गुजरात के वडनगर से दिल्ली तक नरेंद्र मोदी का सफर कैसे आगे बढ़ा? साधारण परिवार में जन्म, आरएसएस से जुड़ाव, गुजरात के मुख्यमंत्री बनने और तीन बार प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की पूरी कहानी जानिए। उपलब्धियों, बड़े फैसलों, राजनीतिक विवादों और भारत की राजनीति पर उनके प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण पढ़ें।

आर.पी. रघुवंशी
भारत की राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी कहानी केवल उनके राजनीतिक उत्थान की कहानी नहीं होती, बल्कि वह देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलावों को समझने का माध्यम भी बन जाती है। नरेंद्र दामोदरदास मोदी का जीवन ऐसा ही एक उदाहरण है। गुजरात के छोटे से कस्बे वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी ने संगठनात्मक राजनीति से होते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर भारत के प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया। वर्ष 2014 में केंद्र की सत्ता संभालने के बाद उन्होंने भारतीय राजनीति की शैली, चुनाव प्रचार, सरकारी योजनाओं के संचार और भारत की वैश्विक छवि को प्रभावित किया। उनके समर्थक उन्हें दृढ़ इच्छाशक्ति, निर्णायक नेतृत्व, राष्ट्रवाद और विकास की राजनीति का प्रतीक मानते हैं। वहीं, उनके आलोचक रोजगार, आर्थिक असमानता, सामाजिक सौहार्द, संस्थागत स्वतंत्रता और कुछ बड़े नीतिगत फैसलों के परिणामों पर सवाल उठाते रहे हैं। नरेंद्र मोदी की कहानी को समझने के लिए जरूरी है कि उनके संघर्ष, संगठनात्मक कौशल, राजनीतिक सफलता, सरकार की उपलब्धियों और उनके कार्यकाल में उठे गंभीर सवालों को एक साथ देखा जाए। आखिर एक साधारण परिवार में जन्मा व्यक्ति भारतीय राजनीति के केंद्र में कैसे पहुँचा? किस प्रकार संगठन में काम करते हुए उसने राष्ट्रीय नेतृत्व की पहचान बनाई? और प्रधानमंत्री के रूप में उसके फैसलों ने भारत को किस दिशा में प्रभावित किया? यह आलेख इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाशने का प्रयास है।

17 सितंबर 1950 को गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर में नरेंद्र दामोदरदास मोदी का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम दामोदरदास मूलचंद मोदी और माता का नाम हीराबेन मोदी था। उनका परिवार साधारण आर्थिक परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करता था। नरेंद्र मोदी के बचपन की चर्चा में परिवार की चाय की दुकान पर हाथ बँटाने का प्रसंग अक्सर सामने आता है। यह प्रसंग उनकी सार्वजनिक जीवन-कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। उनके समर्थक इसे मेहनत, आत्मनिर्भरता और सामान्य परिवार से निकलकर आगे बढ़ने की प्रेरणा के रूप में देखते हैं। वडनगर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवेश उनके शुरुआती जीवन की पृष्ठभूमि था। सीमित संसाधनों के बीच शिक्षा प्राप्त करना, परिवार की जिम्मेदारियों को समझना और कम उम्र में जीवन की व्यावहारिक चुनौतियों से परिचित होना उनकी जीवन यात्रा के शुरुआती अध्याय माने जाते हैं। हालाँकि, किसी व्यक्ति की सफलता को केवल उसके बचपन की परिस्थितियों से नहीं समझा जा सकता। अवसर, शिक्षा, व्यक्तिगत प्रयास, सामाजिक संपर्क, संगठनात्मक अनुभव और समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ भी उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नरेंद्र मोदी की जीवन यात्रा का शुरुआती अध्याय भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
नरेंद्र मोदी की युवावस्था उनके व्यक्तित्व और राजनीतिक सोच के विकास का महत्वपूर्ण समय रही। उनकी जीवनी में घर से निकलकर विभिन्न स्थानों की यात्रा करने और बाद में अहमदाबाद पहुँचने का उल्लेख मिलता है। इसी दौर में उनका झुकाव सामाजिक गतिविधियों और संगठनात्मक कार्यों की ओर बढ़ा। सार्वजनिक जीवन के प्रति उनकी रुचि धीरे-धीरे एक संगठित राजनीतिक-सामाजिक यात्रा में बदलने लगी। युवावस्था में लिए गए निर्णय किसी भी व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करते हैं। नरेंद्र मोदी के मामले में संगठन के साथ जुड़ाव ने उन्हें अनुशासन, जनसंपर्क, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय और सामूहिक गतिविधियों के संचालन का अनुभव दिया। उनकी आगे की राजनीतिक सफलता में इन अनुभवों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। उन्होंने अहमदाबाद में संघ के साथ काम किया और आगे चलकर प्रचारक के रूप में संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ निभाईं। संघ की कार्यपद्धति में शाखाओं, स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण, सामाजिक संपर्क और संगठन विस्तार जैसी गतिविधियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके समर्थक इसे राष्ट्रसेवा और सामाजिक संगठन का माध्यम मानते हैं, जबकि आलोचक इसकी विचारधारा और भारतीय समाज एवं राजनीति पर इसके प्रभाव को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। 1975 से 1977 के बीच देश में आपातकाल लागू रहा। इस अवधि में नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगे तथा विपक्षी राजनीतिक गतिविधियों पर व्यापक नियंत्रण लगाया गया। संघ से जुड़े लोगों सहित विभिन्न विपक्षी समूहों ने आपातकाल का विरोध किया।नरेंद्र मोदी के शुरुआती संगठनात्मक जीवन को भी इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है। संगठन में काम करने का अनुभव उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ताओं से संवाद, स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने और लंबे समय तक किसी लक्ष्य के लिए काम करने की क्षमता विकसित करने का अवसर देता रहा। बाद के वर्षों में यही संगठनात्मक अनुभव उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार बना।
