कूटनीति की चाल में भारत का मास्टरस्ट्रोक : ईरान संकट में आर्मेनिया बना भरोसेमंद 'स्ट्रैटेजिक कॉरिडोर'
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भारत
RP Raghuvanshi
18 Jun 2025 06:58 PM
New Delhi News : ईरान और इजराइल के बीच गहराते युद्ध जैसे हालातों के बीच जब पूरी दुनिया पश्चिम एशिया की ओर चिंतित निगाहों से देख रही थी, तब भारत ने चुपचाप एक कूटनीतिक चाल चल दी। जो न केवल संकट में फंसे अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने में मददगार बनी, बल्कि भारत की रणनीतिक सोच का भी प्रमाण दे गई।
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ईरान में मौजूद भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकालने के लिए भारत सरकार ने जिस देश का सहारा लिया, वह और कोई नहीं बल्कि आर्मेनिया है। वही देश जो पाकिस्तान समर्थित अजरबैजान का कट्टर विरोधी है। भारत ने इस भू-राजनीतिक समीकरण को बखूबी समझा और इसका उपयोग अपने पक्ष में किया।
भारत के छात्रों का सुरक्षित ट्रांजिट
ईरान के उर्मिया, तेहरान और अन्य शहरों में फंसे करीब 110 भारतीय छात्रों को जिनमें जम्मू-कश्मीर के 90 छात्र भी शामिल हैं। भारतीय दूतावास की निगरानी में आर्मेनिया की सीमा पार कराई गई। ये छात्र मुख्यत: उर्मिया मेडिकल यूनिवर्सिटी से हैं और अब सुरक्षित क्षेत्र में हैं। यह ट्रांजिट इसलिए अहम है क्योंकि हवाई मार्ग अस्थायी रूप से बंद हो चुका है और जमीनी रास्तों के सीमित विकल्प ही बचे हैं। भारत ने आर्मेनिया के साथ अपने रक्षा और कूटनीतिक रिश्तों का इस्तेमाल करते हुए यह कॉरिडोर सुनिश्चित किया।
जब राजनीति, सुरक्षा और भूगोल एक साथ आए
आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच नागोर्नो-कराबाख को लेकर 40 वर्षों से टकराव चल रहा है। अजरबैजान का झुकाव पाकिस्तान की ओर रहा है, वहीं आर्मेनिया भारत के निकट रहा है। भारत-आर्मेनिया के बीच 2022 में हुई रक्षा डील इसका सबूत है, जिसके तहत भारत ने आर्मेनिया को एंटी-ड्रोन सिस्टम से लेकर आधुनिक तोपें और मिसाइल इंटरसेप्टर तक निर्यात किए।
जनता का जवाब : बॉयकॉट अजरबैजान
अजरबैजान ने हाल ही में पाकिस्तान का खुला समर्थन किया, जिसका असर भारत में साफ दिखा। बायकाट अजरबैजान ट्रेंड करने लगा और भारतीय पर्यटकों ने बाकू की बुकिंग रद करनी शुरू कर दी। इससे अजरबैजान को आर्थिक झटका लगा। यह कूटनीति के साथ-साथ जन-भावना का भी शक्तिशाली प्रदर्शन था।
राजनीतिक हस्तक्षेप से लेकर मानवीय जिम्मेदारी तक
जम्मू-कश्मीर के नेताओं उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने केंद्र सरकार से छात्रों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप की मांग की थी। वहीं, जम्मू-कश्मीर छात्र संघ के अध्यक्ष नासिर खुहामी लगातार छात्रों के संपर्क में रहे। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि तेहरान में छात्रों को हटाने की योजना पहले से तैयार थी और भारतीय दूतावास लगातार समन्वय में है। ईरान संकट के दौरान भारत ने न सिर्फ अपनी कूटनीतिक सूझबूझ दिखाई, बल्कि मानवाधिकारों की रक्षा और वैश्विक राजनीति में अपना संतुलन भी साबित किया। आर्मेनिया जैसे रणनीतिक साझेदारों के माध्यम से भारत ने एक बार फिर दिखा दिया कि वह न केवल अपने नागरिकों के प्रति जवाबदेह है, बल्कि वैश्विक घटनाओं के बीच न्यायपूर्ण और विवेकपूर्ण हस्तक्षेप की क्षमता भी रखता है। New Delhi News