Marriage : दरक रही है भारत में जन्मी सबसे शानदार व्यवस्था जिसका नाम है ‘विवाह’
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भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 10:02 PM
- अंजना भागी
नई दिल्ली। भारत ऋषि मुनियों और पीर पैंगम्बरों का देश है। इसी देश से दुनिया की सबसे शानदार व्यवस्था के नाम से प्रचलित ‘विवाह’ जैसी अद्भुत संस्था का जन्म हुआ है। दुर्भाग्य से आज हमारी सदियों पुरानी विवाह संस्था दरक रही है। या यूं कहें यह संस्था विवादों का केन्द्र बन गई है।
ऐसे में ढेर सारे सवाल भी खड़े हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या वैवाहिक संबंधों में आ रही कड़वाहट या टूटन का कारण सहनशक्ति की कमी, जुबानदराजी, समाज का भय न होना, अपनों से अधिक गैरों की राय, परिवार से कटना, घंटों मोबाइल पर चिपके रहना, गृहस्थी या जीवन साथी पर ध्यान ही न देना, बजुर्गों को बोझ समझना, शिक्षा की वह सोच कि यदि कभी तलाक-वलाक हो गया तो पढ़ी-लिखी बेटी कमा खाएगी। क्या ऐसा नहीं लगता कि जब पढ़ाई-लिखाई की सोच ही अनिष्ट की आशंका से पैदा हो तो विवाह संस्था भी डार्क ही रहेगी।
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इस मुद्दे पर आज हम सब कहीं न कहीं मनन करने लगे हैं। जब मैंने भी अपने आसपास देखा तो पाया कि जिन युवाओं की बारात में हम खूब नाचे थे, उनमें से कुछ का तो तलाक भी हो गया। एकाध का केस कोर्ट में चल भी रहा है। कुछ जिंदगी को चला रहे हैं। खुश जोड़े अब बहुत नसीब वाले ही हैं। ये नहीं कि हैं ही नहीं, हैं पर अब आलम पहले सा नहीं रहा। सात जन्मों का बंधन सात माह, या सात वर्षों पर ही दम तोड़ रहा है। डाटा देखा तो यह रेशियो अब 60 प्रतिशत की ओर बढ़ रहा है। विवाह संस्था को लेकर जब मैंने हमारे समाज से जुड़े कुछ अहम लोगों से इस विषय पर बातचीत की तो धारणा कहीं उनकी भी कुछ इस विचार से मिलती-जुलती ही निकली।
डॉ. शोभा भारद्वाज इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में डॉक्टरेट हैं। महिला इंटरमीडिएट कॉलेज की प्रिंसिपल रहीं। वे दयाल सिंह कॉलेज दिल्ली में इंटरनेशनल पॉलिटिक्स पढ़ाती रहीं हैं। अब एक समाजसेविका हैं। विवाह संस्था को लेकर उनके विचार इस प्रकार हैं। वे कहती हैं कि हिन्दू विवाह पाणिग्रहण संस्कार है। भारतीय संस्कृति के अनुसार स्त्री पुरुष के संबंध पूरकता, सहयोग की भावना पर आधारित माने जाते हैं। अतः जीवनसाथी एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। दाम्पत्य जीवन अर्द्धनारीश्वर शब्द की कल्पना हमारी संस्कृति की ही देन है। ऐसा उदाहरण दूसरी किसी भी संस्कृति में नहीं मिलता। प्राचीन काल में स्त्रियों की गरिमा और स्वतन्त्रता का पूरा सम्मान किया जाता था। विवाह में पाणिग्रहण संस्कार के समय पति-पत्नी का हाथ पकड़ कर कहता था कि मेरे घर की साम्राज्ञी बनो।
नारी की समानता की भावना पश्चिम की देन है। हमारे यहां नारी को पुरुष से श्रेष्ठ मानते हैं। मां हमारे यहां सबसे ऊंचे सिंहासन के योग्य है। वह जन्मदात्री ही नहीं, पालक भी है। पत्नी सहचरी अद्धांगिनी यज्ञ में वह पति के साथ आहुति देती है। श्रीराम ने सीता का त्याग किया था, लेकिन अश्वमेध यज्ञ रामजी की बगल में सोने की सीताजी की मूर्ति स्थापित कर ही सम्पन्न हुआ था। पति पत्नी सन्तान से ही सम्पूर्ण होते हैं। प्राचीन राजवंशों में राजकन्या के हाथ में जयमाला होती थी। वह अपनी इच्छा के अनुसार पुरुष के गले में जयमाला डालकर वर का चुनाव करती थी।