1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद नरेंद्र मोदी ने पार्टी के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई। उस समय भारतीय राजनीति में नए समीकरण बन रहे थे और भाजपा देश के विभिन्न हिस्सों में अपना संगठन मजबूत करने का प्रयास कर रही थी। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में संगठनकर्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। चुनावी तैयारियों, कार्यकर्ताओं से संवाद, राजनीतिक कार्यक्रमों के समन्वय और संगठन के विस्तार जैसे कार्यों में उनकी भूमिका रही। संगठनात्मक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें व्यक्ति को पर्दे के पीछे रहकर काम करना पड़ता है। जनसभाओं में भाषण देना और चुनाव जीतना जितना दिखाई देता है, उतना ही महत्वपूर्ण उन कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार करना होता है जो गाँवों, कस्बों और शहरों में पार्टी के संदेश को लोगों तक पहुँचाते हैं। नरेंद्र मोदी ने इसी क्षेत्र में अपनी राजनीतिक दक्षता विकसित की। 1980 और 1990 के दशक में भारतीय राजनीति में गठबंधन, क्षेत्रीय दलों के उभार और सामाजिक समीकरणों के बदलाव ने नई परिस्थितियाँ पैदा कीं। भाजपा के विस्तार के साथ नरेंद्र मोदी को भी अधिक जिम्मेदारियाँ मिलीं। धीरे-धीरे वह गुजरात से बाहर राष्ट्रीय राजनीति में पहचाने जाने लगे। उनके राजनीतिक उत्थान में व्यक्तिगत मेहनत के साथ पार्टी के संगठन, विचारधारा, नेतृत्व और चुनावी परिस्थितियों का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा।

अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। यह उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ था। अब तक वह मुख्य रूप से संगठनात्मक राजनीति से जुड़े रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें सीधे शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी संभालनी थी। जनवरी 2001 में आए विनाशकारी भूकंप ने गुजरात, विशेषकर कच्छ क्षेत्र, को भारी नुकसान पहुँचाया था। पुनर्वास, आवास निर्माण और बुनियादी ढाँचे को बहाल करना राज्य के सामने बड़ी चुनौती थी। मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के सामने प्रशासनिक व्यवस्था को गति देने, निवेश आकर्षित करने, औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने और राज्य की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने जैसे कई काम थे। उनके कार्यकाल में उद्योग और निवेश को आकर्षित करने वाली पहलों पर जोर दिया गया। वाइब्रेंट गुजरात जैसे निवेश सम्मेलनों के माध्यम से राज्य को घरेलू और विदेशी निवेशकों के सामने प्रस्तुत किया गया। इन प्रयासों के समर्थकों ने गुजरात को तेज आर्थिक विकास और प्रशासनिक सक्रियता का उदाहरण बताते हुए ‘गुजरात मॉडल’ की चर्चा की। हालाँकि, किसी राज्य के विकास का आकलन केवल निवेश प्रस्तावों, औद्योगिक परियोजनाओं या बड़ी घोषणाओं से नहीं किया जा सकता। वास्तविक निवेश, रोजगार सृजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, ग्रामीण जीवन और सामाजिक असमानता जैसे संकेतक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। गुजरात मॉडल को लेकर भी यही बहस रही कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस सीमा तक पहुँचा। इसके बावजूद, गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने अपनी ऐसी राजनीतिक पहचान बनाई जिसने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व की दौड़ में प्रमुख स्थान दिलाया।
नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल का उल्लेख वर्ष 2002 की सांप्रदायिक हिंसा के बिना अधूरा रहेगा। फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगने से लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद गुजरात के विभिन्न हिस्सों में गंभीर सांप्रदायिक हिंसा फैली। बड़ी संख्या में लोग मारे गए, जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे। अनेक परिवार विस्थापित हुए और घरों, दुकानों तथा अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुँचा। इन घटनाओं ने गुजरात के साथ-साथ पूरे देश को झकझोर दिया। तत्कालीन राज्य सरकार की भूमिका और हिंसा से निपटने के तरीके को लेकर गंभीर राजनीतिक और सार्वजनिक विवाद पैदा हुए। नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर वर्षों तक राजनीतिक बहस चलती रही। इस प्रकरण से संबंधित जाँच, न्यायिक कार्यवाही और विभिन्न सार्वजनिक दावों को अलग-अलग समझना आवश्यक है। आरोप, जाँच एजेंसियों के निष्कर्ष, न्यायालयों के फैसले और राजनीतिक व्याख्याएँ एक ही चीज नहीं हैं। इस घटना का उल्लेख करते समय पीड़ित परिवारों की पीड़ा और न्याय की आवश्यकता को केंद्र में रखना भी जरूरी है। नरेंद्र मोदी के समर्थक उनके बाद के प्रशासनिक कार्यों और विकास संबंधी पहलों पर जोर देते हैं, जबकि आलोचक 2002 की घटनाओं को उनके राजनीतिक जीवन की गंभीर कसौटी मानते हैं। इतिहास और राजनीति का निष्पक्ष अध्ययन तभी संभव है जब उपलब्धियों के साथ विवादास्पद घटनाओं को भी ईमानदारी से स्वीकार किया जाए।

2000 के दशक के उत्तरार्ध और 2010 के शुरुआती वर्षों में नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में अधिक चर्चित होने लगे। गुजरात में निवेश, उद्योग और प्रशासन से जुड़े उनके दावों तथा वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलनों ने उनकी पहचान को राज्य की सीमाओं से बाहर पहुँचाया। वर्ष 2013 में भाजपा ने उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। उस समय देश में महँगाई, भ्रष्टाचार के आरोप, आर्थिक सुस्ती और तत्कालीन केंद्र सरकार के प्रति असंतोष जैसे मुद्दों पर व्यापक बहस चल रही थी। जनता के एक वर्ग में राजनीतिक बदलाव की अपेक्षा बढ़ रही थी। भाजपा ने विकास, सुशासन, रोजगार और परिवर्तन को अपने चुनावी संदेश का प्रमुख हिस्सा बनाया। नरेंद्र मोदी की जनसभाओं, भाषणों और व्यापक चुनाव प्रचार ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र में ला दिया। उनके अभियान की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उसमें नेतृत्व की स्पष्ट छवि, बड़े लक्ष्य और भविष्य के प्रति आशावाद को प्रमुखता दी गई। डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया, जनसभाओं और कार्यकर्ताओं के नेटवर्क का व्यापक उपयोग किया गया। उनके संदेश को देश के विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक समूहों तक पहुँचाने के लिए संगठित प्रयास हुए। यह केवल एक नेता की लोकप्रियता की कहानी नहीं थी, बल्कि राजनीतिक संचार और चुनावी अभियान के बदलते स्वरूप का भी उदाहरण था।
