न्यू इंग्लैंड हर साल पतझड़ के मौसम में रंगों की अनोखी चमक से दुनिया भर के ‘लीफ़ पीपर्स’ को आकर्षित करता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनिया के अन्य समशीतोष्ण क्षेत्रों की तुलना में यहाँ कहीं ज़्यादा पेड़ गहरे लाल और चमकीले पीले रंग में रंग जाते हैं।

रिचमंड विश्वविद्यालय की भूगोल विशेषज्ञ स्टेफ़नी ए. स्पेरा बताती हैं कि न्यू इंग्लैंड के मेपल, बीच, बर्च, सैसफ्रास और ऐश के पेड़ मिलकर एक बेहद दुर्लभ और शानदार रंगों का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं। इतना ही नहीं, ज़मीन के करीब पाई जाने वाली ब्लूबेरी की झाड़ियाँ भी चटक लाल हो जाती हैं, जिससे दृश्य और भी मनमोहक बन जाता है।
पतझड़ के रंगों का आनंद लेना कोई नया चलन नहीं है। प्राचीन यूनान के विद्वानों से लेकर जापान की सदियों पुरानी मोमीजीगारी परंपरा तक, शरद ऋतु का सौंदर्य लंबे समय से लोगों को आकर्षित करता रहा है। न्यू इंग्लैंड में भी यह परंपरा 1800 के दशक से लोकप्रिय होने लगी, जब जंगलों का पुनर्विकास हुआ। लेखक हेनरी डेविड थोरो और कवयित्री एमिली डिकिंसन ने भी अपने लेखन में पतझड़ की सुंदरता का ज़िक्र किया। 1930 के दशक तक यह पर्यटन उद्योग चरम पर पहुँच चुका था। बस, ट्रेन और बाद में कारों व क्रूज़ जहाज़ों के ज़रिये हर साल लाखों लोग वर्मोंट, न्यू हैम्पशायर, मेन और मैसाचुसेट्स के पहाड़ी इलाक़ों में रंगीन पत्तों को देखने पहुंचने लगे।
लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जलवायु परिवर्तन पतझड़ के इस प्राकृतिक उत्सव को प्रभावित कर रहा है। स्पेरा के शोध के अनुसार, अकाडिया नेशनल पार्क में पतझड़ का पीक कलर अब 1950 की तुलना में एक हफ्ते से भी ज़्यादा देरी से आने लगा है। साथ ही, मौसम की अनिश्चितता बढ़ने से पर्यटक अपनी यात्रा की सही योजना बनाना भी मुश्किल पा रहे हैं। वर्मोंट विश्वविद्यालय की वन पारिस्थितिकी विज्ञानी एलेक्जेंड्रा कोसिबा बताती हैं कि पेड़ तापमान और नमी के आधार पर अपने पत्तों का रंग बदलते हैं। लगातार बढ़ती बारिश और अनियमित तापमान रंगों की चमक को कम कर रहे हैं। बार-बार आने वाले तूफ़ान पत्तों को रंग दिखाने से पहले ही गिरा देते हैं। इसके अलावा, दक्षिण के ओक–हिकॉरी जंगलों का उत्तर की ओर फैलाव भी न्यू इंग्लैंड की पारंपरिक पतझड़ वनस्पतियों के लिए खतरा बन सकता है।
जहाँ एक तरफ़ रंगों का यह मौसम सदियों से लोगों का मन मोहता आया है, वहीं वैज्ञानिक चिंतित हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद इस चमकदार पतझड़ को वैसे न देख पाएँ जैसी आज दिखाई देती है। जैसा कि थोरो ने लिखा था, “शरद ऋतु का रंग हमें परिपक्वता की याद दिलाता है।
फिलहाल, न्यू इंग्लैंड की घाटियाँ और पर्वत शरद के रंगों से सजे हुए हैं—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुंदरता आने वाले दशकों में भी यूँ ही बरकरार रहेगी?