक भी बुवाई की जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि देसी हल के मुकाबले सीडड्रिल से बुवाई करने पर उत्पादन अधिक मिलता है। इससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और निराई-गुड़ाई भी आसान हो जाती है।
नई प्रजातियां और बीजोपचार
किसान मसूर की उन्नत प्रजातियों जैसे लेंस 4076, डीपीएल 15, पूसा वैभव, डीपीएल 62, जेएल 3, आईपीएल 81, केएलएस 218, एचयूएल 57 और वीएल 507 का चयन कर सकते हैं। बीजों को बोने से पहले जरूर बीनोमाइल 0.3 प्रतिशत से उपचारित करना चाहिए। अगर किसी खेत में पहली बार मसूर की खेती हो रही हो, तो राइजोबियम कल्चर का इस्तेमाल जरूर करें। इससे जड़ों में गांठें बनती हैं और पैदावार बढ़ती है।
उर्वरकों का सही इस्तेमाल
मसूर दलहनी फसल होने के कारण कम मात्रा में नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। प्रति हेक्टेयर 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस और 30-40 किलोग्राम पोटाश का उपयोग करें। जिन इलाकों में जिंक की कमी हो, वहां 2.5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और सल्फर की जरूरत होने पर 30 किलोग्राम सल्फर का इस्तेमाल लाभदायक रहता है।
कीट नियंत्रण और कटाई
मसूर में कीड़ों का प्रकोप कम होता है, लेकिन जनवरी में तापमान बढ़ने पर माहू का खतरा रहता है। इसके लिए डाइमिथोएट 0.03 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। वहीं, कटाई का सही समय तब होता है जब 70 से 80 फीसदी फलियां सूखने लगें। समय पर कटाई करने से दानों का झड़ना रुकता है और गुणवत्ता बनी रहती है। Lentil cultivation
Lentil cultivation : भारतीय रसोई में मसूर की दाल का अपना एक अलग स्थान है। पौष्टिक होने के साथ-साथ यह दाल आम जनमानस की पहुंच में भी आसानी से आ जाती है। जहां एक तरफ यह अन्य दालों के मुकाबले सस्ती पड़ती है, वहीं इसके सेवन से सेहत को भी कई फायदे मिलते हैं। मसूर में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम और लोहा जैसे जरूरी पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
खाने के लिए ही नहीं, बल्कि किसानों के लिए भी मसूर की फसल किसी वरदान से कम नहीं है। यह उन इलाकों के लिए वरदान साबित हो सकती है जहां पानी की कमी हो। मसूर में सूखा सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है। इसके अलावा, यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और मृदा क्षरण रोकने में भी मददगार साबित होती है। आइए, जानते हैं सीनियर साइंटिस्ट डॉ. ज्योति कुमारी की राय से कि किस तरह कम लागत में मसूर की खेती करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।
कैसे करें खेत की तैयारी?
मसूर की बुवाई के लिए बलुई दोमट या मध्यम दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए। पलेवा करके 2 से 3 जुताई करने से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे बीजों का जमाव बेहतर होता है। खेत में मौजूद खरपतवार और पिछली फसल के अवशेषों को साफ कर देना चाहिए।
बुवाई का सही समय और तरीका
अच्छी पैदावार के लिए समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। अक्तूबर का आखिरी हफ्ता मसूर की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, हालांकि नवंबर के दूसरे हफ्ते तक भी बुवाई की जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि देसी हल के मुकाबले सीडड्रिल से बुवाई करने पर उत्पादन अधिक मिलता है। इससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और निराई-गुड़ाई भी आसान हो जाती है।
नई प्रजातियां और बीजोपचार
किसान मसूर की उन्नत प्रजातियों जैसे लेंस 4076, डीपीएल 15, पूसा वैभव, डीपीएल 62, जेएल 3, आईपीएल 81, केएलएस 218, एचयूएल 57 और वीएल 507 का चयन कर सकते हैं। बीजों को बोने से पहले जरूर बीनोमाइल 0.3 प्रतिशत से उपचारित करना चाहिए। अगर किसी खेत में पहली बार मसूर की खेती हो रही हो, तो राइजोबियम कल्चर का इस्तेमाल जरूर करें। इससे जड़ों में गांठें बनती हैं और पैदावार बढ़ती है।
उर्वरकों का सही इस्तेमाल
मसूर दलहनी फसल होने के कारण कम मात्रा में नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। प्रति हेक्टेयर 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस और 30-40 किलोग्राम पोटाश का उपयोग करें। जिन इलाकों में जिंक की कमी हो, वहां 2.5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और सल्फर की जरूरत होने पर 30 किलोग्राम सल्फर का इस्तेमाल लाभदायक रहता है।
कीट नियंत्रण और कटाई
मसूर में कीड़ों का प्रकोप कम होता है, लेकिन जनवरी में तापमान बढ़ने पर माहू का खतरा रहता है। इसके लिए डाइमिथोएट 0.03 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। वहीं, कटाई का सही समय तब होता है जब 70 से 80 फीसदी फलियां सूखने लगें। समय पर कटाई करने से दानों का झड़ना रुकता है और गुणवत्ता बनी रहती है। Lentil cultivation