2014 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के जीवन का सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ साबित हुआ। भारतीय जनता पार्टी ने 543 सदस्यीय लोकसभा में 282 सीटें जीतीं और अपने दम पर बहुमत प्राप्त किया। नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि भाजपा को पहली बार लोकसभा में अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिला था। चुनाव ने राष्ट्रीय राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत की। एक साधारण परिवार में जन्मे व्यक्ति का देश के सर्वोच्च निर्वाचित कार्यकारी पद तक पहुँचना भारतीय लोकतंत्र की उस संभावना को दर्शाता है जिसमें राजनीतिक संगठन, जनसमर्थन और चुनावी सफलता के माध्यम से कोई व्यक्ति शीर्ष नेतृत्व तक पहुँच सकता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के सामने देश की विशाल आबादी की अपेक्षाओं को पूरा करने की चुनौती थी। युवाओं को रोजगार, किसानों की आय, गरीबों के जीवन में सुधार, उद्योगों का विकास, बुनियादी ढाँचे का विस्तार और भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मजबूत करना प्रमुख विषय थे। उनके पहले कार्यकाल में कई ऐसी योजनाएँ और नीतिगत पहल सामने आईं जिनका प्रभाव बैंकिंग, स्वच्छता, स्वास्थ्य, ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं और सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में देखने को मिला।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने वित्तीय समावेशन और जनकल्याण से जुड़ी योजनाओं को प्रमुखता दी।
प्रधानमंत्री जनधन योजना
वर्ष 2014 में शुरू हुई प्रधानमंत्री जनधन योजना का उद्देश्य उन लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना था जिनके पास बैंक खाते नहीं थे।
बैंक खातों के माध्यम से सरकारी सहायता, बचत और औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच आसान बनाने का प्रयास किया गया। इससे वित्तीय समावेशन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता मिली। हालाँकि, केवल खाता खुलना ही वित्तीय समावेशन की अंतिम उपलब्धि नहीं है। खातों का नियमित उपयोग, वित्तीय साक्षरता और साइबर धोखाधड़ी से सुरक्षा भी जरूरी हैं।
स्वच्छ भारत मिशन
2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया गया। इसका उद्देश्य स्वच्छता को व्यापक जनअभियान बनाना और खुले में शौच की समस्या को कम करना था। इस अभियान ने स्वच्छता को राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का प्रमुख विषय बनाया। शौचालयों के निर्माण और उनके उपयोग को लेकर व्यापक प्रयास हुए। इसके दीर्घकालिक परिणामों का मूल्यांकन करते समय शौचालयों की उपलब्धता के साथ पानी, रखरखाव, नियमित उपयोग और स्वच्छता संबंधी व्यवहार में बदलाव को भी देखना आवश्यक है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना
उज्ज्वला योजना के माध्यम से पात्र गरीब परिवारों की महिलाओं को एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया। इसका उद्देश्य पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करना और महिलाओं के स्वास्थ्य तथा जीवन की परिस्थितियों में सुधार लाना था। लेकिन कनेक्शन मिलने के बाद सिलेंडर की कीमत और नियमित रिफिल की क्षमता भी तय करती है कि परिवार इस सुविधा का कितना लाभ उठा पाता है।
आयुष्मान भारत
आयुष्मान भारत के माध्यम से पात्र परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाया गया। इस पहल का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अस्पताल में उपचार का खर्च कम करने में मदद करना था। हालाँकि, स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ पर्याप्त अस्पताल, प्रशिक्षित चिकित्सक, उपचार की गुणवत्ता और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण हैं। इन योजनाओं ने सरकार की जनकल्याण संबंधी पहचान को मजबूत किया। इनके वास्तविक प्रभाव का पूरा आकलन लाभार्थियों की संख्या के साथ लोगों के जीवन में आए स्थायी बदलावों के आधार पर किया जाना चाहिए।

8 नवंबर 2016 को नरेंद्र मोदी सरकार ने उस समय प्रचलन में मौजूद ₹500 और ₹1,000 के नोटों को अमान्य घोषित करने की घोषणा की। इसे सामान्य तौर पर नोटबंदी कहा जाता है। सरकार ने इसके पीछे काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक लगाने जैसे उद्देश्य बताए। बाद में डिजिटल भुगतान और अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की बहस भी इस फैसले से जुड़ गई। नोटबंदी के तत्काल बाद देशभर में नकदी की कमी की स्थिति बनी। बैंक शाखाओं और एटीएम के बाहर लंबी कतारें लगीं। छोटे कारोबारियों, दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिकों और नकदी पर निर्भर लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यह निर्णय भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे अधिक चर्चित और विवादास्पद आर्थिक फैसलों में शामिल हो गया। समर्थकों ने डिजिटल भुगतान और औपचारिक आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर जोर दिया, जबकि आलोचकों ने असंगठित क्षेत्र पर पड़े प्रभाव और काले धन पर स्थायी रोक लगाने