वर्कप्लेस में लगातार बढ़ रहा है मेंटल हेल्थ पर खतरा।
भारत
चेतना मंच
18 Jul 2025 02:49 PM
Mental Health : आज के दौर में वर्कप्लेस में मेंटल हेल्थ पर खतरा एक गंभीर समस्या बन चुका है। बढ़ता काम का दबाव, काम की डेडलाइन और लगातार कॉम्पिटिशन ने एम्पलॉइज की मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाला है। भारत में कई कंपनियाँ अब भी मेंटल हेल्थ को नजरअंदाज कर रही हैं। वर्कप्लेस बर्नआउट, एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं लेकिन इस पर खुलकर बातचीत नहीं होती। सवाल यही है—क्या भारतीय कंपनियाँ मेंटल हेल्थ के लिए पर्याप्त कदम उठा रही हैं? अगर नहीं तो अब वक्त है कि कंपनियाँ मेंटल हेल्थ अवेयरनेस को अपने कल्चर का हिस्सा बनाएं।
मेंटल हेल्थ, अब भी एक अनकही कहानी
भारत में ज्यादातर कॉर्पोरेट सेक्टर्स अभी भी मेंटल हेल्थ को केवल "पर्सनल इश्यू" मानते हैं। वर्कर्स अगर थकान या डिप्रेशन की शिकायत करते हैं तो अक्सर उन्हें कमजोर समझा जाता है। यही कारण है कि बहुत से लोग अपनी मानसिक परेशानियों को छुपाने पर मजबूर होते हैं।
2024 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 60% वर्कर्स मेंटल हेल्थ जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं लेकिन उनमें से केवल 15% लोग ही अपने ऑफिस में इस बारे में खुलकर बात करते हैं। डर रहता है कि कहीं इसका असर करियर पर न पड़े।
कंपनियों की क्या भूमिका होनी चाहिए?
मेंटल हेल्थ केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। कंपनियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने कर्मचारियों के लिए एक सुरक्षित और सहायक माहौल तैयार करें। कुछ जरूरी कदम जो कंपनियों को उठाने चाहिए।
काउंसलिंग सेशन की सुविधा - मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स के साथ नियमित सेशन की सुविधा उपलब्ध कराना।
फ्लेक्सिबल वर्क कल्चर - अनेसेसरी ओवरटाइम पर रोक लगाना, वर्क फ्रॉम होम का ऑप्शन देना।
लीव पॉलिसी में सुधार - मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी छुट्टियाँ देना, जिसे 'मेंटल हेल्थ डे' कहा जाता है।
खुली बातचीत का माहौल - सीनियर्स और HR को इस विषय पर संवेदनशील बनाना ताकि कर्मचारी बिना डर के अपनी बात रख सकें।
वर्कलोड मैनेजमेंट - अनेसेसरी प्रेशर को कम करना और टीमवर्क को बढ़ावा देना।
क्या भारतीय कंपनियाँ ऐसा कर रही हैं?
कुछ बड़ी कंपनियाँ जैसे टाटा ग्रुप, विप्रो, इंफोसिस आदि ने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना शुरू किया है। उन्होंने अपने कर्मचारियों के लिए वेलनेस प्रोग्राम, काउंसलिंग सेशन और हेल्पलाइन जैसी सुविधाएँ शुरू की हैं। लेकिन यह बदलाव अभी तक ज्यादातर मल्टीनेशनल या बड़े कॉर्पोरेट्स तक ही सीमित है।
मध्यम और छोटे स्तर की कंपनियों में अब भी मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लिया जाता। वहाँ आज भी "काम करो और चुप रहो" की संस्कृति हावी है।
काम के दबाव से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं धीरे-धीरे एक बड़ी महामारी का रूप ले रही हैं। अगर भारतीय कंपनियाँ इस पर ध्यान नहीं देंगी तो न केवल कर्मचारी प्रभावित होंगे बल्कि प्रोडक्टिविटी और संस्थाओं की विश्वसनीयता भी खतरे में पड़ सकती है।
समय आ गया है कि मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही प्राथमिकता दी जाए जितनी फिजिकल हेल्थ को दी जाती है। सिर्फ वर्क कल्चर को बेहतर बनाकर ही हम एक स्वस्थ और खुशहाल वर्कप्लेस बना सकते हैं।