नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर के 25 साल पूरे हो गए हैं। जानिए वडनगर से गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर भारत के प्रधानमंत्री बनने तक की पूरी कहानी।

भारतीय राजनीति में कुछ यात्राएं केवल सत्ता तक पहुंचने की कहानी नहीं होतीं, वे समय के बदलते दौर की कहानी बन जाती हैं। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा भी ऐसी ही एक कहानी है। एक साधारण परिवार से निकलकर संगठन के कार्यकर्ता बनने, गुजरात के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालने और फिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बनने तक की नरेंद्र मोदी की यात्रा बहुत ही खास है। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात से शुरू हुआ यह अध्याय आज 25 वर्षों के पड़ाव तक पहुंच चुका है। इस दौरान भारत ने कई बड़े बदलाव देखे और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने भी देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक, कूटनीति और शासन की दिशा को प्रभावित किया। लेकिन इस सफर के पीछे आखिर वह कौन-सी सोच, संघर्ष और परिस्थितियां थीं, जिन्होंने नरेंद्र मोदी को भारतीय राजनीति का इतना बड़ा चेहरा बनाया? इस कहानी को समझने के लिए हमें लौटना होगा उस दौर में, जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री तो दूर, राजनीति के शिखर से भी बहुत दूर एक साधारण बालक के रूप में अपने सपनों को आकार दे रहे थे।

नरेंद्र दामोदरदास मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ। एक सामान्य गुजराती परिवार में जन्मे नरेंद्र मोदी का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके शुरुआती जीवन की चर्चा में अक्सर यह बात सामने आती है कि उन्होंने अपने पिता की चाय बेचने में मदद की और बाद में खुद भी चाय का स्टॉल चलाया। बचपन से ही नरेंद्र मोदी का झुकाव सामाजिक और संगठनात्मक गतिविधियों की ओर रहा। आठ वर्ष की उम्र में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। आगे चलकर यही संगठन उनके राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला था। युवा अवस्था में उन्होंने घर छोड़ा और देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा की। धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्रों की यात्राओं ने उनके व्यक्तित्व को प्रभावित किया। इसके बाद वे गुजरात लौटे और अहमदाबाद में संगठन के साथ सक्रिय रूप से जुड़ गए।

नरेंद्र मोदी वर्ष 1971 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बने। यह उनके सार्वजनिक जीवन का वह दौर था, जब राजनीति में उनका नाम अभी व्यापक रूप से पहचाना नहीं जाता था, लेकिन संगठन के भीतर उनकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही थीं। 1975 में देश में आपातकाल लगा तो नरेंद्र मोदी को भी कुछ समय के लिए भूमिगत रहकर काम करना पड़ा। इस दौर ने उनके राजनीतिक जीवन में संघर्ष और संगठनात्मक अनुभव को और गहरा किया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ उनका जुड़ाव बढ़ा। वर्ष 1985 में वे भाजपा से जुड़े और अगले डेढ़ दशक से अधिक समय तक संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते रहे। धीरे-धीरे संगठन के भीतर उनकी पहचान एक कुशल रणनीतिकार और मेहनती कार्यकर्ता के रूप में बनने लगी। यही संगठनात्मक अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी ताकत बना। नरेंद्र मोदी ने बूथ स्तर से लेकर पार्टी के बड़े संगठनात्मक दायित्वों तक काम किया और इसी प्रक्रिया में राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका भी बढ़ती गई।
साल 2001 नरेंद्र मोदी के जीवन में एक बड़ा मोड़ लेकर आया। गुजरात उस समय भूकंप, सूखे और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों से भी जूझ रहा था। इसी दौर में नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। 7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह वह क्षण था, जिसने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। एक संगठन के कार्यकर्ता से किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनना आसान जिम्मेदारी नहीं थी। नरेंद्र मोदी के सामने गुजरात के प्रशासन को संभालने के साथ-साथ विकास और पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती थी। उन्होंने बिजली, पानी, सिंचाई, सड़क, उद्योग और प्रशासनिक सुधार जैसे मुद्दों को अपनी सरकार के कामकाज में प्रमुख स्थान दिया। गुजरात का यह दौर नरेंद्र मोदी के राजनीतिक मॉडल की पहचान बनने लगा। उनके समर्थकों ने इसे विकास और प्रशासनिक सुधार से जोड़ा, जबकि उनके आलोचकों ने उनकी सरकार की नीतियों और राजनीतिक शैली पर सवाल भी उठाए। यही लोकतांत्रिक राजनीति की वास्तविक तस्वीर है, जहां किसी नेता की लोकप्रियता के साथ उसके फैसलों पर बहस भी चलती रहती है।