की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए। भारतीय रिजर्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार, अमान्य किए गए नोटों का बहुत बड़ा हिस्सा बैंकिंग प्रणाली में वापस आ गया। इस तथ्य ने नकदी के रूप में रखे काले धन को समाप्त करने के दावे पर बहस को और तेज किया। नोटबंदी का मूल्यांकन करते समय केवल घोषित उद्देश्यों या तत्काल कठिनाइयों को नहीं, बल्कि इसके आर्थिक परिणामों, लागत और वैकल्पिक उपायों को भी ध्यान में रखना चाहिए। यह प्रसंग दिखाता है कि बड़े निर्णय लेने की राजनीतिक क्षमता के साथ उनके आर्थिक और सामाजिक परिणामों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में डिजिटल भुगतान को व्यापक बढ़ावा मिला। डिजिटल इंडिया अभियान और डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे के विस्तार ने सरकारी सेवाओं तथा आर्थिक लेनदेन में तकनीक के उपयोग को प्रमुखता दी। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई की शुरुआत 2016 में हुई। इसके विकास में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, बैंकिंग व्यवस्था, तकनीकी ढाँचे, स्मार्टफोन और इंटरनेट की बढ़ती उपलब्धता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यूपीआई के माध्यम से लोग मोबाइल फोन और क्यूआर कोड की मदद से दुकानों, बाजारों और अन्य स्थानों पर भुगतान करने लगे। छोटे दुकानदारों के लिए भी डिजिटल लेनदेन का उपयोग अधिक सुविधाजनक हुआ। इस बदलाव ने भारत में दैनिक भुगतान के व्यवहार को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिर भी, इस परिवर्तन का पूरा श्रेय किसी एक योजना या व्यक्ति को देना उचित नहीं होगा। इसमें बैंक खातों का विस्तार, मोबाइल इंटरनेट, सस्ती डेटा सेवाएँ, भुगतान संबंधी तकनीक और उपयोगकर्ताओं का भरोसा जैसे अनेक कारक शामिल हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ साइबर धोखाधड़ी, फर्जी कॉल, ओटीपी साझा करने और ऑनलाइन ठगी जैसी समस्याएँ भी सामने आईं। इसलिए डिजिटल प्रगति का मूल्यांकन सुरक्षा, निजता और आम नागरिकों के विश्वास के आधार पर भी होना चाहिए।

1 जुलाई 2017 को वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू हुआ। इसका उद्देश्य अनेक अप्रत्यक्ष करों को एक व्यापक कर व्यवस्था के अंतर्गत लाना था। जीएसटी की तैयारी में केंद्र और राज्यों के बीच कई वर्षों तक विचार-विमर्श हुआ था। नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में इसे लागू किया गया और इसके बाद कारोबारियों के लिए कर अनुपालन की एक साझा व्यवस्था विकसित हुई। इस सुधार से कर प्रणाली के एकीकरण की दिशा में कदम बढ़ा, लेकिन शुरुआती दौर में कई छोटे व्यापारियों को तकनीकी प्रक्रियाओं, रिटर्न भरने और अनुपालन संबंधी जटिलताओं का सामना करना पड़ा। जीएसटी का मूल्यांकन करते समय कर संग्रह, कारोबार करने में आसानी, छोटे उद्यमों की स्थिति और कर अनुपालन की लागत को एक साथ देखना आवश्यक है। यह भारत के आर्थिक ढाँचे में एक बड़ा बदलाव था, लेकिन किसी भी बड़े सुधार की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका लाभ कितने व्यापक स्तर पर पहुँचता है और उससे जुड़ी कठिनाइयों का समाधान कितनी प्रभावी तरीके से किया जाता है।
नरेंद्र मोदी सरकार ने राजमार्गों, रेलवे, हवाई अड्डों और शहरी परिवहन से जुड़ी परियोजनाओं को विकास की प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया। बेहतर सड़कें माल ढुलाई के समय को कम कर सकती हैं। रेलवे की क्षमता बढ़ने से यात्रियों और उद्योगों को लाभ मिल सकता है। हवाई संपर्क का विस्तार पर्यटन, व्यापार और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है। शहरी विकास के क्षेत्र में भी परिवहन संपर्क, सार्वजनिक सुविधाओं और बुनियादी ढाँचे की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर जैसे तेजी से विकसित होते क्षेत्रों में सड़क संपर्क, औद्योगिक विकास, आवास, लॉजिस्टिक्स और हवाई संपर्क का महत्व विशेष रूप से बढ़ा है। ऐसे क्षेत्रों में विकास का लाभ तभी व्यापक होगा जब बुनियादी ढाँचे के साथ रोजगार, नागरिक सुविधाओं और पर्यावरण संबंधी जरूरतों का भी ध्यान रखा जाए। बुनियादी ढाँचे की परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल उद्घाटन, घोषित लागत या निर्माण की गति से नहीं होना चाहिए। परियोजना समय पर पूरी हुई या नहीं, उसकी गुणवत्ता कैसी है, सुरक्षा के मानक कितने मजबूत हैं और आम नागरिकों को उससे कितना लाभ मिला—ये भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संपर्क को अपने सार्वजनिक नेतृत्व का प्रमुख हिस्सा बनाया। अमेरिका, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, रूस और अन्य देशों के साथ भारत के संबंधों में रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, तकनीक, अंतरिक्ष और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग महत्वपूर्ण रहा। नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लिया और विभिन्न देशों के नेताओं के साथ संवाद के माध्यम से भारत की प्राथमिकताओं को सामने रखने का प्रयास किया। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिलने और उसे वैश्विक स्तर पर प्रोत्साहित किए जाने से भारतीय योग परंपरा को व्यापक अंतरराष्ट्रीय दृश्यता मिली। भारत की विदेश नीति का उद्देश्य केवल दूसरे देशों से संपर्क बढ़ाना नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों, सुरक्षा सहयोग, निवेश, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक मंचों पर देश की भूमिका को मजबूत करना भी है। हालाँकि, विदेश नीति की सफलता का आकलन केवल यात्राओं, सम्मेलनों और सार्वजनिक भाषणों के आधार पर नहीं किया जा सकता। व्यापार, निवेश, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, रणनीतिक हित और अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान लिए गए फैसलों के परिणाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भारत की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति में उसकी आर्थिक क्षमता, जनसंख्या, बाजार, सैन्य शक्ति, कूटनीतिक परंपरा और विभिन्न सरकारों के दीर्घकालिक प्रयासों का योगदान भी शामिल है। नरेंद्र मोदी का कार्यकाल इस निरंतर विकसित होती विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
