RTI ने किया बड़ा खुलासा, मौत के बाद भी जिंदा हैं करोड़ों आधार नंबर
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भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 12:30 PM
National News : आधार कार्ड को भारत में नागरिक पहचान का सबसे बड़ा और व्यापक दस्तावेज माना जाता है, लेकिन हाल ही में सामने आए एक आरटीआई (सूचना के अधिकार) के जवाब ने इसकी विश्वसनीयता और अद्यतन प्रक्रिया पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, 2009 से 2024 के बीच भारत में अनुमानित तौर पर 11.7 करोड़ से अधिक मौतें हुईं लेकिन इसी अवधि में केवल 1.15 करोड़ आधार नंबर ही UIDAI ने मृत्यु के आधार पर निष्क्रिय किए हैं। यानी करीब 10 फीसदी से भी कम।
जनसंख्या के आंकड़े लेकिन आधार का कोई हिसाब नहीं
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, अप्रैल 2025 तक भारत की अनुमानित जनसंख्या 146.39 करोड़ है, जबकि आधार कार्ड धारकों की संख्या 142.39 करोड़ बताई जा रही है। इसके बावजूद UIDAI (भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण) ने आरटीआई के जवाब में कहा है कि उसके पास यह जानकारी नहीं है कि देश में कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास आधार नहीं है।
मौत के बाद भी जिंदा है आधार
भारत के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के अनुसार, 2007 से 2019 तक हर साल औसतन 83.5 लाख लोगों की मौत हुई है। इसी अनुमान को 2023 तक खींचा जाए, तो कुल मौतों की संख्या 11.7 करोड़ से ज्यादा बैठती है। लेकिन UIDAI ने 14 वर्षों में सिर्फ 1.15 करोड़ आधार नंबर को ही मृतकों के नाम पर निष्क्रिय किया है।यानी करोड़ों लोगों की मृत्यु के बाद भी उनके आधार नंबर अब तक सिस्टम में सक्रिय हैं जिससे फर्जीवाड़े, डुप्लिकेशन और सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग की आशंका गहराती है।
कितनी जटिल है UIDAI की निष्क्रियता की प्रक्रिया ?
UIDAI के अनुसार, जब रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) किसी मृत व्यक्ति का डेटा साझा करता है तो UIDAI दो शर्तें देखता है। जैसे-नाम में 90% तक समानता होनी चाहिए, लिंग (Gender) की जानकारी 100% मेल खानी चाहिए। इसके बाद भी केवल तब ही आधार नंबर निष्क्रिय किया जाता है जब यह साबित हो जाए कि उस आधार नंबर से मृत्यु के बाद कोई बायोमेट्रिक अपडेट या प्रमाणीकरण नहीं हुआ है। यदि किसी मृतक का आधार उपयोग में आ रहा हो, तो आगे की जांच होती है। UIDAI का दावा है कि इस प्रक्रिया से धोखाधड़ी रोकी जा सकती है, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहती है।
बिहार के जिलों में 100% से ज्यादा आधार सैचुरेशन
बिहार के किशनगंज, कटिहार, अररिया, पूर्णिया और शेखपुरा जैसे जिलों में 100% से ज्यादा आधार सैचुरेशन पाया गया है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो...
किशनगंज: 126%
कटिहार व अररिया: 123%
पूर्णिया: 121%
शेखपुरा: 118%
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि इन जिंलों की अनुमानित जनसंख्या से अधिक लोगों को आधार जारी किए जा चुके हैं। इसके पीछे बड़ा कारण मृतकों के आधार नंबरों को समय पर निष्क्रिय न किया जाना बताया जा रहा है।
RTI ने किया बड़ा खुलासा
जब RTI के तहत पूछा गया कि हर साल कितने आधार नंबर मृत्यु के आधार पर निष्क्रिय किए गए, तो UIDAI ने साफ कहा, “ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।” यानि UIDAI के पास न तो वर्षवार निष्क्रियता का आंकड़ा है और न ही कोई प्रभावी निगरानी प्रणाली। यह खुलासा बताता है कि UIDAI का डेटा न तो पूरी तरह अद्यतन है और न ही पारदर्शी। जब आधार को बैंक, राशन, पेंशन, शिक्षा, और यहां तक कि वोटर कार्ड से जोड़ा जा रहा है, तब यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। ऐसे में यह सवाल लाजमी है क्या आधार की मौजूदा व्यवस्था वास्तव में डिजिटल भारत के भरोसेमंद स्तंभ के रूप में खड़ी है? या फिर हम एक ऐसे सिस्टम पर निर्भर होते जा रहे हैं जो मृतकों को जिंदा और जिंदा को संदेह के घेरे में डाल सकता है?