
भारत में लोकतंत्र की रीढ़ कहे जाने वाले निर्वाचन आयोग और उसके प्रमुख मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) इस समय सियासी विवादों के केंद्र में हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पक्षपातपूर्ण रही है। इस बीच चर्चा तेज है कि विपक्ष उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहा है। सवाल उठता है—क्या वाकई मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद महाभियोग के जरिए हटा सकती है? प्रक्रिया क्या है और अब तक ऐसा कभी हुआ भी है या नहीं ? CEC Impeachment Motion
भारत के संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की स्थापना की। यह संवैधानिक संस्था केंद्र और राज्यों में चुनावों की जिम्मेदारी निभाती है। आयोग के प्रमुख के तौर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका सबसे अहम है।
अनुच्छेद 324(1): चुनावों की देखरेख और नियंत्रण की पूरी जिम्मेदारी आयोग की।
अनुच्छेद 324(2): राष्ट्रपति मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति करेंगे।
अनुच्छेद 324(5): मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों जैसी होगी।
यानी सीईसी को साधारण परिस्थितियों में हटाना लगभग असंभव है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संविधान में बेहद कठोर रखी गई है।
संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है।
हटाने का आधार सिर्फ दुर्व्यवहार (Misbehavior) या अक्षम्यता (Incapacity) हो सकता है।
इसके बाद राष्ट्रपति अंतिम निर्णय लेते हैं।
विशेष बहुमत का अर्थ है—सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से अधिक समर्थन।
यही प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के महाभियोग में भी लागू होती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त की तरह अन्य निर्वाचन आयुक्तों को इतनी सुरक्षा नहीं है। उन्हें राष्ट्रपति हटा सकते हैं, लेकिन शर्त यह है कि सीईसी से परामर्श लेना अनिवार्य होगा।
संविधान ने यह व्यवस्था इसलिए की है ताकि सरकारें अपने हित में चुनाव आयोग को प्रभावित न कर सकें। लोकतांत्रिक ढांचे में आयोग को स्वतंत्र प्रहरी के तौर पर कार्य करना है। यही वजह है कि उन्हें न्यायाधीश जैसी सुरक्षा मिली है।
एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (1991): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीईसी को हटाने का अधिकार केवल संसद के पास है, कार्यपालिका के पास नहीं।
टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995): कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है और सभी आयुक्तों के पास समान अधिकार हैं।
आज तक किसी भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त को महाभियोग जैसी प्रक्रिया से नहीं हटाया गया है। यह संवैधानिक सुरक्षा कवच की मजबूती को दर्शाता है। हालांकि, आयोग की निष्पक्षता को लेकर कई बार सवाल उठे हैं, लेकिन संसद ने कभी औपचारिक रूप से हटाने की प्रक्रिया शुरू नहीं की। बता दें कि साल 2023 में संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्त नियुक्ति अधिनियम पारित किया। इसके तहत अब नियुक्ति की प्रक्रिया में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और नेता विपक्ष शामिल होंगे। पहले इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी होते थे, लेकिन उन्हें हटा दिया गया है। इसी बदलाव पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। CEC Impeachment Motion