राष्ट्रीय सुरक्षा नरेंद्र मोदी सरकार के प्रमुख राजनीतिक विषयों में शामिल रही है। 2016 में उरी हमले के बाद भारत ने नियंत्रण रेखा के पार लक्षित कार्रवाई की घोषणा की। 2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में हवाई कार्रवाई की गई। इन घटनाओं ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति और भारत-पाकिस्तान संबंधों पर व्यापक चर्चा पैदा की। सरकार ने इन कार्रवाइयों को आतंकवाद के विरुद्ध कठोर प्रतिक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया। समर्थकों ने इसे भारत के सुरक्षा दृष्टिकोण में दृढ़ता का संकेत माना। दूसरी ओर, आलोचकों और विश्लेषकों ने सैन्य कार्रवाई के दीर्घकालिक परिणामों, क्षेत्रीय तनाव और कूटनीतिक जोखिमों पर भी विचार किया। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है। खुफिया व्यवस्था, सीमा प्रबंधन, आधुनिक तकनीक, रक्षा उत्पादन, सैनिकों की सुविधाएँ और प्रभावी कूटनीति भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। किसी भी सरकार की सुरक्षा नीति का मूल्यांकन उपलब्ध प्रमाणों, आधिकारिक रिकॉर्ड और दीर्घकालिक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।

वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को असाधारण स्वास्थ्य और आर्थिक संकट में डाल दिया। भारत भी इससे गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। देश में लॉकडाउन, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, टीकाकरण और राहत उपाय सरकार की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल रहे। महामारी के दौरान अनेक लोगों की आजीविका प्रभावित हुई। प्रवासी श्रमिकों की कठिनाइयाँ, रोजगार का नुकसान, अस्पतालों पर दबाव और दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी ने देश के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कीं। दूसरी ओर, भारत ने बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाया और डिजिटल माध्यमों से पंजीकरण तथा टीकाकरण प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित की। महामारी ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी देश की क्षमता का परीक्षण केवल उसकी आर्थिक या सैन्य शक्ति से नहीं होता। स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक समन्वय, वैज्ञानिक तैयारी और संकट के समय कमजोर वर्गों तक सहायता पहुँचाने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है। नरेंद्र मोदी सरकार के महामारी प्रबंधन का आकलन करते समय टीकाकरण और राहत प्रयासों के साथ प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं, स्वास्थ्य ढाँचे की कमजोरियों और नागरिकों की कठिनाइयों को भी ध्यान में रखना चाहिए। इस संकट से मिला एक बड़ा सबक यह है कि मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और भविष्य के संकटों के लिए तैयारी किसी भी राष्ट्र की दीर्घकालिक प्राथमिकता होनी चाहिए।
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 303 सीटें जीतीं और नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। यह परिणाम 2014 के जनादेश की निरंतरता के साथ भाजपा के राष्ट्रीय राजनीतिक विस्तार का संकेत था। सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में कई बड़े संवैधानिक, राजनीतिक और सामाजिक महत्व के फैसले लिए।
अनुच्छेद 370 में बदलाव
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से संबंधित अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी करने और राज्य के पुनर्गठन का निर्णय लिया गया। सरकार ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण, प्रशासनिक बदलाव और विकास के अवसरों से जोड़कर प्रस्तुत किया। समर्थकों ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया, जबकि आलोचकों ने संवैधानिक प्रक्रिया, राज्य की स्वायत्तता, राजनीतिक अधिकारों और इसके सामाजिक प्रभावों पर प्रश्न उठाए। इस फैसले ने भारत की संवैधानिक और राजनीतिक बहस में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
नागरिकता संशोधन अधिनियम
वर्ष 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित हुआ। इसके प्रावधानों को लेकर नागरिकता, धर्मनिरपेक्षता, समानता और संविधान से जुड़े प्रश्नों पर व्यापक बहस हुई तथा विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए। सरकार ने इस कानून को कुछ पड़ोसी देशों से आए निर्दिष्ट धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को नागरिकता देने के प्रावधान के रूप में समझाया। आलोचकों ने इसके धार्मिक आधार और समान नागरिकता के सिद्धांत से जुड़े पहलुओं पर चिंता जताई। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि बड़े राजनीतिक निर्णय अपने घोषित उद्देश्यों के साथ संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक प्रभावों के आधार पर भी परखे जाते हैं।
अयोध्या का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद भारतीय राजनीति और समाज के सबसे लंबे समय तक चर्चित मुद्दों में शामिल रहा। नवंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने भूमि विवाद पर फैसला सुनाया। इसके बाद जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हुआ, जिसमें नरेंद्र मोदी ने प्रमुख भूमिका निभाई। राम मंदिर का विषय अनेक लोगों के लिए धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा रहा है। वहीं, यह विवाद भारतीय राजनीति, न्यायिक प्रक्रिया और सामाजिक संबंधों पर भी गहरा प्रभाव डालता रहा। समर्थकों ने मंदिर निर्माण को लंबे समय से प्रतीक्षित धार्मिक और सांस्कृतिक उपलब्धि के रूप में देखा। इस घटनाक्रम को लेकर व्यापक सार्वजनिक चर्चा भी हुई। किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक विषय को समझते समय आस्था का सम्मान, न्यायिक निर्णयों की समझ और विभिन्न समुदायों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान साथ-साथ महत्वपूर्ण हैं।
नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौतियों में से एक तीन कृषि कानूनों को लेकर हुआ किसान आंदोलन था।
वर्ष 2020 में पारित इन कानूनों के बारे में सरकार का तर्क था कि इनके माध्यम से कृषि विपणन में सुधार होगा और किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक विकल्प मिलेंगे। लेकिन अनेक किसान संगठनों ने आशंका जताई कि इन कानूनों से कृषि बाजारों, न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था और किसानों की सौदेबाजी की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक किसानों ने इन कानूनों के खिलाफ लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन किया। यह आंदोलन सरकार और किसान संगठनों के बीच संवाद, विश्वास और नीति निर्माण की प्रक्रिया के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया। नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। बाद में कानूनों को निरस्त कर दिया गया। यह घटना नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय है। इससे पता चलता है कि मजबूत बहुमत वाली सरकार के लिए भी व्यापक सामाजिक सहमति, प्रभावित समुदायों की आशंकाओं को सुनना और नीतियों पर संवाद करना आवश्यक है। लोकतंत्र में किसी नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य से निर्धारित नहीं होती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उससे प्रभावित लोगों की चिंताओं का समाधान किस प्रकार किया गया।
नरेंद्र मोदी सरकार ने ग्रामीण विकास, किसानों की सहायता और गरीब परिवारों के लिए विभिन्न योजनाओं को प्राथमिकता दी। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पात्र किसान परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई। फसल बीमा, सिंचाई, ग्रामीण बुनियादी ढाँचे और अन्य कृषि संबंधी कार्यक्रमों पर भी जोर दिया गया। इन योजनाओं का उद्देश्य किसानों और ग्रामीण परिवारों को आर्थिक सहारा देना तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना रहा है। हालाँकि, भारत में कृषि से जुड़े प्रश्न कहीं अधिक व्यापक हैं। खेती की लागत, फसलों का उचित मूल्य, बाजार तक पहुँच, सिंचाई, भंडारण, प्राकृतिक आपदाएँ और किसानों की आय की स्थिरता जैसे मुद्दों का समाधान केवल आर्थिक सहायता से संभव नहीं है। ग्रामीण भारत की वास्तविक प्रगति के लिए कृषि उत्पादकता, गैर-कृषि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और स्थानीय उद्योगों का विकास भी आवश्यक है। किसानों और श्रमिकों के जीवन में स्थायी बदलाव तभी संभव है जब योजनाओं के लाभ के साथ उनकी आर्थिक सुरक्षा और भविष्य के अवसरों में भी सुधार हो।
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता जनता के साथ सीधे संवाद पर जोर देना रही है। ‘मन की बात’, सार्वजनिक कार्यक्रमों, जनसभाओं और डिजिटल माध्यमों के जरिए उन्होंने नागरिकों तक अपना संदेश पहुँचाने का प्रयास किया। आधुनिक राजनीति में नेतृत्व की छवि और संचार का महत्व लगातार बढ़ा है। नरेंद्र मोदी ने इस बदलाव का व्यापक उपयोग किया। उनके भाषणों में बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य, विकास, सांस्कृतिक पहचान, आत्मनिर्भरता और सामूहिक भागीदारी जैसे विषय प्रमुखता से सामने आते रहे हैं। उनकी संचार शैली ने समर्थकों के साथ एक मजबूत राजनीतिक जुड़ाव बनाने में मदद की। आलोचकों ने दूसरी ओर यह सवाल उठाया कि प्रत्यक्ष संवाद की प्रभावशीलता का आकलन नागरिकों की शिकायतों के समाधान, नीतिगत पारदर्शिता और कठिन सवालों के जवाब देने की तत्परता से भी किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक नेतृत्व का अर्थ केवल जनता तक संदेश पहुँचाना नहीं है। इसका अर्थ नागरिकों की बात सुनना, असहमति का सम्मान करना और निर्णयों के परिणामों के प्रति जवाबदेह रहना भी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 240 सीटें जीतीं। पार्टी अपने दम पर बहुमत के आंकड़े से नीचे रही, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को बहुमत मिला। नरेंद्र मोदी ने 9 जून 2024 को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह उनके राजनीतिक जीवन का एक नया अध्याय था। 2014 और 2019 के चुनावों में भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिला था, जबकि 2024 के परिणाम ने गठबंधन सहयोगियों की भूमिका को अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। इस जनादेश को भारतीय मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताओं और गठबंधन राजनीति के संदर्भ में समझना आवश्यक है। तीसरे कार्यकाल में रोजगार, कौशल विकास, विनिर्माण, निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, शहरी विकास और सामाजिक समावेशन जैसे विषय प्रमुख बने हुए हैं। भारत की युवा आबादी देश के लिए एक बड़ा अवसर है, लेकिन इस अवसर को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, पर्याप्त रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देना जरूरी है। देश की आर्थिक प्रगति का लाभ छोटे कारोबारियों, महिलाओं, किसानों, श्रमिकों और कम आय वाले परिवारों तक पहुँचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। तीसरे कार्यकाल की वास्तविक सफलता इसी बात से आँकी जाएगी कि विकास की गति के साथ आम नागरिकों के जीवन में कितना सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन आता है।
