मोदी का तीसरा कार्यकाल: बीजेपी-संघ रिश्तों का 'स्वर्णकाल' या रणनीतिक समझौता?
भारत
चेतना मंच
26 Nov 2025 02:10 AM
साल 2024 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने लेकिन इस बार उनकी पार्टी बीजेपी को बहुमत नहीं मिला। मजबूरी में सहयोगी दलों पर निर्भर नई सरकार बनी लेकिन इस चुनावी चुनौती के बाद एक और बड़ा घटनाक्रम हुआ बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रिश्तों में एक अप्रत्याशित मिठास लौट आई। Hindi India News
इसी साल 30 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी का नागपुर दौरा, जहां उन्होंने संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि दी और RSS प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की, इन बदले समीकरणों का प्रतीक बना। इसके बाद लाल किले से 15 अगस्त के भाषण में संघ की अप्रत्यक्ष तारीफ और उपराष्ट्रपति पद पर संघ पृष्ठभूमि वाले सी.पी. राधाकृष्णन की नियुक्ति यह सब इस बात का संकेत था कि मोदी का तीसरा कार्यकाल बीजेपी-संघ रिश्तों का 'स्वर्णकाल' बनता जा रहा है।
संघ-बीजेपी: दो जिस्म एक जान?
भारतीय राजनीति में आम धारणा यही रही है कि बीजेपी और RSS एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन यह रिश्ता जितना सहज दिखता है उतना है नहीं। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसी साल मार्च में बेंगलुरु में आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में जब पत्रकारों से बात की, तो उन्होंने कहा, "हम किसी भी सरकार के अभिभावक बनने को तैयार हैं, सिर्फ बीजेपी के नहीं। कोई भी पार्टी हमारे विचारों से मेल खाती है तो हम साथ आ सकते हैं।" इस बयान से स्पष्ट है कि संघ अपने आपको बीजेपी तक सीमित नहीं मानता। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी तक ने संघ से परोक्ष समर्थन लिया था। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की किताब के मुताबिक, 1980 में इंदिरा को सत्ता में लौटने में संघ की भूमिका रही थी। राजनीति में यह साफ संदेश है कि संघ अपने हितों के लिए किसी भी दल से समझौता कर सकता है।
संगठन से ऊपर सत्ता नहीं
पीएम मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने जहां संगठन को मजबूत किया वहीं संघ से दूरी भी कई बार नजर आई। 2024 के लोकसभा चुनावों में संघ की जमीनी सक्रियता कम रही, जिसे बीजेपी के कमजोर प्रदर्शन से जोड़ा गया। जेपी नड्डा के उस बयान ने आग में घी डालने का काम किया जिसमें उन्होंने कहा था, "शुरुआत में हम अक्षम थे, RSS की जरूरत पड़ती थी... अब हम सक्षम हैं, बीजेपी खुद को चला सकती है।" संघ के कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने इसे अपमानजनक माना। यही कारण था कि चुनाव के बाद जब बीजेपी को बहुमत नहीं मिला, तो पार्टी को संगठनात्मक रूप से संघ की ओर लौटना पड़ा। अब राज्यों में पार्टी नेतृत्व में संघ और ABVP पृष्ठभूमि वाले नेताओं को तरजीह दी जा रही है।
अतीत के झगड़े और वर्तमान की समझदारी
ये पहली बार नहीं है जब बीजेपी और संघ के बीच रिश्ते बिगड़े हों। वाजपेयी सरकार के दौरान भी गोधरा कांड, आर्थिक नीतियां और ब्रजेश मिश्रा जैसे सलाहकारों को लेकर संघ और बीजेपी में मतभेद गहरे हो गए थे। संघ प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने तब खुलकर वाजपेयी की आलोचना की थी। इसी तरह, जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के बाद 1977 में भी संघ और राजनीतिक शाखा के बीच टकराव हुआ था। 1980 में बीजेपी के गठन को इसी टकराव का परिणाम माना गया।
भागवत का बदला रुख
पिछले एक साल में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कई ऐसे बयान दिए जो बीजेपी नेतृत्व पर परोक्ष चोट की तरह थे। नवंबर 2024 में जब उन्होंने 75 साल की उम्र में रिटायरमेंट की बात की, तो इसे मोदी-शाह के खिलाफ नाराजगी माना गया। लेकिन 2025 में जैसे-जैसे सत्ता की मजबूरियां बढ़ीं बीजेपी और संघ फिर करीब आते गए।अब ऐसा प्रतीत होता है कि नरेंद्र मोदी ने संघ के साथ रिश्तों को उस स्तर तक पहुंचा दिया है जहां दोनों एक बार फिर 'मिशन 2029' की रणनीति में एकजुट नजर आ रहे हैं।
क्या यह 'स्वर्णकाल' स्थायी है?
आज भले ही बीजेपी और संघ का रिश्ता फिर से मजबूत होता नजर आ रहा हो, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह संबंध पूरी तरह स्थायी हो गया है। दोनों संगठनों की मूल प्रवृत्तियां अलग हैं RSS सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर जोर देता है जबकि बीजेपी सत्ता और चुनावी राजनीति में व्यस्त रहती है। फिलहाल, दोनों ने एक बार फिर हाथ मिला लिया है बीजेपी को सत्ता चलाने के लिए संघ का नेटवर्क चाहिए और संघ को अपनी विचारधारा को आगे ले जाने के लिए एक राजनीतिक माध्यम लेकिन भारतीय राजनीति में समीकरण बदलते देर नहीं लगती।
पीएम मोदी का तीसरा कार्यकाल सिर्फ सत्ता में बने रहने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक संतुलन की मिसाल बनता जा रहा है जहां राजनीति और विचारधारा ने एक बार फिर हाथ मिला लिया है। संघ और बीजेपी का यह नया मेल अगले कुछ वर्षों की भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा। Hindi India News