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हिन्दू विवाह को पाणिग्रहण संस्कार के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है, जिसे विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है, परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतर का सम्बंध माना जाता था, जिसे किसी भी परिस्थिति में तोड़ा नहीं जा सकता। अक्सर महिलाएं करवा चौथ के व्रत के समय अपने पति को सात जन्मों के लिए मांगती हैं। प्राचीन शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन हिंदू विवाह में संबंध विच्छेद जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। तलाक शब्द मुस्लिम कानून में प्राप्त होता है तथा रोमन विधि में डायवोर्स शब्द है, परंतु शास्त्रीय हिंदू विधि के अधीन विवाह विच्छेद जैसी कोई अवधारणा नहीं रही है। हिंदुओं में विवाह एक पवित्र संस्कार है, जो अग्नि से बंधा होता है।
विवाह एक प्रेममय गृहस्थ जीवन के लिए है, परंतु यदि यह विवाह जीवन में क्लेश का कारण बन जाए तथा यह विवाह के पक्षकारों के भीतर उन्माद को भरकर रख दे और दोनों के भीतर नफरत की आग जलने लगे तो ऐसी परिस्थिति में विवाह के संबंध को रखना मुश्किल हो जाता है।
कहते हैं पति पत्नी का जोड़ा स्वर्ग में बनता है जरूरी नहीं है। कुछ नर्क में भी बनते हैं। जब भी शादी केवल अभिप्राय या लाभ की दृष्टि से की जाती है, एक पक्ष आंख मूंद लेता है, अभिप्राय पूरा न होने पर विवाह सम्बंध में दरार आ जाती है। हैरानी होती है, धूमधाम से विवाह होते हैं। अचानक दोनों पक्ष कोर्ट में खड़े होकर ऐसे लड़ते हैं जैसे दो दुश्मन। प्रेम विवाहों का भी अंत तलाक के रूप में नजर आने लगा है। कभी एक दूसरे के प्रेम की कसमें खाते थे, वे ही कोर्ट में एक दूसरे पर अभियोग लगाते हैं। समय बीतने के साथ इतनी कड़वाहट कैसे हुई? आजकल अरेंज मैरेज में भी माता पिता की कोशिश रहती है, विवाह से पहले एक दूसरे को जान लें। भावी जोड़े घंटांे बातें करते हैं। रात के सन्नाटे में बातों का सिलसिला बढ़ता जाता है। एक दूसरे के सामने दिल खोलकर रख देते हैं। लड़के अपने कितने ब्रेक हुए, कितनी बार दिल टूटा, यह भी नहीं छुपाते। लड़कियां भी कम नहीं हैं। ऐसा लगता है एक दूसरे के बिना जी नहीं सकेंगे। शुद्ध मन से पिछला सब भूलकर एक दूसरे से सम्बंध जोड़ना चाहते हैं। हैरानी होती है, एक दूसरे से दिल खोला था, अब उन्हीं विषयों को कोर्ट में उछाला जाता है। तलाक इन्हीं प्रश्नों पर हो जाता है।
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तलाक के अनेक कारण हैं कभी पति पत्नी के मनमुटाव का कारण परिवार के लोग होते हैं। कभी आपसी सम्बन्धों में तकरार, फिर खटास परिवार टूटने का कारण बन जाता है। दहेज एवं शादी के बाद वर पक्ष की ओर से निरंतर मांग बढ़ रही है। पत्नी को इतना प्रताड़ित किया जा रहा है, रहना मुश्किल हो जाता है। कभी पत्नी के होते हुए भी दूसरी स्त्री से सम्बंध बना लेना, घर टूटने का कारण बन जता है। ऐसे आक्षेप पत्नी पर भी लगाये जाते हैं।
