मई 2023 में भारत और अमेरिका के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की बातचीत में इस दिशा में प्रगति हुई, और जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान इस समझौते की घोषणा की गई। इससे भारत की जेट उत्पादन क्षमता में भी वृद्धि होगी।

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने भारत के तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) कार्यक्रम को मजबूत करने के लिए अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस के साथ 113 एफ-404 जीई आईएन-20 जेट इंजन की आपूर्ति का एक अरब डॉलर का करार किया है। यह न केवल भारत की वायु सेना की क्षमता को बढ़ाने का कदम है, बल्कि स्वदेशी हथियार उत्पादन को भी नई दिशा देगा।
बता दे कि एफ-414 इंजन का विकास एक लंबे समय से भारत की स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजनाओं का अभिन्न हिस्सा रहा है। 1990 के दशक में इस इंजन की आवश्यकता महसूस की गई थी, लेकिन तकनीकी निर्यात नियंत्रणों के कारण समझौते में बाधाएँ आईं। मई 2023 में भारत और अमेरिका के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की बातचीत में इस दिशा में प्रगति हुई, और जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान इस समझौते की घोषणा की गई। इससे भारत की जेट उत्पादन क्षमता में भी वृद्धि होगी।
वर्तमान में भारतीय वायु सेना (IAF) लगभग 29 स्क्वाड्रनों का संचालन कर रही है, जबकि इसकी जरूरत 42 स्क्वाड्रनों की है। तेजस और अन्य उन्नत लड़ाकू विमानों को शक्ति प्रदान करने वाले इस इंजन से भारतीय वायु सेना को अपनी ताकत बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे न केवल तेजस, बल्कि उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA) और नौसेना के स्वदेशी ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर (TEDBF) जैसे विमानों को भी शक्ति मिलेगी।
यह इंजन बोइंग के सुपर हॉर्नेट और ग्रिपेन जैसे अग्रणी लड़ाकू विमानों के पीछे की शक्ति है। इसकी विशेषता इसकी तेज थ्रॉटल प्रतिक्रिया, उच्च दक्षता, और पर्यावरणीय अनुकूलता है। इसमें नवीनतम तकनीकें हैं, जो इसे बहुमुखी और विश्वसनीय बनाती हैं। यह इंजन 22,000 पाउंड (98 kN) थ्रस्ट उत्पन्न कर सकता है और शून्य थ्रॉटल पर भी प्रदर्शन कर सकता है।
भारत ने अपने स्वदेशी लड़ाकू जेट इंजन विकसित करने का सपना देखा है। कावेरी इंजन परियोजना, जो 1980 के दशक में शुरू हुई थी, कई सफलताओं और असफलताओं से भरी है। हालांकि, तकनीकी चुनौतियों और व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण यह परियोजना कई बार धीमी पड़ी, लेकिन अब यह मानवरहित लड़ाकू वाहनों (यूसीएवी) के लिए पुनः उपयोग में लाया जा रहा है।
यह समझौता भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न केवल तेजस जैसे स्वदेशी विमान और अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने में मदद मिलेगी, बल्कि देश की रक्षा तकनीक में भी आत्मनिर्भरता आएगी। अमेरिका के साथ यह साझेदारी भारत की सैन्य क्षमताओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। यह कदम भारत की रक्षा स्वायत्तता और तकनीकी प्रगति का प्रतीक है, जो देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ वैश्विक सैन्य प्रतिस्पर्धा में भी अहम भूमिका निभाएगा।