पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ0 मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, उच्च शिक्षा, सरकारी स्कूलों और भारत की नई शिक्षा नीति पर अपने मन की बात कही है।

Netional news : भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को लेकर बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं। डाक्टर मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में भारत के शिक्षा मंत्रालय को मानव संशाधन विकास मंत्रालय कहा जाता था, इस प्रकार उन दिनों डाक्टर मुरली मनोहर जोशी भारत के शिक्षा मंत्री हुआ करते थे।अमर उजाला समूह के सलाहकार संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री के साथ एक लंबे साक्षात्कार में डॉ. जोशी ने शिक्षा के बजट, पेपर लीक, नकल, बेरोजगारी, सरकारी स्कूलों की स्थिति, शिक्षा के निजीकरण, महंगी उच्च शिक्षा और नई शिक्षा नीति से लेकर ‘विकसित भारत’ की अवधारणा तक पर अपनी स्पष्ट राय रखी है। अमर उजाला के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित इस बातचीत में डॉ. जोशी ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की कई बुनियादी कमियों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल डिग्री और रोजगार पाने का माध्यम नहीं माना जा सकता। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास, समाज के मूल्यों और संस्कृति की समझ तथा राष्ट्र के समग्र विकास से जुड़ा होना चाहिए।
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इस इंटरव्यू को आप डाक्टर मुरली मनोहर जोशी के मन की बात भी कह सकते हैं। इस इंटरव्यू में डाक्टर मुरली मनोहर जोशी ने जोर देते हुए कहा है कि पेपर लीक और नकल की समस्या पर डॉ. जोशी ने कहा है कि पेपर लीक को केवल परीक्षा प्रणाली की तकनीकी खामी मानना समस्या की जड़ तक पहुंचना नहीं है। शिक्षा और रोजगार के बीच मजबूत संबंध नहीं होने तथा समाज में भ्रष्टाचार के बढ़ते प्रभाव को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए। डॉ. जोशी ने कहा कि जब किसी युवा को यह दिखाई देता है कि व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में पैसे और भ्रष्टाचार का प्रभाव है, नियुक्तियां और ठेके भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं तथा सार्वजनिक जीवन में गलत रास्तों के उदाहरण मौजूद हैं, तो उससे केवल नैतिकता की अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार व्यवस्था ने जिस तरह का रास्ता बनाया है, उसका असर छात्रों और युवाओं पर भी पड़ता है। उन्होंने अपने कार्यकाल की तुलना करते हुए सवाल उठाया कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय पेपर लीक की समस्या उस स्तर पर क्यों नहीं दिखाई दी। उनका कहना था कि उस समय शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी जरूरतों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा था। परीक्षा प्रश्नपत्रों की सुरक्षा को लेकर बढ़ते इंतजामों पर भी डॉ. जोशी ने व्यंग्य किया। उन्होंने कहा कि अब स्थिति ऐसी बन गई है जैसे प्रश्नपत्र तैयार करना और उसे सुरक्षित परीक्षा केंद्र तक पहुंचाना किसी युद्ध अभियान का हिस्सा हो। उन्होंने केंद्रीकरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि हर समस्या का समाधान एक ही केंद्रीय व्यवस्था से खोजने के बजाय शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी कमजोरियों को दूर करने की जरूरत है।
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शिक्षा बजट को लेकर डॉ. जोशी का रुख खासा तीखा रहा। उन्होंने कहा कि शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में उस स्तर पर दिखाई नहीं देती, जिस स्तर पर होनी चाहिए। उनके मुताबिक शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों पर खर्च की तुलना में सड़क और परिवहन जैसे क्षेत्रों पर खर्च बढ़ रहा है। उनका कहना था कि सड़क और बुनियादी ढांचा जरूरी हैं, लेकिन देश के विकास की प्राथमिकता तय करते समय यह भी देखना होगा कि उन परियोजनाओं के लिए इंजीनियर, तकनीशियन और प्रशिक्षित मानव संसाधन कहां से आएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि देश में बड़े पैमाने पर सड़कें और पुल बनाए जा रहे हैं, तो उन्हें बनाने वाले इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ तैयार करने के लिए शिक्षा संस्थानों में पर्याप्त निवेश भी होना चाहिए।