नरेंद्र मोदी के समर्थक उनके कार्यकाल को भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं से जोड़ते हैं। भारत की विशाल आबादी, आर्थिक क्षमता, तकनीकी विकास, अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा क्षमता, सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक व्यवस्था देश को वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने इन पहलुओं को अंतरराष्ट्रीय संवाद और सार्वजनिक संचार में प्रमुखता दी। भारत ने विभिन्न देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी, व्यापार, ऊर्जा और रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने के प्रयास किए। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों के हितों, जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भी अपनी स्थिति प्रस्तुत की। लेकिन किसी देश की वैश्विक शक्ति का निर्धारण केवल उसके प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता या अंतरराष्ट्रीय यात्राओं से नहीं होता। आर्थिक उत्पादकता, वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा, सैन्य क्षमता, व्यापार, कूटनीतिक संबंध और घरेलू सामाजिक स्थिरता भी महत्वपूर्ण कारक हैं।
इसलिए नरेंद्र मोदी के वैश्विक नेतृत्व का आकलन भारत की व्यापक राष्ट्रीय उपलब्धियों और चुनौतियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
नरेंद्र मोदी के लंबे राजनीतिक जीवन और प्रधानमंत्री कार्यकाल की चर्चा करते समय उन सवालों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो लगातार सार्वजनिक विमर्श में उठते रहे हैं।
रोजगार और आर्थिक असमानता
भारत की बड़ी युवा आबादी को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। आर्थिक विकास के साथ यह देखना भी जरूरी है कि रोजगार के अवसर कितने बढ़े, काम की गुणवत्ता कैसी रही और आय में असमानता को कम करने के लिए क्या प्रगति हुई।
महँगाई और घरेलू खर्च
खाद्य पदार्थों, ईंधन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च आम परिवारों के जीवन को सीधे प्रभावित करता है। विकास की नीतियों का मूल्यांकन करते समय परिवारों की क्रय शक्ति और जीवनयापन की लागत को ध्यान में रखना आवश्यक है।
सामाजिक सौहार्द
भारत की विविधता उसकी ऐतिहासिक पहचान और लोकतांत्रिक शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक, भाषाई और सामाजिक विविधता के बीच विश्वास कायम रखना किसी भी सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है।
लोकतांत्रिक संस्थाएँ और जवाबदेही
संसद, न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, चुनावी प्रक्रिया और नागरिक समाज लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। किसी भी सरकार की मजबूती का मूल्यांकन इन संस्थाओं की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और प्रभावी कामकाज के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
नीतियों के परिणाम
बड़ी योजनाएँ और घोषणाएँ तभी वास्तविक उपलब्धि बनती हैं जब उनका लाभ नागरिकों तक पहुँचे। इसलिए किसी भी सरकार के मूल्यांकन में घोषित लक्ष्यों और वास्तविक परिणामों के बीच अंतर को समझना जरूरी है। इन प्रश्नों को उठाना किसी नेता की उपलब्धियों को नकारना नहीं है। लोकतंत्र में नेतृत्व की प्रशंसा और उसकी नीतियों की समीक्षा साथ-साथ चल सकती हैं।
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए किसी एक कारण को निर्णायक मानना उचित नहीं होगा। उनकी सफलता के पीछे कई कारकों का मेल दिखाई देता है।
पहला, संगठनात्मक अनुभव : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी में लंबे समय तक काम करने से उन्हें कार्यकर्ताओं, जनसंपर्क और संगठन विस्तार का अनुभव मिला। दूसरा, नेतृत्व की स्पष्ट छवि : उन्होंने अपने सार्वजनिक व्यक्तित्व को निर्णायक नेतृत्व, विकास और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़कर प्रस्तुत किया।
तीसरा, व्यापक चुनावी संचार : जनसभाओं, डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया और संगठित प्रचार के जरिए उन्होंने अपना संदेश बड़े स्तर पर पहुँचाया।
चौथा, राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की क्षमता : 2014 के चुनाव के समय भ्रष्टाचार के आरोपों, महँगाई और तत्कालीन सरकार के प्रति असंतोष ने राजनीतिक बदलाव की संभावना बढ़ाई। भाजपा ने इस परिस्थिति को अपने पक्ष में बदलने का प्रयास किया।
पाँचवाँ, संगठन और नेतृत्व का मेल : नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के साथ पार्टी संगठन, कार्यकर्ताओं के नेटवर्क और चुनावी रणनीति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
छठा, समर्थकों के साथ भावनात्मक जुड़ाव: उनके समर्थकों का एक बड़ा वर्ग उन्हें राष्ट्रीय गौरव, विकास की आकांक्षा और मजबूत नेतृत्व की उम्मीदों से जोड़ता है।
इन कारकों के साथ भारत की सामाजिक विविधता, चुनावी प्रतिस्पर्धा और समय के साथ बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को भी समझना चाहिए। नरेंद्र मोदी की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक लोकतंत्र में संगठन, व्यक्तिगत छवि, राजनीतिक संचार और जनसमर्थन किस प्रकार मिलकर किसी नेता को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुँचा सकते हैं।
