अगला संघ प्रमुख किस जाति का होगा, मोहन भागवत ने बताया आधार

संघ में नेतृत्व का चयन मुख्य रूप से संगठन में अनुभव, समर्पण और हिंदू पहचान के आधार पर होता है, न कि जातिगत समीकरणों के आधार पर। आरएसएस का प्रमुख चुनाव से नहीं चुना जाता। यह निर्णय संगठन के वरिष्ठ नेताओं और सक्रिय कार्यकताओं की सलाह से लिया जाता है।

mohan bhagwat (1)
मोहन भागवत
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar09 Feb 2026 05:16 PM
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RSS Chief : इस समय यह स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का अगला सरसंघचालक किस जाति से होगा। संगठन की परंपरा में जाति को किसी भी प्रकार का औपचारिक मानदंड नहीं माना गया है। संघ में नेतृत्व का चयन मुख्य रूप से संगठन में अनुभव, समर्पण और हिंदू पहचान के आधार पर होता है, न कि जातिगत समीकरणों के आधार पर। आरएसएस का प्रमुख चुनाव से नहीं चुना जाता। यह निर्णय संगठन के वरिष्ठ नेताओं और सक्रिय कार्यकताओं की सलाह से लिया जाता है। ऐतिहासिक रूप से संघ के प्रमुख विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए हैं, लेकिन जाति कभी चयन का तय मानदंड नहीं रही।

मोहन भागवत का दृष्टिकोण

हाल ही में मोहन भागवत ने साफ किया कि सरसंघचालक के चयन में जाति का कोई महत्व नहीं है। मुख्य आवश्यकता यह है कि व्यक्ति संगठन के प्रति प्रतिबद्ध और हिंदू पहचान वाला हो। उन्होंने यह भी बताया कि आरएसएस का विस्तार जाति के आधार पर नहीं बल्कि भौगोलिक और सामाजिक कार्यों के आधार पर हुआ है। 

आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व में ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा

भागवत का यह बयान उन आलोचनाओं के बीच आया है, जिनमें यह आरोप लगाया जाता रहा है कि आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व में ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन की प्रक्रिया राजनीतिक दलों जैसी जातिगत समीकरणों पर आधारित नहीं है। अभी तक यह तय नहीं है कि अगला आरएसएस प्रमुख किस जाति का होगा। आरएसएस में जाति की बजाय योग्यता, अनुभव और संगठन के प्रति समर्पण निर्णय के मुख्य मानदंड हैं। मोहन भागवत ने यही परंपरा और प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाया है। RSS Chief


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विदेशी मुद्रा का नया स्रोत बना भारत का दूध, घी और मक्खन, जानें किन देशों को भेजता है निर्यात

भारतीय दूध, घी और मक्खन अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी पसंद किया जाता है और साथ ही, कई अन्य देशों की तुलना में भारतीय डेयरी उत्पादों की कीमतें किफायती होना भी इनकी बढ़ती मांग का प्रमुख कारण है।

Milk—Ghee—Butter Export
भारतीय डेयरी उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय पहचान (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar09 Feb 2026 04:55 PM
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Milk-Ghee-Butter Export: भारत को आमतौर पर दुनिया का अनाज और मसालों का भंडार कहा जाता है, लेकिन अब एक ऐसा सेक्टर उभर कर सामने आ रहा है जो चुपचाप देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रहा है। यह है देश का डेयरी सेक्टर। दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक होने के नाते भारत अब घरेलू जरूरतों के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी अपनी दबदबा बना रहा है। भारतीय दूध, घी और मक्खन आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं।

ये हैं भारतीय उत्पादों के बड़े खरीदार

भारतीय डेयरी उत्पादों की सबसे बड़ी मांग मध्य पूर्व और एशियाई देशों से आ रही है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों में भारतीय घी की खास मांग है। इसके अलावा, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देश भी भारत से दूध और मिल्क पाउडर की खरीदारी करते हैं। वहीं, अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, फिलीपींस, नाइजीरिया और मिस्र भी भारत से डेयरी उत्पादों का आयात करने वाले प्रमुख देशों में शुमार हैं। मध्य पूर्व और एशियाई देशों में बड़ी संख्या में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की वजह से भी यहां देसी खान-पान की मांग बरकरार है, जिससे भारतीय उत्पादों को बढ़ावा मिल रहा है।

शुद्धता और कीमत है बड़ी वजह

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय घी की शुद्धता और स्वाद को काफी पसंद किया जाता है। साथ ही, कई अन्य देशों की तुलना में भारतीय डेयरी उत्पादों की कीमतें किफायती होना भी इनकी बढ़ती मांग का प्रमुख कारण है। भारत मुख्य रूप से स्किम्ड मिल्क पाउडर, फुल क्रीम मिल्क पाउडर, घी और मक्खन का निर्यात करता है। हाल के वर्षों में फैट बेस्ड उत्पादों (घी और मक्खन) की मांग में सबसे ज्यादा उछाल देखा गया है। इसके अलावा पनीर और दही के निर्यात में भी तेजी आई है।

आंकड़े: कितनी हुई कमाई?