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इस इंटरव्यू में डॉ. जोशी ने उच्च शिक्षा के विस्तार और रोजगार के बीच पैदा हुए अंतर को भी गंभीर समस्या बताया। उन्होंने कहा कि केवल नए कॉलेज और विश्वविद्यालय खोल देने से शिक्षा व्यवस्था सफल नहीं हो जाती। उनके मुताबिक असली सवाल यह है कि इन संस्थानों से पढ़कर निकलने वाले युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कहां हैं। उन्होंने ऐसे उदाहरणों का उल्लेख किया, जहां उच्च डिग्री प्राप्त लोग अपेक्षाकृत कम स्तर की नौकरियों में काम करने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा को ‘अर्थकारी’ यानी आर्थिक रूप से उपयोगी होना चाहिए। यदि शिक्षा रोजगार और आजीविका से नहीं जुड़ती तो उसके सामने गंभीर सवाल खड़े होते हैं। डॉ. जोशी ने कहा कि युवाओं को जिस क्षेत्र में रोजगार की संभावना दिखाई देगी, वे उसी क्षेत्र की पढ़ाई की ओर जाएंगे। इसलिए शिक्षा नीति और रोजगार नीति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
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नई शिक्षा नीति को लेकर डॉ. जोशी ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और नीतिगत दृष्टिकोण रखा। उन्होंने अपने कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान भी नई शिक्षा नीति बनाने की चर्चा हुई थी, लेकिन उन्होंने तत्कालीन शिक्षा नीति का अध्ययन करने के बाद महसूस किया कि केवल इसलिए नई नीति बनाने की जरूरत नहीं है कि पुरानी नीति पिछली सरकार के समय बनी थी। उनका कहना था कि जहां सुधार की आवश्यकता हो, वहां पुरानी नीति में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं। नीति बदलने का आधार राजनीतिक विरासत नहीं बल्कि देश की वास्तविक जरूरत होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा नीति का उद्देश्य पहले स्पष्ट होना चाहिए। यह किसी एक औद्योगिक, व्यापारिक, अंतरराष्ट्रीय या अन्य नीति से संचालित नहीं हो सकती। शिक्षा नीति समग्र होनी चाहिए, जिसमें आर्थिक विकास के साथ मनुष्य का विकास भी शामिल हो।
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डॉ. जोशी ने शिक्षा के स्वरूप पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक शिक्षा का उद्देश्य केवल बाजार के लिए श्रमशक्ति तैयार करना नहीं हो सकता। शिक्षा का संबंध समाज, इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से होना चाहिए। उन्होंने शिक्षा को व्यक्ति के संपूर्ण विकास का माध्यम बताते हुए कहा कि रोजगार जरूरी है, लेकिन शिक्षा का पूरा अर्थ रोजगार तक सीमित नहीं किया जा सकता। शिक्षा में समानता के लिए डॉ. जोशी ने समान स्कूली व्यवस्था की पुरजोर वकालत की। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कल्पना रखी जिसमें बच्चे की आर्थिक स्थिति या माता-पिता की सामाजिक हैसियत के आधार पर स्कूल अलग न हों। उनके अनुसार अमीर, गरीब, अधिकारी या सामान्य परिवार—हर बच्चे को अपने पड़ोस या गांव के स्कूल में समान और निशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने कम से कम माध्यमिक स्तर तक इस तरह की व्यवस्था की आवश्यकता बताई। डॉ. जोशी ने अपने पुराने सुझाव का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में बड़ी संख्या में केंद्रीय विद्यालय खोलने की जरूरत थी। उन्होंने बताया कि अपने कार्यकाल में उन्होंने एक योजना के तहत एक साथ 100 केंद्रीय विद्यालय खुलवाने की दिशा में काम किया था, जिसमें जमीन राज्य सरकारों ने उपलब्ध कराई और स्कूल केंद्र ने स्थापित किए।