नरेंद्र मोदी को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख नेताओं में गिना जाता है। भारत जैसे विशाल देश के प्रधानमंत्री होने के कारण उनके निर्णयों का प्रभाव घरेलू राजनीति के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों, व्यापार, सुरक्षा और वैश्विक मंचों पर भी पड़ता है। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसकी विशाल आबादी, बढ़ती तकनीकी क्षमता, परमाणु शक्ति का दर्जा, अंतरिक्ष कार्यक्रम और रणनीतिक स्थिति उसे वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण बनाते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी इन राष्ट्रीय क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी कारण उनके भाषणों, विदेश यात्राओं और नीतिगत निर्णयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिया जाता है। फिर भी, दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता का कोई एक सार्वभौमिक और स्थायी मापदंड नहीं है। राजनीतिक प्रभाव का आकलन आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता, कूटनीतिक प्रभाव, वैश्विक संस्थाओं में भूमिका और देश की आंतरिक स्थिति जैसे अनेक मानकों से किया जाता है। इसलिए इस आलेख का शीर्षक नरेंद्र मोदी की असाधारण राजनीतिक यात्रा और वैश्विक पहचान को रेखांकित करने वाला एक प्रभावशाली साहित्यिक शीर्षक है, न कि किसी आधिकारिक वैश्विक रैंकिंग का दावा। उनकी वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति का निर्धारण समय, नीतियों के परिणाम और आने वाली पीढ़ियों के अध्ययन से होगा।
इतिहास किसी व्यक्ति को केवल उसके पद, लोकप्रियता या चुनावी जीत के आधार पर याद नहीं करता। वह यह भी देखता है कि उस व्यक्ति के निर्णयों ने समाज, अर्थव्यवस्था, संस्थाओं और आने वाली पीढ़ियों को किस प्रकार प्रभावित किया। नरेंद्र मोदी के समर्थक उनके नेतृत्व, जनकल्याणकारी योजनाओं, डिजिटल भुगतान, बुनियादी ढाँचे और अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति को उनके कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर, आलोचक रोजगार, आर्थिक असमानता, नोटबंदी के प्रभाव, सामाजिक सौहार्द, कृषि कानूनों और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े प्रश्न उठाते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों को समझना आवश्यक है, क्योंकि किसी बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व की विरासत अक्सर उपलब्धियों और विवादों, दोनों से मिलकर बनती है। यदि आने वाले वर्षों में भारत रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करता है, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता सुधारता है, वैज्ञानिक अनुसंधान में आगे बढ़ता है, आर्थिक असमानता को कम करता है और अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाता है, तो यह देश की दीर्घकालिक उपलब्धि होगी। किसी नेता की विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी होगा कि उसके कार्यकाल में नागरिकों को कितने अवसर मिले, संस्थाएँ कितनी मजबूत हुईं और देश ने भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए कितनी तैयारी की।

17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र दामोदरदास मोदी की जीवन यात्रा भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण समकालीन अध्यायों में शामिल है। साधारण आर्थिक परिस्थितियों वाले परिवार से निकलकर संगठनात्मक कार्यकर्ता बनना, गुजरात में राजनीतिक पहचान स्थापित करना, मुख्यमंत्री के रूप में शासन की जिम्मेदारी संभालना और फिर लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद तक पहुँचना उनके सार्वजनिक जीवन की उल्लेखनीय घटनाएँ हैं। वर्ष 2014 के ऐतिहासिक जनादेश ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थापित किया। इसके बाद जनधन योजना, स्वच्छ भारत मिशन, उज्ज्वला योजना, डिजिटल भुगतान, जीएसटी, बुनियादी ढाँचे के विस्तार और विदेश नीति से जुड़ी पहलों ने उनके कार्यकाल को व्यापक पहचान दी। साथ ही, नोटबंदी, कोविड-19 महामारी का प्रबंधन, वर्ष 2002 की गुजरात हिंसा की विरासत, कृषि कानूनों के विरुद्ध आंदोलन, रोजगार और सामाजिक सौहार्द जैसे विषय उनके नेतृत्व के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण बने रहे। नरेंद्र मोदी की कहानी केवल एक व्यक्ति के ऊपर उठने की कहानी नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र, संगठनात्मक राजनीति, चुनावी जनादेश, जनसंचार और बदलती राष्ट्रीय आकांक्षाओं की कहानी भी है। उनके समर्थकों के लिए वह संघर्ष और दृढ़ संकल्प का प्रतीक हैं। उनके आलोचकों के लिए उनका कार्यकाल उन नीतियों और सवालों की समीक्षा का विषय है जो किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के साथ जुड़े होते हैं। व्यापक ऐतिहासिक दृष्टि से इन दोनों पहलुओं को समझना आवश्यक है।
वड़नगर से दिल्ली तक का सफर इस बात का उदाहरण है कि लोकतंत्र में एक व्यक्ति राष्ट्रीय नेतृत्व के सर्वोच्च स्तर तक पहुँच सकता है। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक महानता किसी एक नेता की लोकप्रियता से आगे बढ़कर उसके नागरिकों के अवसरों, अधिकारों, संस्थाओं की मजबूती और समाज की सामूहिक प्रगति में निहित होती है।
भारत की यात्रा किसी एक व्यक्ति की यात्रा नहीं है। इसे करोड़ों किसानों, श्रमिकों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, सैनिकों, उद्यमियों, महिलाओं, युवाओं और आम नागरिकों ने मिलकर आगे बढ़ाया है। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक विरासत का अंतिम मूल्यांकन भी इसी व्यापक कसौटी पर होगा—कि उनके नेतृत्व के वर्षों में भारत ने कितनी प्रगति की, उस प्रगति का लाभ कितने लोगों तक पहुँचा और देश आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना सुरक्षित, समृद्ध, न्यायपूर्ण और अवसरों से भरपूर बन सका। यही किसी भी राष्ट्रीय नेता की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है और यही इतिहास के सामने उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी।
[इस विशेष आलेख के लेखक चेतना मंच मीडिया संस्थान के संस्थापक तथा सम्पादक आर.पी. रघुवंशी हैं। लेखक आर.पी. रघुवंशी ने अनेक बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुजरात प्रदेश में स्थित पैतृक गांव वड़नगर का भ्रमण करने के बाद यह विशेष आलेख लिखा है]
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