परिवारों में आएदिन झगड़े बढ़ रहे हैं। यदि मर्द क्रोधी है तो महिलाएं भी कम नहीं हैं। रोज की तू-तू, मैं-मैं इतने बढ़ गये हैं कि नौबत तलाक तक आ गयी है। तलाक के कारण भी जरा जरा से हैं। ईगो इतनी टकराती है, अंत में घर टूटता है। दोनों कहते हैं, अब साथ रहना मुश्किल था। 16 वर्ष की शादी थी, बच्चे भी हैं, लेकिन तलाक बच्चों का क्या होगा। कभी बच्चों के लिए खींचतान कोई नहीं सोचता, सिंगल पेरेंट, बच्चे की परवरिश कितनी मुश्किल है। महिलाओं के हित में दहेज संबंधी कानून उनकी सुरक्षा एवं सुसराल की मांगों और प्रताड़ना से बचाने के लिए बनाये गये थे। झगड़े का विषय कुछ भी हो, उसे दहेज प्रताड़ना से जोड़ दिया जाता है और अधिकतर मामले झूठे पाए गये हैं। अखबारों में विवाह के विज्ञापनों में तलाकशुदा के लिए लिखा जाता है, केवल फेरों के दोषी ऐसा क्यों? दोनों ने या परिवार वालों ने विवाह सम्बन्धों को टूटने से बचाने की कोशिश क्यों नहीं की? हमारे यहां आज भी तलाकशुदा स्त्री पुरुष का पुनर्विवाह आसान नहीं है।
मेरी अगली भेंट डॉक्टर अशोक भारद्वाज जी से थी। आप दिल्ली पुलिस हॉस्पिटल में डॉक्टर रहे, अब अपनी प्रेक्टिस। आपके पास बहुत से युवा आते हैं। उन भेंटों के आधार पर आपकी प्रतिक्रिया-
डॉ. अशोक भारद्वाज कहते हैं, प्रश्न उठता है क्यों आज के युवक युवतियां जीवन की सीढ़ी पर पांव रखने से पहले स्वयं की सुख शान्ति को अधिक महत्व देते हैं। विवाह से पूर्व अपनी कल्पना में ऐसी तस्वीर हृदय में बसा लेते हैं, जिसे जीवन साथी के रूप में ढूंढना आसान नहीं होता। आज के संचार माध्यमों ने विवाह को मुश्किल कर दिया है। एक बटन पर ऊगली रखते ही भावी मैच की तस्वीरें एवं उनका बायोडेटा स्क्रीन पर तेजी से आने लगता है, कहां ठहरें? निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अगला मैच सामने आ जाता है।
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आज के युवक युवतियां तर्क करते हैं, पशु पक्षियों को अपना जोड़ा तलाश करने का अधिकार है, हमें क्यों नहीं? माता पिता द्वारा अरेंज मेरिज की धारणा को पसंद नहीं करते। उनकी तलाश जानकार मित्रों से शुरू होती है, मिलना, बातें करना, एक दूसरे को रिझाने के लिए अपना बखान करते हैं। दोनों कुछ देर के लिए मिलते हैं। अपना सर्वोत्तम पेश करते हैं। अच्छी तरह तैयार होकर मिलना, शालीनता से पेश आना और भी बहुत कुछ। विवाह हो जाता है। असलियत सामने आती है, लगता है लुट गये। विवाह इस बात पर निर्भर करता है, जोड़ा एक दूसरे का पूरक है, जो गुण मुझमें नहीं है। वह साथी में हो, दोनों एक दूसरे का सम्मान करें न कि कमियां गिनवायें। यहीं से झगड़ा शुरू हो जाता है। एक आम शिकायत होती है, तुम पहले ऐसे या ऐसी नहीं थी। शादी का एक अर्थ गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चलाना है। अक्सर लड़के लड़कियां कहते हैं मेरे टाइप का जीवन साथी चाहिए, शादी के लिए यदि आप अपनी फोटो कापी ढूंढ रहे थे, यह नामुमकिन है। असंतोष तो होगा ही, यदि एक को गुस्सा जल्दी आता है, दूसरे का स्वभाव भी ऐसा है तो चिंगारियां निकलेंगी ही।