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शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण पर डॉ. जोशी ने स्पष्ट आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र शिक्षा में आए, निवेश करे और उचित कमाई भी करे, लेकिन शिक्षा से पैदा होने वाले धन का एक हिस्सा शिक्षा के विकास में वापस जाना चाहिए। उनके अनुसार शिक्षा और चिकित्सा को केवल मुनाफा कमाने की गतिविधि में बदलना उचित नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से महंगी उच्च शिक्षा पर चिंता जताई और कहा कि यदि अच्छी शिक्षा पाने के लिए करोड़ों या लाखों रुपये की क्षमता जरूरी हो जाए तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए अवसर सीमित हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा निशुल्क और सुलभ होगी तभी समाज के सभी वर्गों को समान अवसर मिल पाएगा। अपने कार्यकाल के संदर्भ में उन्होंने यह भी बताया कि शिक्षा के लिए अलग संसाधन जुटाने के उद्देश्य से तीन प्रतिशत सेस लगाने का सुझाव उन्होंने दिया था।
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डॉ. जोशी ने उच्च शिक्षा के बढ़ते खर्च को सामाजिक असमानता से भी जोड़ा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी संस्थान में पढ़ने के लिए बेहद बड़ी रकम की जरूरत हो तो गरीब परिवार का प्रतिभाशाली विद्यार्थी वहां कैसे पहुंच पाएगा।
उनके अनुसार शिक्षा की बढ़ती आर्थिक लागत समाज में अवसरों की असमानता बढ़ा सकती है। उन्होंने बड़े शिक्षण संस्थानों में छात्रों पर पड़ने वाले सामाजिक और आर्थिक दबाव का उल्लेख करते हुए यह भी सवाल किया कि छात्रों में आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याएं बड़े संस्थानों में ही क्यों दिखाई देती हैं। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम होने के आधार पर स्कूल बंद किए जाने की प्रवृत्ति पर भी डॉ. जोशी ने सवाल उठाया। उनका कहना था कि पहले यह देखा जाना चाहिए कि स्कूल में बच्चे कम क्यों हुए। यदि शिक्षक नियमित नहीं आता, स्कूल में भवन नहीं है, प्रयोगशाला या अन्य बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं तो विद्यार्थियों की संख्या कम होना स्वाभाविक है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि स्कूल तो खोल दिया गया लेकिन शिक्षक ही नहीं है, तो छात्र पढ़ेगा कैसे? उन्होंने ऐसे छात्रों की समस्याओं का उल्लेख किया, जिनके स्कूल में विषय शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, कहीं भवन की कमी है तो कहीं बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उनके अनुसार सरकारी स्कूल बंद करने के बजाय उनकी व्यवस्था को ठीक किया जाना चाहिए।
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‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को लेकर भी डॉ. जोशी ने एक बुनियादी सवाल उठाया आखिर विकास का अर्थ क्या है? उनके मुताबिक किसी देश को विकसित कहने के लिए केवल आर्थिक उत्पादन, उद्योग, सड़क, भवन और तकनीकी प्रगति पर्याप्त नहीं हो सकती। विकास के साथ यह भी देखना होगा कि समाज के जीवन-मूल्य क्या हैं। उन्होंने आदिवासी समुदायों का उदाहरण देते हुए कहा कि आधुनिक आर्थिक पैमानों पर किसी समुदाय को पिछड़ा माना जा सकता है, लेकिन यदि वह प्रकृति की रक्षा करता है, जंगल नहीं काटता, ईमानदारी से जीवन जीता है और अपने पर्यावरण के साथ संतुलन बनाए रखता है तो मानवीय दृष्टि से उसे किस अर्थ में अविकसित कहा जा सकता है? डॉ. जोशी के अनुसार शिक्षा नीति में आर्थिक मूल्यों और जीवन-मूल्यों के बीच संतुलन आवश्यक है।
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डॉ. जोशी ने भारत के तकनीकी और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि देश सूचना तकनीक और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर जोर दे रहा है, लेकिन इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा भी मजबूत होना चाहिए।