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने सिर्फ घी और मक्खन के निर्यात से करीब 3,222 करोड़ रुपये की कमाई की है। वहीं, पनीर और दही के निर्यात से लगभग 495 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ है। इससे पहले वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने कुल डेयरी उत्पादों का निर्यात करीब 272.64 मिलियन डॉलर के स्तर पर किया था। अब माना जा रहा है कि 2024-25 में यह आंकड़ा पहले से बेहतर रहेगा।

बड़ी भूमिका निभा रही ये कंपनियां

भारत के डेयरी निर्यात में गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF), मदर डेयरी और वीआरएस फूड्स जैसी कंपनियों की अहम भूमिका है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार उत्पाद तैयार कर ये कंपनियां 136 से ज्यादा देशों में भारतीय डेयरी उत्पादों की पहुंच बना चुकी हैं। मजबूत दुग्ध उत्पादन व्यवस्था और कोऑपरेटिव मॉडल की वजह से भारत अब दुनिया के डेयरी मैप पर एक मजबूत स्थिति में है। Milk-Ghee-Butter Export

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ईवी बाजार में ‘माइक्रो कारों’ की फीकी पड़ती चमक, ग्राहकों ने दिखाया ठंडा प्रतिक्रिया

माइक्रो ईवी एक तरह से 'न नौ मन तेल, न राधा नाचे' की स्थिति में फंस गई हैं। ये न तो पूरी तरह से स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। लगभग 8 फीट लंबी ये कारें 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक भाग सकती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद अब बदल चुकी है।

Micro Electric Cars
माइक्रो ईवी की बिक्री में सुस्ती बरकरार (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar09 Feb 2026 03:50 PM
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Micro Electric Cars: भीड़-भाड़ वाले शहरों और संकरी गलियों के लिए बनी माइक्रो इलेक्ट्रिक कारें (Micro EVs) कागज पर तो एक बेहतरीन समाधान लगती हैं, लेकिन हकीकत में ये ग्राहकों को रिझाने में असफल साबित हो रही हैं। वैश्विक ऑटोमोबाइल बाजार में इन छोटी कारों की हिस्सेदारी बेहद नगण्य बनी हुई है। पिछले साल पूरी दुनिया में लगभग 800 अरब डॉलर की इलेक्ट्रिक कारें बिकीं, जिसमें इन नन्ही कारों का हिस्सा महज 11 अरब डॉलर रहा। यानी, कुल मार्केट में इनकी हिस्सेदारी केवल 1.37 प्रतिशत है। आसान शब्दों में कहें तो, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के हर 100 रुपये के कारोबार में इनका हिस्सा डेढ़ रुपये से भी कम है।

‘न नौ मन तेल, न राधा नाचे’

विश्लेषकों का मानना है कि माइक्रो ईवी एक तरह से 'न नौ मन तेल, न राधा नाचे' की स्थिति में फंस गई हैं। ये न तो पूरी तरह से स्कूटर हैं और न ही पूरी कार। लगभग 8 फीट लंबी ये कारें 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक भाग सकती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं की पसंद अब बदल चुकी है। जिन लोगों को पैसे बचाने होते हैं, वे सस्ते दोपहिया वाहनों को तरजीह दे रहे हैं, जबकि जिन्हें आराम, सुरक्षा और लंबी दूरी तय करनी होती है, वे सीधे बड़ी एसयूवी (SUV) की ओर रुख कर रहे हैं। लोगों को ऐसी गाड़ी चाहिए जो स्कूटर से सुरक्षित हो और बड़ी कार से सस्ती, लेकिन मौजूदा माइक्रो ईवी इस दोहरी मांग को पूरा करने में नाकाम रही हैं।

चीन और भारत में बदला रुझान

छोटी कारों के मामले में सबसे आगे रहने वाला चीन भी अब इस रुझान से बाहर निकल रहा है। हालांकि, चीन की वुलिंग मिनी ईवी (Wuling Mini EV) ने पिछले साल अक्टूबर में बिक्री के मामले में टेस्ला जैसी दिग्गज कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया था, लेकिन अब वहां के लोगों की पसंद बदल रही है। चीन में लोग अमीर हो रहे हैं और वे छोटी कार की जगह बड़ी और प्रीमियम एसयूवी खरीदना पसंद कर रहे हैं। भारत की बात करें तो यहां का हाल भी कुछ ऐसा ही है। एमजी (MG) मोटर्स की छोटी कार 'कोमेट' की तुलना में उनकी बड़ी और महंगी 'विंडसर एसयूवी' चार गुना ज्यादा बिक रही है। यह साफ दर्शाता है कि भारतीय ग्राहक भी अब छोटी गाड़ी के बजाय ज्यादा जगह और बेहतर फीचर्स वाली गाड़ी को प्राथमिकता दे रहे हैं।

कंपनियों की नई रणनीति: रोबोटैक्सी पर दांव

आम ग्राहकों की उदासीन प्रतिक्रिया के बावजूद बड़ी कंपनियां पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की दिग्गज कंपनी टेस्ला अपनी दो सीटों वाली 'साइबरकैब' लेकर आ रही है। हालांकि, एलन मस्क इसे आम लोगों को बेचने के बजाय बिना ड्राइवर चलने वाली 'रोबोटैक्सी' (Robotaxi) के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा, होंडा, टोयोटा और ह्यूंदै जैसी वैश्विक कंपनियां भी अपने नए छोटे मॉडल बाजार में उतारने की तैयारी कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के लिए माइक्रो ईवी बनाना आसान है, क्योंकि इनमें छोटी बैटरी लगती है और सरकारी नियम भी अपेक्षाकृत ढीले होते हैं। लेकिन, जो स्टार्टअप्स सिर्फ इन्हीं कारों पर निर्भर थीं, उनकी हालत खराब है। कई छोटी कंपनियां दिवालिया हो चुकी हैं और बची हुई कंपनियां टिके रहने के लिए निवेशकों से मदद की गुहार लगा रही हैं। Micro Electric Cars