विवाह के इच्छुक लड़के लड़कियों को अपने चारो और के विवाहित जोड़ों के जीवन को ध्यान से देखना चाहिए। अच्छे जोड़े कैसे रहते हैं, लड़ने भिड़ने वाले जोड़ों में ऐसी क्या कमियां थीं, जो तलाक की नौबत आ गयी। समस्याओं का हल सहनशीलता एवं गम्भीरता से निकलता है। जरूरत एक दूसरे को समझने की है। यदि आप खर्चीले हैं, आपको पैसा फेंकना अच्छा लगता है, आपके साथी को समझाना होगा, बुरा समय भी आ सकता है, पिंक स्लिप, अचानक बिमारी, एक्सीडेंट की स्थिति में क्या होगा? यदि दोनों नौकरी करते हैं। खासकर पति की नौकरी जाती है, वह निराश है, बात-बात पर उग्र हो जाता है, उसका अहम पत्नी के आश्रित रहने में आड़े आता है। तानाकशी स्वभाव बनता जा रहा है। लड़ाई झगड़े होंगे पत्नी को पति की स्थिति समझनी होगी, नहीं तो अंत तलाक पर ही पहुंच जाता है। कोरोना काल में सबसे अधिक पति पत्नी के बीच में झगड़े हुए हैं। एक दूसरे को सहना भारी पड़ गया पैसे की कमी, जबकि जरूरत सहयोग की थी। आज का ज्यादातर युवा वर्ग नहीं जानता, सब दिन होत न एक समान। बुरे समय के लिए हर वक्त तैयार रहो। रिश्ते जो दर्द से जुड़ते हैं या कठिन समय को मिलकर काटते हैं, मजबूत होते हैं।
विवाह एक कर्तव्य है। हर इन्सान को अपने पुरखों का यह कर्ज चुकाना है। अगली पीढ़ी को एक जिम्मेदार, योग्य बच्चे सौंप पितृ-ऋण को निभाना है। हर व्यक्ति का यह एक नैतिक कर्तव्य माना जाता है। समझना चाहिए बच्चे के लिए मां-पिता दोनों जरूरी है। उनकी खातिर अहम त्याग कर अच्छे गृहस्थ बनें। मां बच्चे को जन्म देती है, पिता ऐसा वातावरण बनाते हैं जिससे बच्चे का सम्पूर्ण विकास हो सके, फिर झगड़ा किसलिए। पति पत्नी का सौहार्द घर की शान्ति बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में सहायक होते हैं।
शादी कर क्या खोया आजादी, स्वच्छंदता, मनमर्जी से जीवन बिताने का आनन्द? क्या पाया? ठहराव, भटकन समाप्त हुई, मन की चंचलता, मृगतृष्णा पर विराम लगा। ज्यों-ज्यों आयु बढ़ती है, एक दूसरे को समझने लगते हैं। एक दूसरे का संग साथ अच्छा लगता है। अधिकतर विवाहित जोड़े अपने मित्रों में शादी के बाद की कमियां, झगड़े और दुख गिनाते हैं। अच्छे पल, एक दूसरे का सहारा भविष्य के प्रति आश्वस्त होना अपना पर्सनल मामला समझते हैं और उसे किसी से नहीं बांटते। अविवाहित दोस्त उन दुखों की गठरी को सुनकर डर जाते हैं। माता पिता अपने बच्चों के स्वभाव को अच्छी तरह जानते हैं। यदि निस्वार्थ भाव से अपने बच्चों के जीवन साथी का चुनाव करें तो गलती की सम्भावना कम होती है। लोग अपनी शादी बचाने के लिए मैरिज काउन्सलर के पास जाते हैं, जबकि यदि शान्ति से विवाह टूटने से पहले ठंडे दिमाग से आपस में बात करें, मैरिज कौंउसलर की जरूरत ही नहीं है।
विवाह सम्बंध एक दूसरे के प्रति समर्पण से सींचे जाते हैं। जैसे पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है, रिश्ता भी इसी तरह परवान चढ़ता है। जल्दबाजी से कुछ नहीं होता। सम्बंध में खटास आने से पहले समय और धीरज की जरूरत होती है। विवाह फायदे का सौदा सोचकर नहीं किया जाना चाहिए, यह योगदान से चलता है, यही अच्छे रिश्ते की आत्मा है। शादी का इरादा करने से पहले सोचें। बंजर जमीन पर बाग लगाने जा रहे हैं। पहले अपने आप को विवाह के लिए तैयार करें। अपनी गृहस्थी में परायों को न आने दें। भीतर और बाहर दोनों से अपने रिश्ते को बचाकर रखें। स्त्री पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। ईश्वरीय रचना का सम्मान करें। जब विवाह में केवल सुख ढूंढा जाता है, क्लेश पैदा होता है। रिश्ते में भावना से पदार्पण करें। संभावनााएं न तलाशें, अपेक्षाएं, उम्मीदें, दिवास्वप्न, दिखावटीपन से ऊपर की भावना है। घर तोड़ना आसान है। आज के युग में जोड़ना मुश्किल है। जहां अहम हावी हो गया और भी मुश्किल।