
National News : हाल ही में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के बीच हुई तीखी बयानबाजी ने देश में राजनीति और धर्म की बहस को फिर से सतह पर ला दिया है। आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम को तथ्यों और बिंदुवार विश्लेषण के साथ।
"मेरा विश्वास भारत की सोच में है, नफरत की साजिशों में नहीं।"
एस.वाई. कुरैशी का यह बयान एक गहरी सोच और मूल्यों से जुड़ा हुआ संदेश है। उन्होंने साफ किया कि उनका विश्वास उस भारत में है, जहाँ व्यक्ति की पहचान उसकी काबिलियत और काम से होती है — धर्म या जाति से नहीं।
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कुरैशी पर निशाना साधते हुए कहा कि:
वह "मुस्लिम आयुक्त" की तरह काम कर रहे थे।
उनके कार्यकाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को मतदाता बनाया गया।
उन्होंने वक्फ अधिनियम पर टिप्पणी कर धार्मिक आधार पर राजनीति की।
कुरैशी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा:
उन्होंने हमेशा निष्पक्ष और संविधान-सम्मत तरीके से कार्य किया।
उनका IAS करियर और चुनाव आयुक्त का कार्यकाल पूरी निष्ठा और पारदर्शिता से भरा रहा।
यह अफसोसजनक है कि कुछ लोग धर्म के चश्मे से देश की संस्थाओं को देखते हैं।
कुरैशी ने दोहराया कि:
भारत की आत्मा संविधान और उसकी मूल भावना में बसती है।
यह देश धर्मनिरपेक्षता, समानता और कानून के शासन पर आधारित है।
उन्होंने कहा, “भारत संविधान के साथ खड़ा था, है और रहेगा।”
पूर्व राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी और दिल्ली प्रशासन अधिकारी मंच के अध्यक्ष महेश ने कुरैशी का समर्थन किया।
महेश ने बताया कि कुरैशी के कार्यकाल में मतदाता शिक्षा और चुनाव खर्च नियंत्रण जैसे अहम सुधार लागू हुए।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब कुरैशी ने सोशल मीडिया पर वक्फ अधिनियम को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा:
“यह कानून मुस्लिमों की ज़मीन हड़पने की योजना जैसा लगता है।”
इस बयान को लेकर दुबे ने उन पर सीधा हमला किया और धार्मिक राजनीति का आरोप लगाया। National News :