उन्होंने बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों की पर्याप्त उपलब्धता का सवाल उठाते हुए कहा कि देश को विश्व गुरु बनने की आकांक्षा रखने से पहले यह देखना चाहिए कि वह विकसित देशों से किन क्षेत्रों में पीछे है। डॉ. जोशी ने अपने कार्यकाल से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग बताते हुए कहा कि जब शिक्षा सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से फंड लेने का सुझाव आया था, तब वह इसके पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्र को कर्ज के सहारे चलाने के बजाय देश को अपने संसाधनों से शिक्षा पर खर्च बढ़ाना चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने शिक्षा खर्च के लिए तीन प्रतिशत सेस लगाने का सुझाव दिया था।
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शिक्षा के संवैधानिक ढांचे पर डॉ. जोशी ने कहा कि आजादी के समय शिक्षा मुख्य रूप से राज्यों के विषय के रूप में देखी जाती थी। बाद में इसे समवर्ती सूची में लाया गया, जिससे केंद्र की भूमिका बढ़ी। उनके अनुसार शिक्षा में सुधार के लिए केंद्र और राज्यों के बीच टकराव के बजाय समन्वय जरूरी है। देश की विशाल विविधता को देखते हुए शिक्षा व्यवस्था में केंद्र और राज्यों दोनों की जिम्मेदारियों का संतुलन होना चाहिए।डॉ. मुरली मनोहर जोशी का यह साक्षात्कार केवल शिक्षा नीति पर उनकी व्यक्तिगत राय नहीं बल्कि देश के विकास मॉडल को लेकर उनके लंबे राजनीतिक और वैचारिक अनुभव से निकला दृष्टिकोण भी सामने रखता है। उनकी बातों का केंद्रीय संदेश यह है कि शिक्षा को केवल परीक्षा, डिग्री और नौकरी के चश्मे से देखने की बजाय राष्ट्र निर्माण की बुनियादी व्यवस्था के रूप में देखना होगा। उनके अनुसार पेपर लीक केवल प्रश्नपत्र की सुरक्षा की समस्या नहीं है। बेरोजगारी केवल नौकरी की कमी का सवाल नहीं है। सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होना केवल विद्यार्थियों की पसंद का विषय नहीं है और महंगी उच्च शिक्षा केवल फीस का मामला नहीं है। इन सभी समस्याओं के पीछे शिक्षा की दिशा, रोजगार की उपलब्धता, सरकारी प्राथमिकताएं, सामाजिक मूल्य, भ्रष्टाचार और आर्थिक असमानता जैसे बड़े प्रश्न जुड़े हुए हैं। डॉ. जोशी ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन और शिक्षा मंत्रालय में अनुभव के आधार पर जिस बात पर सबसे अधिक जोर दिया, वह है शिक्षा की नीति का अंतिम उद्देश्य मनुष्य और समाज का समग्र विकास होना चाहिए। उनकी यह टिप्पणी मौजूदा दौर में इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि देश एक ओर ‘विकसित भारत’ और वैश्विक शक्ति बनने का लक्ष्य रख रहा है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा, रोजगार, परीक्षा प्रणाली और समान अवसरों को लेकर लगातार बहस जारी है। अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री के साथ हुई यह बातचीत इसी बहस को एक वरिष्ठ राजनेता और पूर्व शिक्षा मंत्री के अनुभव से देखने का अवसर देती है। इस इंटरव्यू को आप डाक्टर मुरली मनोहर जोशी के मन की बात भी कह सकते हैं। इस इंटरव्यू में डाक्टर मुरली मनोहर जोशी ने जोर देते हुए कहा है कि डाक्टर मुरली मनोहर जोशी लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी में राष्टÑीय स्तर पर तीसरे नंबर के नेता रहे हैं। एक जमाने में तत्कालीन भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल विहारी वाजपेयी, भूतपूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के बाद भाजपा में राष्टÑीय स्तर पर डाक्टर मुरली मनोहर जोशी का ही नाम आता था। वर्तमान में भारत सरकार की शिक्षा नीति के ऊपर डाक्टर मुरली मनोहर जोशी की असहमति से यह साफ जाहिर है कि भाजपा के अंदर पुराने बड़े नेता वर्तमान सरकार से असहमत तथा दुखी हैं।
नीचे यहां हम यूट्यूब का वह लिंक भी उपलब्ध करा रहे हैं जिसमें डाक्टर मुरली मनोहर जोशी के साथ देश के वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री ने इंटरव्यू किया है। https://www.youtube.com/watch?v=XNw7LWUnKzA
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