गुजरात में नरेंद्र मोदी के लंबे कार्यकाल ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में एक मजबूत पहचान दी। विकास, बुनियादी ढांचे और प्रशासन को लेकर गुजरात में किए गए कामों को आगे चलकर उनकी राष्ट्रीय राजनीति के आधार के रूप में देखा गया। 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय राजनीति में उनकी सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोगशाला बन गया। इसी दौरान नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे नेता के रूप में मजबूत हुई, जो बड़े लक्ष्य तय करने और उन्हें प्रशासनिक स्तर पर लागू करने की कोशिश करता है। फिर आया वर्ष 2014, भारतीय राजनीति के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। नरेंद्र मोदी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रमुख चेहरे के रूप में सामने आए। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 282 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया और नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को पहली बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री तक का यह सफर उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन था।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के सामने जिम्मेदारी पहले से कहीं बड़ी थी। अब उनके फैसलों का असर केवल गुजरात तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के करोड़ों लोगों पर पड़ना था। उनकी सरकार ने जनधन योजना, आधार और मोबाइल तकनीक के माध्यम से सरकारी सेवाओं को सीधे लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिला और UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण पहचान बन गया। स्वच्छता अभियान, आवास, जल जीवन मिशन, किसान सहायता और बुनियादी ढांचे पर जोर ने भी सरकार की नीतियों को व्यापक रूप से प्रभावित किया। डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने सरकार और आम नागरिक के बीच संपर्क के तरीके को भी बदल दिया। इन योजनाओं की उपलब्धियों और सीमाओं को लेकर देश में अलग-अलग राय रही है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में डिजिटल शासन और डिजिटल भुगतान भारत के सार्वजनिक जीवन का बड़ा हिस्सा बन गए।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने एक बार फिर बड़ी जीत हासिल की। भाजपा ने 303 सीटें जीतीं, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 352 सीटें मिलीं। 30 मई 2019 को नरेंद्र मोदी ने लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह जीत इस बात का संकेत थी कि 2014 में बनी उनकी राजनीतिक लोकप्रियता पांच साल बाद भी मजबूत बनी हुई थी। दूसरे कार्यकाल में सरकार ने कई ऐसे बड़े फैसले लिए, जिन्होंने देश की राजनीति और सार्वजनिक बहस को लंबे समय तक प्रभावित किया।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की चर्चा अक्सर बड़े और निर्णायक फैसलों के कारण होती रही है। उनके दूसरे कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया। नागरिकता संशोधन कानून भी इसी दौर में आया। इसके अलावा तीन तलाक से संबंधित कानून, आर्थिक सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले और बाद में नए आपराधिक कानून जैसे कदमों ने देश में व्यापक राजनीतिक बहस को जन्म दिया। समर्थकों ने इन फैसलों को मजबूत और निर्णायक नेतृत्व का उदाहरण माना, जबकि विपक्ष और आलोचकों ने इनके तरीके और प्रभाव को लेकर सवाल उठाए। लोकतंत्र में किसी भी बड़े फैसले का मूल्यांकन केवल राजनीतिक समर्थन से नहीं, बल्कि उसके लंबे समय के प्रभाव से किया जाता है।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल की सबसे कठिन चुनौतियों में कोविड-19 महामारी भी शामिल रही। कोरोना महामारी ने भारत सहित पूरी दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया। भारत में बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन अभियान चलाया गया। देश ने वैक्सीन के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महामारी के बाद सरकार ने आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय उत्पादन पर जोर और बढ़ाया। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन और कई दूसरे क्षेत्रों में देश में उत्पादन बढ़ाने की कोशिशों को इसी व्यापक सोच से जोड़ा गया। भारत की अर्थव्यवस्था और उत्पादन क्षमता को मजबूत करने का लक्ष्य सरकार की नीतियों में लगातार दिखाई दिया।
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों ने भी देश को गर्व के कई अवसर दिए। चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाई। डिजिटल इंडिया और UPI ने भी भारत की तकनीकी क्षमता को वैश्विक मंच पर अलग पहचान दी। आज भारत का डिजिटल सार्वजनिक ढांचा कई देशों के लिए अध्ययन और सहयोग का विषय बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की सक्रियता बढ़ी। G20 की अध्यक्षता और वैश्विक दक्षिण की आवाज को प्रमुखता देने की कोशिशों ने भारत की कूटनीतिक भूमिका को मजबूत करने का प्रयास किया।

वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा में एक और ऐतिहासिक पड़ाव लेकर आया। भाजपा ने 240 सीटें जीतीं, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 292 सीटें मिलीं। 9 जून 2024 को नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस तरह वे स्वतंत्र भारत में जन्मे ऐसे पहले प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला और जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले नेता बने। यह उपलब्धि उनके लंबे राजनीतिक सफर और भारतीय राजनीति में उनकी मजबूत स्थिति को दर्शाती है।
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा में वाराणसी यानी काशी का भी विशेष स्थान है। वर्ष 2014 में उन्होंने वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद काशी उनके राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण पहचान बन गई। काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, गंगा से जुड़ी परियोजनाएं और शहर के बुनियादी ढांचे में बदलाव ने वाराणसी को आधुनिक सुविधाओं और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के मेल के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश को आगे बढ़ाया। वडनगर से निकलकर काशी तक पहुंची नरेंद्र मोदी की यात्रा इसलिए भी खास है क्योंकि एक ओर वडनगर उनके जन्म और शुरुआती जीवन से जुड़ा है, तो दूसरी ओर काशी उनके वर्तमान राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र है।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में अयोध्या का राम मंदिर भी भारतीय सार्वजनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना बना। 5 अगस्त 2020 को नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के भूमि पूजन में हिस्सा लिया। इसके बाद 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद रहे। राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति और सांस्कृतिक विमर्श में लंबे समय से एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की अयोध्या से जुड़ी भूमिका ने उनके राजनीतिक जीवन में विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत के मुद्दे को भी प्रमुख स्थान दिया।
नरेंद्र मोदी की 25 साल की राजनीतिक यात्रा केवल उपलब्धियों से बनी कहानी नहीं है। उनके राजनीतिक जीवन को लेकर देश और विदेश में कई तरह की बहस भी होती रही है। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान उनकी सरकार की भूमिका को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी बहस चली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल ने मामले में नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियोजन की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं पाए। इसके बावजूद इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई। इसी तरह उनकी सरकार की कई नीतियों और फैसलों को लेकर भी समर्थकों और आलोचकों के विचार अलग-अलग रहे हैं। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी का मूल्यांकन करते समय उनकी उपलब्धियों के साथ उनके फैसलों और उनके प्रभाव को भी समझना जरूरी है।
7 अक्टूबर 2026 को नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में मुख्यमंत्री के रूप में शुरुआत के 25 वर्ष पूरे हो गए हैं। यह केवल पीछे मुड़कर देखने का अवसर नहीं है, बल्कि आगे की दिशा पर सोचने का भी समय है। 2047 में भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा। तब भारत की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी होगी, युवाओं के लिए रोजगार के कितने अवसर होंगे, गांव और शहर के बीच सुविधाओं का अंतर कितना कम होगा, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता कैसी होगी और भारत विज्ञान तथा तकनीक में दुनिया के किस मुकाम पर खड़ा होगा—ये सवाल आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी कसौटी होंगे। किसान, युवा, महिलाएं, गरीब और मध्यम वर्ग देश के विकास की कहानी में कितने मजबूत बनते हैं, यह भी किसी भी सरकार की सफलता का महत्वपूर्ण आधार होगा।
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा पर देश में मतभेद हैं और आगे भी रहेंगे। समर्थक उन्हें निर्णायक, मेहनती और विकास पर जोर देने वाला नेता मानते हैं। आलोचक उनकी राजनीतिक शैली, कुछ नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाते हैं। लोकतंत्र में दोनों तरह की आवाजों का होना स्वाभाविक है। लेकिन इन मतभेदों से अलग नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन की एक बात निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण है। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई उनकी यात्रा 2026 तक लगातार सत्ता के शीर्ष नेतृत्व से जुड़ी रही। एक संगठन के कार्यकर्ता से गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर भारत के प्रधानमंत्री बनने तक का यह सफर भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित राजनीतिक यात्राओं में से एक है।
6 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से भी नरेंद्र मोदी के 25 वर्ष के निरंतर नेतृत्व को रेखांकित किया गया। यह अवसर उनके सार्वजनिक जीवन के एक लंबे अध्याय को देखने का मौका देता है। इतिहास किसी भी नेता का अंतिम मूल्यांकन तुरंत नहीं करता। समय बीतने के बाद यह देखा जाता है कि किसी नेता ने देश को किस दिशा में आगे बढ़ाया, संस्थाओं को कितना मजबूत किया, समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास कितना पहुंचा और आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी विरासत छोड़ी। नरेंद्र मोदी की 25 वर्ष की राजनीतिक यात्रा भी इसी ऐतिहासिक कसौटी पर परखी जाएगी। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 7 अक्टूबर 2001 से शुरू हुआ सफर आज भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 25 वर्ष के पड़ाव तक पहुंच गया है।
वडनगर से गुजरात, गुजरात से दिल्ली, दिल्ली से काशी और काशी से अयोध्या तक फैली यह कहानी सिर्फ नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन की कहानी नहीं है। यह पिछले ढाई दशकों में बदलते भारत की कहानी से भी जुड़ी हुई है। 25 वर्ष पूरे होना निश्चित रूप से एक बड़े राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन शायद इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी बाकी है। क्योंकि आने वाले वर्ष ही यह तय करेंगे कि आज लिए जा रहे फैसले और बनाई जा रही नीतियां 2047 के भारत की कितनी मजबूत नींव तैयार कर पाती हैं।
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